आयुर्वेद के अनुसार, कैंसर (अर्बुद) केवल एक शारीरिक विकृति नहीं, बल्कि शरीर के सूक्ष्म स्रोतों, धातुओं और अग्नि के असंतुलन की चरम परिणति है। आधुनिक विज्ञान जहाँ इसे कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि मानता है, वहीं आयुर्वेद इसे 'त्रिदोषात्मक विष' मानता है, जो शरीर में संचित 'मल' और 'विष' (Toxins) के कारण उत्पन्न होता है।
क्या आप जानते हैं कि हृदय केवल एक अंग नहीं, बल्कि शरीर का वह इंजन है जो आपके भावनाओं से भी संचालित होता है? आयुर्वेद के अनुसार, ईर्ष्या और क्रोध आपके हृदय को उतना ही नुकसान पहुँचाते हैं जितना कि तैलीय भोजन। आइए, हृदय शूल (Angina) को गहराई से समझते हैं।
किडनी की कार्यक्षमता में कमी (जीर्ण वृक्क पात) जैसी समस्याओं में बचाव ही सबसे बेहतर विकल्प होता है। यह व्याधि न केवल कष्टप्रद और जानलेवा है, बल्कि इसे नियंत्रित करना बहुत कठिन होता है और इसकी चिकित्सा में धन भी अधिक खर्च होता है।
Aaj ke daur mein galat khan-pan, physical activity ki kami aur stress ne hamari sehat ko buri tarah prabhavit kiya hai. Iska sabse zyada asar hamare Liver par padta hai. Fatty Liver aaj kal ek aisi samasya ban gayi hai jise log shuruat mein nazarandaz kar dete hain, lekin baad mein ye Liver Cirrhosis ya Liver Failure ka roop le sakti hai.
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, असंतुलित आहार, बढ़ता तनाव, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं के कारण किडनी से जुड़े रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। किडनी की कार्य क्षमता कम होना एक ऐसी स्थिति है जो धीरे-धीरे विकसित होती है, लेकिन जब तक इसके लक्षण स्पष्ट होते हैं, तब तक किडनी को काफी क्षति पहुँच चुकी होती है।
अगर आप आयुर्वेद से जुड़े किसी भी घरेलू उपचार के बारे में पूछें, तो एक नाम ऐसा है जो लगभग हर घर में सुना गया है — च्यवनप्राश। बचपन में माँ या दादी द्वारा रोज़ सुबह एक चम्मच च्यवनप्राश देना, सर्दी-जुकाम से बचाने का सबसे सामान्य घरेलू उपाय माना जाता रहा है। लेकिन क्या च्यवनप्राश सिर्फ बच्चों के लिए है? क्या इसे रोज़ लिया जा सकता है? और क्या आज के समय में भी यह उतना ही प्रभावी है? इस विस्तृत लेख में हम च्यवनप्राश को आयुर्वेदिक दृष्टि से पूरी गहराई से समझेंगे।
सीने में जलन, पेट में जलन या खट्टे डकार आते ही हमारे घरों में सबसे आम सलाह दी जाती है — “थोड़ा दूध पी लो, सब ठीक हो जाएगा।” यह सलाह: दादी-नानी से मिली, फिल्मों में देखी, सोशल मीडिया पर सुनी, और डॉक्टर के पास जाने से पहले आज़माई जाती है। लेकिन सवाल यह है — क्या दूध वाकई एसिडिटी में हमेशा फायदेमंद होता है? या फिर कई लोगों में यह समस्या को और बढ़ा देता है? इसका जवाब सिर्फ “हाँ” या “नहीं” में नहीं, बल्कि शरीर की पाचन स्थिति, दोष संतुलन और gut health को समझने में छिपा है।
आज के समय में मधुमेह केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि जीवन-शैली से जुड़ा एक गंभीर विकार बन चुका है। अनियमित दिनचर्या, मानसिक तनाव, गलत खान-पान और शारीरिक निष्क्रियता ने इस रोग को घर-घर में आम कर दिया है। आयुर्वेद ने हजारों वर्ष पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि— “पथ्येन रोगा नश्यन्ति” अर्थात् उचित आहार-विहार से रोग स्वयं नियंत्रित हो जाता है।
आज का युग डिजिटल है। मोबाइल फोन अब केवल बातचीत का साधन नहीं, बल्कि काम, पढ़ाई, मनोरंजन, बैंकिंग, सोशल मीडिया और जीवन प्रबंधन का केंद्र बन चुका है। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल और रात को सोते समय भी मोबाइल—यह आज की सामान्य दिनचर्या है। इस मोबाइल-लाइफस्टाइल ने सुविधा तो दी, लेकिन शरीर और मन से प्राकृतिक संतुलन छीन लिया।
आज के आधुनिक युग में नींद न आना केवल एक छोटी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। बदलती जीवनशैली, बढ़ता मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा, मोबाइल और स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग, अनियमित खान-पान और प्राकृतिक दिनचर्या से दूरी — ये सभी कारण मिलकर मानव शरीर की सबसे आवश्यक प्रक्रिया निद्रा को प्रभावित कर रहे हैं।
भारत के हर घर में दही को स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। बच्चे से लेकर बुज़ुर्ग तक दही खाते हैं। गर्मी में लोग इसे “ठंडा” समझकर खाते हैं। बीमारी में भी लोग दही को हल्का आहार मान लेते हैं। लेकिन आयुर्वेद एक चौंकाने वाला सत्य बताता है— “दही सही विधि से लिया जाए तो अमृत है, गलत समय, गलत मात्रा और गलत संयोजन में लिया जाए तो यह शरीर के लिए विष बन जाता है।”
यह मनुष्य की एक विचित्र प्रवृत्ति है कि वह अपने शरीर से कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति मोटा है वह दुबला होना चाहता है। जो दुबला है वह भरावदार दिखना चाहता है। लंबा व्यक्ति अपने कद से परेशान है और छोटा व्यक्ति ऊँचाई पाने की लालसा रखता है। काला व्यक्ति गोरा बनना चाहता है और गोरा व्यक्ति और अधिक उज्ज्वल।
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