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ग्लूकोमा (Glaucoma): आंखों की खामोश बीमारी जो धीरे-धीरे छीन सकती है रोशनी

Mar 14, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
ग्लूकोमा (Glaucoma): आंखों की खामोश बीमारी जो धीरे-धीरे छीन सकती है रोशनी

आज के समय में आंखों की बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं में से एक गंभीर बीमारी है ग्लूकोमा (Glaucoma)। इसे अक्सर “Silent Thief of Sight” यानी दृष्टि चुराने वाली खामोश बीमारी भी कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर स्पष्ट नहीं होते और कई बार मरीज को तब पता चलता है जब आंखों की रोशनी काफी हद तक प्रभावित हो चुकी होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया में अंधेपन के प्रमुख कारणों में ग्लूकोमा दूसरे स्थान पर है। अनुमान लगाया जाता है कि दुनिया भर में लगभग 20% लोग ग्लूकोमा के कारण अंधेपन का शिकार हो जाते हैं।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे:

  • ग्लूकोमा क्या है

  • इसके प्रकार

  • शुरुआती लक्षण

  • किन लोगों को ज्यादा खतरा है

  • जांच और उपचार के तरीके

  • बचाव कैसे करें


ग्लूकोमा क्या है?

ग्लूकोमा आंखों की एक गंभीर बीमारी है जिसमें आंख के अंदर का दबाव (Intraocular Pressure – IOP) बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ दबाव धीरे-धीरे दृष्टि तंत्रिका (Optic Nerve) को नुकसान पहुंचाने लगता है।

दृष्टि तंत्रिका वही नस होती है जो आंखों से मिलने वाले दृश्य संकेतों को दिमाग तक पहुंचाती है। जब यह नस क्षतिग्रस्त होने लगती है तो व्यक्ति की दृष्टि धीरे-धीरे कम होने लगती है।

सामान्यतः आंख के अंदर दबाव लगभग 15 से 21 मिलीमीटर पारा (mmHg) के बीच होता है। यदि यह दबाव इससे ज्यादा बढ़ जाता है तो ग्लूकोमा का खतरा बढ़ जाता है।

यह दबाव कई कारकों से प्रभावित हो सकता है जैसे:

  • आनुवांशिकता

  • उम्र

  • जातीयता

  • लिंग

  • शरीर की स्थिति

  • आंखों की बनावट

  • अपवर्तक दोष (Refractive Error)

जब आंख का यह दबाव लगातार बढ़ा रहता है और दृष्टि तंत्रिका को नुकसान होने लगता है, तब इसे ग्लूकोमा कहा जाता है।


ग्लूकोमा के प्रकार

ग्लूकोमा को मुख्य रूप से दो प्रमुख प्रकारों में बांटा जाता है।

1. प्राथमिक ग्लूकोमा (Primary Glaucoma)

यह वह प्रकार है जिसमें ग्लूकोमा अपने आप विकसित होता है और इसके पीछे कोई स्पष्ट अन्य बीमारी नहीं होती।

इसमें दो प्रकार प्रमुख होते हैं:

ओपन एंगल ग्लूकोमा

यह सबसे सामान्य प्रकार है। इसमें आंख के अंदर दबाव धीरे-धीरे बढ़ता है और मरीज को लंबे समय तक कोई लक्षण महसूस नहीं होते।

एंगल क्लोजर ग्लूकोमा

इसमें आंख का दबाव अचानक बढ़ सकता है और तेज दर्द, सिरदर्द और दृष्टि धुंधली होने जैसी समस्याएँ दिखाई दे सकती हैं।


2. सेकेंडरी ग्लूकोमा (Secondary Glaucoma)

इस प्रकार का ग्लूकोमा आंखों की अन्य बीमारियों के कारण होता है।

जैसे:

  • कॉर्निया की बीमारी

  • आइरिस की समस्या

  • लेंस की समस्या

  • आंखों की चोट

  • मोतियाबिंद

भारत जैसे विकासशील देशों में सेकेंडरी ग्लूकोमा के मामले अधिक देखे जाते हैं, खासकर उन लोगों में जिनका मोतियाबिंद का ऑपरेशन देर से होता है।


ग्लूकोमा के शुरुआती लक्षण

ग्लूकोमा को खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि यह अक्सर बिना स्पष्ट लक्षणों के विकसित होता है।

कई मामलों में मरीज को तब तक पता नहीं चलता जब तक दृष्टि काफी प्रभावित नहीं हो जाती।

इसके कुछ सामान्य लक्षण निम्न हो सकते हैं:

1. चश्मे का नंबर बार-बार बदलना

यदि आपकी निकट दृष्टि (Near Vision) का चश्मा बार-बार बदल रहा है तो यह संकेत हो सकता है।

2. दृष्टि का क्षेत्र कम होना

ग्लूकोमा में अक्सर Peripheral Vision (किनारे की दृष्टि) धीरे-धीरे कम होने लगती है।

3. रोशनी के चारों ओर रंगीन घेरे दिखना

यदि बल्ब या लाइट के आसपास इंद्रधनुष जैसे रंगीन घेरे दिखाई दें तो यह ग्लूकोमा का संकेत हो सकता है।

4. दृष्टि धुंधली होना

कभी-कभी चीजें धुंधली दिखाई देने लगती हैं।

5. रात में कम दिखाई देना

रात के समय देखने की क्षमता कम हो सकती है।

यदि इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दें तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।


किन लोगों को ग्लूकोमा का ज्यादा खतरा है?

