नाग भस्म आयुर्वेद में वर्णित एक धातु-आधारित भस्म है, जिसमें नाग अर्थात् सीसा (Lead) का प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेदिक रसशास्त्र में धातुओं को सीधे उपयोग करने के बजाय उनके शोधन और मारण जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से औषधीय रूप में तैयार करने का वर्णन मिलता है। पारंपरिक ग्रंथों में नाग को एक भारी, मुलायम तथा आसानी से पिघलने वाली धातु के रूप में बताया गया है। पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके
आयुर्वेद में धातु एवं खनिज वर्ग से तैयार की जाने वाली भस्मों का एक विशेष स्थान रहा है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में विभिन्न धातुओं को शोधन, मारण तथा पुट आदि प्रक्रियाओं के माध्यम से औषधीय रूप में उपयोग करने का वर्णन मिलता है। त्रिवंग भस्म भी इसी परंपरा से संबंधित एक पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधि है, जिसका उल्लेख विशेष रूप से प्रमेह, मूत्र संबंधी विकार, धातुक्षीणता तथा पुरुष एवं स्त्री प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े कुछ पारंपरिक उपयोगों के संदर्भ में मिलता है। 'त्रिवंग' नाम मुख्यतः तीन धातुओं के संयोजन की ओर संकेत करता है—नाग, वंग और यशद। पारंपरिक आयुर्वेदिक संदर्भ में नाग को सीसा (Lead), वंग को टिन (Tin) तथा यशद
तूतिया, जिसे सामान्यतः नीला थोथा, नीलाथोथा अथवा तूतिया के नाम से जाना जाता है, पारंपरिक रसशास्त्रीय ग्रंथों में वर्णित एक महत्वपूर्ण खनिज द्रव्य है। इसका संबंध ताम्र अर्थात् ताँबे से माना गया है। प्राकृतिक रूप में प्राप्त होने के साथ-साथ प्राचीन काल में इसे विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा कृत्रिम रूप से तैयार करने का भी वर्णन मिलता है। नीला थोथा अपने विशिष्ट नीले रंग के कारण आसानी से पहचाना जाता है। पारंपरिक ग्रंथों में इसके स्वरूप, शोधन, मारण तथा विभिन्न रोगों में उपयोग का विस्तृत वर्णन मिलता है। विशेष
ताम्र अर्थात् ताँबा आयुर्वेद और रसशास्त्र में वर्णित महत्वपूर्ण धातुओं में से एक है। प्राचीन ग्रंथों में ताम्र के मुख्यतः दो भेद बताए गए हैं—नेपाली ताम्र और म्लेच्छ ताम्र। इनमें नेपाली ताम्र को श्रेष्ठ माना गया है तथा भस्म आदि औषधीय कार्यों के लिए इसी प्रकार के ताम्र को उपयुक्त बताया गया है। ताम्र का विशिष्ट गुरुत्व लगभग 8 माना गया है तथा इसका गलनांक लगभग 1080°C बताया जाता है। ताप और विद्युत के संचालन की दृष्टि से चाँदी के बाद ताम्र
जहरमोहरा भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में वर्णित एक खनिज/पत्थर पदार्थ है, जिसका उल्लेख विशेष रूप से यूनानी चिकित्सा साहित्य में मिलता है। इसका रंग सामान्यतः सफेद, हल्का पीला अथवा कुछ हरापन लिए हुए बताया गया है। पारंपरिक रूप से इसे यूनानी दवा विक्रेताओं के यहां “जहरमोहरा” नाम से प्राप्त किया जाता रहा है। यूनानी हकीमों द्वारा इसके विभिन्न रूपों का प्रयोग किए जाने का उल्लेख मिलता है और समय के साथ आयुर्वेदिक चिकित्सा परंपरा में भी इसके उपयोग का वर्णन मिलता है।
यशद एक सुप्रसिद्ध धातु है, जिसे सामान्य भाषा में जस्ता (Zinc) कहा जाता है। यह भारत के विभिन्न क्षेत्रों, जैसे मद्रास, बंगाल, राजपूताना, पंजाब आदि में खानों से प्राप्त होने का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इसका रंग सामान्यतः सफेद और चमकीला होता है। व्यवहार में जस्ते का उपयोग सुराही, हुक्का, गिलास, कटोरी, थाली आदि विभिन्न वस्तुओं के निर्माण में किया जाता रहा है। यह पानी से लगभग आठ गुना भारी बताया गया है। प्राचीन रसग्रंथों में यशद को रसक सत्त्व अथवा खर्पर सत्त्व जैसे नामों से भी वर्णित किया गया है। यशद नाम से इसका वर्णन भावप्रकाश और आयुर्वेद
