मानव मस्तिष्क प्रकृति की सबसे अद्भुत और रहस्यमयी रचनाओं में से एक है। इसकी जटिल संरचना और असाधारण कार्यक्षमता ही मनुष्य को अन्य जीवों से अलग बनाती है। संसार के सभी आश्चर्यों की तुलना में मानव मस्तिष्क कहीं अधिक विलक्षण है। यही शरीर रूपी साम्राज्य का सर्वोच्च नियंत्रक है, जो प्रत्येक क्षण शरीर के सभी अंगों और प्रणालियों का संचालन करता है। मस्तिष्क अस्थियों से निर्मित कपाल (Skull) के भीतर सुरक्षित रहता है। शरीर की सभी ऐच्छिक (Voluntary) तथा अनैच्छिक (Involuntary) क्रियाओं का नियंत्रण इसी के हाथ में होता है। शरीर के प्रत्येक भाग से आने वाली सूचनाएँ तंत्रिकाओं (Nerves) के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचती हैं और फिर मस्तिष्क आवश्यक निर्देश देकर शरीर को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर को एक वृक्ष की उपमा दी है, जिसका मूल मस्तिष्क है और शरीर के अंग-प्रत्यंग उसकी शाखाएँ हैं।
गोमूत्र, गोबर, दूध, दही तथा घी के एक निश्चित अनुपात के मिश्रण को पंचगव्य कहा जाता है। इसके सेवन से तन, मन तथा बुद्धि के विकार दूर होते हैं। आयु, बल और तेज की वृद्धि होती है तथा सात्विक भावों का विकास होता है।
मानसिक स्वास्थ्य आज पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता तनाव, सामाजिक दबाव और बदलती परिस्थितियों के कारण मानसिक रोगों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इन्हीं गंभीर मानसिक रोगों में से एक है शिजोफ्रेनिया (Schizophrenia), जिसे आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में उन्माद रोगों के अंतर्गत समझा जाता है। यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति की सोच, भावनाएं, व्यवहार और वास्तविकता को समझने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। समय पर पहचान और उचित उपचार न मिलने पर यह रोग व्यक्ति के सामाजिक, पारिवारिक और व्यावसायिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, लंबे समय तक बैठकर काम करना, शारीरिक श्रम की कमी तथा गलत खान-पान के कारण कमर और पैरों में दर्द की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं समस्याओं में से एक प्रमुख रोग है गृध्रसी (Sciatica)। यह रोग व्यक्ति के दैनिक जीवन को अत्यंत प्रभावित करता है और कई बार चलना-फिरना भी कठिन बना देता है। आयुर्वेद में गृध्रसी को वातजन्य रोग माना गया है। यह रोग मुख्य रूप से कमर से प्रारंभ होकर नितंब, जांघ, घुटने, पिंडली और पैरों तक दर्द उत्पन्न करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसे Sciatica कहा जाता है, जो सायटिक नर्व (Sciatic Nerve) पर दबाव या सूजन के कारण उत्पन्न होता है।
आंवला (Indian Gooseberry) को आयुर्वेद में "जीवन रक्षक फल" कहा गया है। यह स्वाद में खट्टा, कसैला और हल्का तीखा होता है तथा इसकी प्रकृति शीतल मानी जाती है। आंवला केवल एक स्वादिष्ट फल ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सौंदर्य और दीर्घायु प्रदान करने वाली एक उत्कृष्ट आयुर्वेदिक औषधि भी है। भोजन में चटनी, अचार, मुरब्बा, रस और चूर्ण के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद में इसे रसायन माना गया है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर स्वास्थ्य की रक्षा करता है।
सर्दियों का मौसम आमतौर पर सेहत बनाने वाला मौसम माना जाता है। ठंडी हवाएं, गर्म कपड़े और स्वादिष्ट व्यंजन इस मौसम को खास बनाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सर्दियों के दौरान कुछ लोगों में अवसाद (Depression) या मौसमी डिप्रेशन (Seasonal Depression) की समस्या भी बढ़ सकती है? अक्सर लोग बिना किसी स्पष्ट कारण के उदासी, थकान, चिड़चिड़ापन और नकारात्मक सोच का अनुभव करने लगते हैं। कई बार यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि व्यक्ति को चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता पड़ती है। आइए विस्तार से जानते हैं कि सर्दियों में डिप्रेशन क्यों बढ़ता है, इसके लक्षण क्या हैं और इससे बचने के लिए क्या उपाय अपनाए जा सकते हैं।
आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में आंखों की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर और अनियमित खान-पान के कारण बच्चों से लेकर बड़ों तक को कम उम्र में ही चश्मा लगाना पड़ रहा है। आंखें हमारे शरीर का छोटा सा हिस्सा हैं, लेकिन इनके बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। इसलिए समय रहते आंखों की देखभाल करना बेहद जरूरी है। इस लेख में हम जानेंगे कि दृष्टिदोष (Eye Problems) के कारण क्या हैं, आंखों की रोशनी कैसे बढ़ाएं और नेत्रों को स्वस्थ रखने के लिए कौन-कौन से घरेलू व प्राकृतिक उपाय अपनाए जा सकते हैं।
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, अनियमित खान-पान, तनाव और जंक फूड के बढ़ते प्रचलन के कारण अम्लपित्त (एसिडिटी) एक सामान्य लेकिन गंभीर समस्या बनती जा रही है। बहुत से लोग सीने में जलन, खट्टी डकार, पेट में भारीपन और गैस जैसी समस्याओं को साधारण समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन बार-बार होने वाली एसिडिटी भविष्य में गैस्ट्राइटिस, अल्सर और अन्य पाचन संबंधी विकारों का कारण बन सकती है। आयुर्वेद में अम्लपित्त को पित्त दोष की वृद्धि से उत्पन्न होने वाला रोग माना गया है। जब शरीर में पित्त की मात्रा असंतुलित हो जाती है और आमाशय में अम्ल (Acid) का स्राव अत्यधिक होने लगता है, तब भोजन का पाचन प्रभावित होता है और अम्लपित्त की समस्या उत्पन्न होती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसे एसिडिटी, एसिड रिफ्लक्स या हाइपरएसिडिटी के नाम से भी जाना जाता है।
त्वचा हमारे शरीर का सबसे बड़ा अंग है, जो हमें बाहरी संक्रमण, धूल, गर्मी, सर्दी और अन्य हानिकारक तत्वों से सुरक्षा प्रदान करती है। आयुर्वेद में त्वचा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि यह केवल शरीर की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि हमारे स्वास्थ्य और सौंदर्य का भी दर्पण होती है। जब त्वचा में दोषों का असंतुलन हो जाता है, तब अनेक त्वचा रोग उत्पन्न हो सकते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख रोग है एक्जीमा (Eczema), जिसे आयुर्वेद में पामा, छाजन, चम्बल, अकौता, अपरस या पानीवात के नाम से भी जाना जाता है। एक्जीमा कोई जानलेवा बीमारी नहीं है, लेकिन यह लगातार खुजली, जलन और त्वचा की खराब स्थिति के कारण व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से काफी परेशान कर सकती है।
आज भी भारत के लाखों परिवार छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए घरेलू नुस्खों का सहारा लेते हैं। आयुर्वेद और पारंपरिक ज्ञान में ऐसे अनेक उपाय बताए गए हैं जो सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं में सहायक माने जाते हैं। हालांकि किसी भी गंभीर बीमारी में चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है। यहां प्रस्तुत हैं 30 लोकप्रिय घरेलू नुस्खे, जिन्हें पीढ़ियों से अपनाया जाता रहा है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग स्वाद और सुविधा के लिए कई ऐसे खाद्य पदार्थों का एक साथ सेवन कर लेते हैं, जिन्हें आयुर्वेद में "विरुद्ध आहार" कहा गया है। आयुर्वेद के अनुसार कुछ खाद्य पदार्थ और जीवनशैली की आदतें एक-दूसरे के विपरीत प्रभाव वाली होती हैं। इनका लगातार सेवन शरीर में विषैले तत्व (आम), पाचन विकार, त्वचा रोग, मोटापा, एलर्जी तथा कई अन्य बीमारियों का कारण बन सकता है। आइए जानते हैं आयुर्वेद द्वारा बताए गए ऐसे 18 विरुद्ध आहार-विहार, जिनसे स्वस्थ रहने के लिए बचना चाहिए।
प्राचीन काल से ही मानव सुंदरता के प्रति अत्यंत सजग रहा है। स्त्रियाँ ही नहीं, पुरुष भी अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने के लिए विभिन्न उपाय अपनाते रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो आयुर्वेद में केशवर्धक कल्पों, वर्णप्रसादक योगों तथा सौंदर्यवर्धक उपचारों का इतना विस्तृत वर्णन उपलब्ध नहीं होता। आयुर्वेद के अनुसार सुंदरता केवल चेहरे की चमक या बाहरी आकर्षण का नाम नहीं है, बल्कि उत्तम स्वास्थ्य, संतुलित मन, सुडौल शरीर और तेजस्वी व्यक्तित्व का समन्वित रूप ही वास्तविक सौंदर्य कहलाता है।
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