कुछ लोगों में ग्लूकोमा होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा होता है।

इनमें शामिल हैं:

1. 40 वर्ष से अधिक आयु वाले लोग

उम्र बढ़ने के साथ ग्लूकोमा का खतरा भी बढ़ जाता है।

2. मधुमेह के मरीज

डायबिटीज से पीड़ित लोगों में आंखों की कई समस्याएँ बढ़ जाती हैं।

3. थायरॉयड के मरीज

थायरॉयड की समस्या भी आंखों के दबाव को प्रभावित कर सकती है।

4. मायोपिया (निकट दृष्टि दोष)

जिन लोगों को मायोपिया है उनमें भी जोखिम बढ़ सकता है।

5. पारिवारिक इतिहास

यदि माता-पिता को ग्लूकोमा रहा हो तो बच्चों में भी खतरा बढ़ जाता है।


ग्लूकोमा की जांच कैसे होती है?

ग्लूकोमा का पता लगाने के लिए डॉक्टर कुछ विशेष जांच करते हैं।

1. आंख का दबाव मापना (Tonometry)

इस जांच में आंख के अंदर का दबाव मापा जाता है। यदि यह 21 mmHg से अधिक हो तो ग्लूकोमा की संभावना हो सकती है।

2. ऑप्टिक नर्व की जांच

डॉक्टर ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) को देखकर यह पता लगाते हैं कि उसमें कोई नुकसान तो नहीं हुआ।

कप-डिस्क रेशियो

यदि ऑप्टिक नर्व के कप का आकार बढ़ जाता है तो यह ग्लूकोमा का संकेत हो सकता है।

3. विजुअल फील्ड टेस्ट

इस जांच में यह देखा जाता है कि दृष्टि का क्षेत्र कितना प्रभावित हुआ है।


ग्लूकोमा का उपचार

ग्लूकोमा का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी किस अवस्था में है।

1. आई ड्रॉप (Eye Drops)

सबसे पहले मरीज को आंखों में डालने वाली दवाइयाँ दी जाती हैं जो आंख का दबाव कम करती हैं।

2. खाने वाली दवाइयाँ

यदि आई ड्रॉप से दबाव नियंत्रित नहीं होता तो ओरल दवाइयाँ दी जा सकती हैं।

3. आपातकालीन उपचार

यदि आंख का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो इंट्रावीनस दवाइयाँ दी जाती हैं ताकि दबाव जल्दी कम किया जा सके।

4. सर्जरी

यदि दवाइयों से लाभ नहीं मिलता तो सर्जरी (शल्य चिकित्सा) की जाती है।

हालांकि सर्जरी के बाद भी मरीज को नियमित जांच कराते रहना जरूरी होता है, क्योंकि ग्लूकोमा दोबारा भी हो सकता है।


लेजर उपचार (Laser Treatment)

ग्लूकोमा के उपचार में लेजर तकनीक का भी उपयोग किया जाता है।

इस प्रक्रिया को लेजर पेरिफेरल इरिडोटोमी (Laser Peripheral Iridotomy) कहा जाता है।

इसमें:

  • लेजर की मदद से आइरिस में छोटा छिद्र किया जाता है

  • इससे आंख के अंदर तरल पदार्थ का आउटफ्लो बेहतर हो जाता है

यह उपचार कई बार दवाइयों के साथ या उनके विकल्प के रूप में किया जाता है।


भारत में ग्लूकोमा क्यों बड़ा खतरा है?

भारत और दक्षिण एशियाई देशों में ग्लूकोमा से होने वाले अंधेपन के कई कारण हैं:

  • जागरूकता की कमी

  • समय पर जांच न होना

  • इलाज में देरी

  • चिकित्सा सुविधाओं की कमी

मोतियाबिंद की तरह ही ग्लूकोमा से होने वाला अंधापन भी अक्सर स्थायी होता है, इसलिए समय पर इलाज बेहद जरूरी है।


ग्लूकोमा से बचाव कैसे करें?

ग्लूकोमा से पूरी तरह बचाव हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन कुछ सावधानियों से जोखिम कम किया जा सकता है।

नियमित आंखों की जांच

40 वर्ष के बाद हर साल आंखों की जांच जरूर कराएं।

स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं

संतुलित आहार और नियमित व्यायाम आंखों के लिए भी फायदेमंद है।

मधुमेह और थायरॉयड नियंत्रित रखें

आंखों की चोट से बचें

डॉक्टर की सलाह के बिना दवाइयाँ न लें


ग्लूकोमा में सबसे महत्वपूर्ण बात

ग्लूकोमा में सबसे महत्वपूर्ण चीज है समय पर पहचान।

यदि बीमारी शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए तो दृष्टि को बचाया जा सकता है।

लेकिन यदि देर हो जाए तो दृष्टि स्थायी रूप से चली भी सकती है।

इसलिए:

“आंखों की नियमित जांच ही ग्लूकोमा से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।”


निष्कर्ष

ग्लूकोमा एक गंभीर लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली आंखों की बीमारी है। यह धीरे-धीरे दृष्टि तंत्रिका को नुकसान पहुंचाकर व्यक्ति को अंधेपन की ओर ले जा सकती है।

यदि समय पर इसका पता लग जाए तो इलाज संभव है और दृष्टि को बचाया जा सकता है।

इसलिए:

  • 40 वर्ष के बाद नियमित आंखों की जांच करवाएं

  • किसी भी लक्षण को नजरअंदाज न करें

  • डॉक्टर की सलाह का पालन करें

सतर्कता और समय पर इलाज ही ग्लूकोमा से बचाव का सबसे बड़ा उपाय है।

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