आंत्रपुच्छ शोथ अर्थात अपेंडिसाइटिस होने पर आधुनिक चिकित्सक तुरंत शल्य चिकित्सा की सलाह देते हैं, लेकिन आयुर्वेद चिकित्सक वनौषधियों द्वारा इस विकृति को शांत करने का प्रयास करते हैं। आधुनिक चिकित्सा के अनुसार अपेंडिक्स शरीर का विशेष उपयोगी अंग नहीं है और यह बिना रक्तसंचार के निष्क्रिय रहता है। इसलिए किशोरावस्था में इसे शल्यक्रिया द्वारा निकाल देने की सलाह दी जाती है।
परंतु आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार आंत्रपुच्छ शरीर के लिए अत्यंत उपयोगी अंग है। इसमें बनने वाले स्त्राव वृहदांत्र की आकुंचन क्षमता बढ़ाते हैं तथा शरीर की रक्षात्मक क्रियाओं में सहायक होते हैं। आंत्रपुच्छ में लसीका-तंतु अधिक मात्रा में होने से यह जीवाणुनाशक क्रियाओं में सक्रिय रहता है। इसे निकाल देने पर अजीर्ण, अपचन और कोष्ठबद्धता अधिक होती है। प्लीहा की तरह आंत्रपुच्छ भी शरीर की रक्षा करता है।
वृहदांत्र के प्रारंभिक भाग को उण्डूक कहा जाता है। शैशव में इसका आकार बड़ा होता है, पर आयु के साथ घटते-घटते किशोरावस्था में लगभग 4 अंगुल रह जाता है। इसका व्यास लगभग चौथाई इंच होता है। आंत्रपुच्छ की लंबाई जितनी अधिक होती है, उपांत्र का आकार भी उसी पर निर्भर करता है।
उण्डूक का अंतिम भाग बंद होता है। यदि कोई पदार्थ इसमें पहुँच जाए तो वापस नहीं निकल पाता। इसी कारण नींबू–संतरे के बीज, मटर, चना, मूंगफली या किसी कठोर खाद्य पदार्थ का टुकड़ा फँसकर शोथ और तीव्र शूल उत्पन्न करता है।
आयुर्वेद में इसे मुख्यतः कोष्ठबद्धता से उत्पन्न माना गया है। मल लंबे समय तक रुकने पर उसमें सड़न पैदा होती है और विषैले जीवाणु आंत्रपुच्छ तक पहुँचकर संक्रमण उत्पन्न करते हैं। इससे मवाद (पूय) बनता है, शोथ बढ़ता है और तीव्र, असहनीय शूल होता है।
संतरे–नींबू के बीज, मटर–चना–मूंगफली जैसे पदार्थ भी रास्ता बंद कर शोथ बढ़ाते हैं। मांस-मछली खाने वालों में आंत्रपुच्छ शोथ अधिक पाया जाता है, क्योंकि दूषित मांस में तीव्र जीवाणु संक्रमण तेजी से होता है।
दूषित मांस–मछली से उपांत्र की आंतरक श्लेष्मिक कला में शोथ उत्पन्न होता है। विकृति बढ़ते-बढ़ते व्रण-शोथ का रूप लेती है। आंत्रपुच्छ का छिद्र संकीर्ण हो जाता है, जीवाणुओं का विषक्रमण बढ़ता है, मवाद बनता है और तीव्र शूल प्रकट होता है। डिब्बाबंद मांस-मछली खाने वालों में भी खतरा अधिक रहता है।
गलग्रंथियों के दाह, दाँतों के रोग, भोजन को ठीक से न चबाने, अचानक गिरने, बेसिली कोलाई जैसे जीवाणुओं की सक्रियता से भी उपांत्र शोथ उत्पन्न हो सकता है।
आंत्रपुच्छ में शोथ होते ही तीव्र शूल होता है। शूल नाभि से शुरू होकर दाहिनी ओर बढ़ता है। बाद में पूरा पेट दुखता है। रोगी को जी मिचलाना, उल्टी, सिरदर्द, दाहिनी जांघ में दर्द, दाहिनी टांग मोड़ने पर असहनीय पीड़ा होती है।
हल्का ज्वर 99°F से शुरू होकर मवाद बढ़ने पर 100–103°F तक पहुँचता है। गंभीर अवस्था में 105°F ज्वर भी हो सकता है।