आयुर्वेद में विभिन्न प्रकार के खनिज एवं प्राकृतिक द्रव्यों को शोधन और मारण जैसी विशिष्ट प्रक्रियाओं से संसाधित करके औषधीय रूप में उपयोग करने की परंपरा रही है। गोदन्ती भस्म भी ऐसी ही पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियों में वर्णित है। पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका उपयोग मुख्य रूप से ज्वर, शरीर की गर्मी, दाह, प्यास, सिरदर्द, प्रतिश्याय (जुकाम), खाँसी तथा कुछ स्त्री-रोगों में वर्णित मिलता है। परंपरागत साहित्य में गोदन्ती को विभिन्न स्थानीय नामों से भी संबोधित किया गया है। इसके स्वरूप का वर्णन पत्रमय या पाशेदार शिला अथवा टुकड़ों के रूप में मिलता है। कुछ पुराने स्रोतों में इसे जिप्सम
आयुर्वेद के रसशास्त्र में विभिन्न धातुओं और खनिजों का शोधन एवं मारण करके उनसे भस्म तैयार करने की परंपरा रही है। कांस्य भस्म भी ऐसी ही एक पारंपरिक धातु-भस्म है, जिसे सामान्य भाषा में काँसा कहा जाता है। कांस्य मूल रूप से ताँबा और टिन के मिश्रण से बनने वाली धातु है और भारतीय परंपरा में इसका उपयोग बर्तनों तथा विभिन्न घरेलू वस्तुओं के निर्माण में लंबे समय से होता आया है। रसशास्त्रीय ग्रंथों में कांस्य को विशेष प्रक्रियाओं द्वारा शुद्ध करके तथा उचित पुट देकर भस्म बनाने का वर्णन मिलता है। भस्म निर्माण में शोधन, मर्दन, भावना, पुट और पुनः पिसाई जैसी प्रक्रियाओं का विशेष महत्व माना गया है। इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य धातु को ऐसे सूक्ष्म रूप में परिवर्तित करना है जि
आयुर्वेद में अनेक खनिज एवं धातुजन्य पदार्थों का वर्णन मिलता है, जिनका उपयोग विभिन्न संस्कारों और औषधीय प्रक्रियाओं के बाद किया जाता है। कसीस भी ऐसा ही एक महत्वपूर्ण खनिज पदार्थ है, जिसका वर्णन आयुर्वेदिक रसशास्त्र तथा पारंपरिक चिकित्सा ग्रंथों में मिलता है। कसीस को विशेष रूप से इसके लौह-युक्त स्वरूप के कारण महत्वपूर्ण माना गया है और पारंपरिक रूप से इसे पाण्डु, रक्ताल्पता, यकृत-प्लीहा संबंधी विकारों, मंदाग्नि तथा कुछ अन्य रोगों में उपयोग किए जाने का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में कसीस के दो प्रमुख प्रकार बताए गए हैं—पुष्प कसीस और बालूक कसीस। बालूक कसीस को कहीं-कहीं धातु कसीस भी कहा गया है। पारंपरिक विवरणों
आयुर्वेद एवं पारंपरिक भारतीय चिकित्सा साहित्य में अनेक खनिज, रत्न, उपरत्न तथा प्राकृतिक पदार्थों का वर्णन मिलता है। कहरवा, जिसे पारंपरिक ग्रंथों में तृणकान्तमणि के नाम से भी संबोधित किया गया है, इन्हीं पदार्थों में एक महत्वपूर्ण नाम है। इसका उल्लेख विशेष रूप से इसके आकर्षण गुण, शीतल प्रकृति तथा पारंपरिक रूप से रक्तस्राव और पित्त संबंधी विकारों में उपयोग के संदर्भ में मिलता है। कहरवा सामान्यतः पीले, सुनहरे या हल्के भूरे रंग का एक राल-सदृश पदार्थ माना जाता है। इसके विषय में पारंपरिक ग्रंथों में बताया गया है कि इसे कपड़े अथवा ऊन से रगड़ने
कपर्दक भस्म क्या है? आयुर्वेद में विभिन्न प्राकृतिक द्रव्यों से तैयार की जाने वाली भस्मों का विशेष महत्व बताया गया है। कपर्दक भस्म, जिसे सामान्य भाषा में कौड़ी की भस्म भी कहा जाता है, ऐसी ही एक पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधि है। पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथों में कपर्दक का वर्णन विशेष रूप से पाचन तंत्र से संबंधित अनेक विकारों में उपयोगी द्रव्य के रूप में मिलता है। कौड़ियां भारत के विभिन्न भागों में पाई जाती हैं। इनके रंग सफेद, लाल तथा पीले बताए गए हैं। आयुर्वेदिक
अकीक भस्म, अकीक पिष्टी बनाने की विधि एवं पारंपरिक उपयोग आयुर्वेद और रसशास्त्र से संबंधित एक महत्वपूर्ण विषय है। अकीक को पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में एक खनिज द्रव्य के रूप में वर्णित किया गया है। इसका प्रयोग विशेष रूप से हृदय, रक्त, पित्त तथा शरीर में बढ़ी हुई उष्णता से संबंधित विभिन्न पारंपरिक अवस्थाओं में किए जाने का उल्लेख मिलता है। अकीक से तैयार होने वाले प्रमुख योगों में अकीक भस्म और अकीक पिष्टी का नाम मिलता है। दोनों की निर्माण प्रक्रिया अलग-अलग होती है और पारंपरिक ग्रंथों में इनके गुण एवं
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