पेट दबाने पर दाहिनी ओर अत्यधिक पीड़ा होती है। स्नायु कठोर महसूस होते हैं। कोष्ठबद्धता अधिक रहती है। कभी अतिसार भी होता है।
दाहिनी जंघा-मूल के कौड़ी प्रदेश पर दबाने से असहनीय शूल होता है। चिकित्सक इसे ‘शेरेन्स त्रिभुज’ मानते हैं।
नाड़ी की गति सामान्यतः 120 प्रति मिनट, पर यदि 140 तक पहुँच जाए तो शल्यचिकित्सा आवश्यक हो जाती है।
मूत्र परीक्षण में रक्तकण, मवाद, एल्ब्यूमिन दिखाई देते हैं। मवाद पेट में फैल जाए तो ‘पेरिटोनाइटिस’ होता है—यह अत्यंत गंभीर व जीवनघातक अवस्था है। पेट फूल जाता है, सांस लेने में कठिनाई, तेज ज्वर, तेज नाड़ी और पूरे शरीर में विषाक्तता फैलने लगती है।
आंत्रपुच्छ फट जाए या छिद्र बंद होकर मल भीतर रुक जाए, तो तत्काल शल्यक्रिया आवश्यक है, अन्यथा मृत्यु तक हो सकती है।
आयुर्वेदिक चिकित्सक रोगी को उपवास कराते हैं ताकि शूल कम हो। छोटी-छोटी मात्रा में जल चम्मच से दिया जाता है। दो–तीन दिन बाद मूंग, जौ, कुल्थी का सूप दिया जाता है। नींबू, संतरा, मौसंबी का रस भी दे सकते हैं।
एक सप्ताह बाद चौलाई की सब्जी, दाल–चावल, दलिया, हल्का सूप, अंगूर–सेब–अनार का रस दिया जा सकता है।
रोगी को अधिक आराम, परिश्रम से बचाव, एनीमा द्वारा मलावरोध शमन, सूर्य-संस्कृत जल (हरी–पीली बोतल का जल) उपयोगी होता है।
अपेंडिसाइटिस (आंत्रपुच्छ) पर सफल प्रयोग —
अपेंडिसाइटिस का डॉक्टर लोग ऑपरेशन करने की सलाह देते हैं, पर अब इसकी आवश्यकता नहीं। इस अनुभूत उपचार को अपनाइए, यह परीक्षित नुस्खा है। जिन्होंने इसको अपनाया है, पूर्ण लाभ उठाया है। जंगल की एक बूटी बन तुलसा है। उसको पीसकर लुगदी बनाकर किसी लोहे की करछुल आदि पर इसको गर्म करके (भूनकर नहीं) उस पर थोड़ा सा नमक छिड़क दें और दर्द के स्थान पर उस लुगदी की टिकिया को रखकर 48 घंटे में तीन बार बदलकर बांधे। इस बीच रोगी को आराम करना चाहिए। इस 48 घंटे की उपचार के बाद रोग सदैव के लिए जाता रहेगा।
➡ प्रातः – आरोग्यवर्द्धिनी रस 2 गोली + त्रिफला गुग्गुल 2 गोली (खरल में पीसकर जल से)।
➡ शाम – यही मात्रा।
➡ दशमूलारिष्ट 15ml + पुनर्नवारिष्ट 15ml + उतना ही जल — सुबह–शाम।
➡ भोजन के बाद — अग्नितुंडी वटी 2 गोली (अधिक शोथ में 4 गोली)।
➡ अधिक ज्वर व तीव्र शूल में — वृहत वातचिंतामणि रस (तुलसी-पत्र रस के साथ)।
➡ बंगभस्म 120–125mg + शहद — सुबह–शाम।
➡ बंगभस्म 120–125mg + शिलाजीत 120–125mg — 2–2 गोली सुबह–शाम।
➡ अभ्रक भस्म + चंद्रप्रभावटी — जल के साथ।
➡ पुनर्नवा मंडूर ½ ग्राम + लौह भस्म 120mg + योगराज गुग्गुल 240–250mg + शंखभस्म 240mg
→ खरल में पीसकर पुनर्नवा काढ़े के साथ — सुबह–शाम।
➡ पुनर्नवा मूल, हींग, सौवर्चल लवण, सोंठ, भुना सुहागा — सभी बराबर।
→ सहिजन मूल के रस में घोंटकर गोलियाँ बनाएं → 4 बार, 3-3 घंटे पर।
➡ शूल-वर्जिनी वटी / शूल गज केसरी / अग्नितुंडी वटी — शूल, वमन, ज्वर में उत्तम।
-सभी औषधियाँ योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की देखरेख में लें।
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