आजकल पेट से जुड़ी समस्याएं बहुत आम हो गई हैं। गैस, पेट फूलना, कब्ज, अपच, भारीपन, अनियमित bowel movement और खाने के बाद असहजता जैसी परेशानियां कई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। इसका एक कारण हमारी बदलती lifestyle भी हो सकती है—अनियमित भोजन, कम physical activity, कम फाइबर वाला भोजन, ज्यादा processed foods, तनाव और देर रात तक जागना। पाचन तंत्र केवल भोजन को पचाने का काम नहीं करता। हमारे gastrointestinal tract
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में अच्छी नींद केवल आराम का विषय नहीं रह गई है, बल्कि overall wellness का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। देर रात तक मोबाइल चलाना, काम का तनाव, अनियमित भोजन, बदलती दिनचर्या और लगातार स्क्रीन के सामने रहने की आदत के कारण बहुत से लोग अपनी नींद की गुणवत्ता को लेकर परेशान रहते हैं। 2026 में wellness की चर्चा में sleep और recovery प्रमुख विषयों में शामिल हैं। भारत में भी health और wellness का focus केवल बीमारी के इलाज से आगे बढ़कर daily habits, preventive care और बेहतर lifestyle की ओर जा रहा है।
अभ्रक प्रायः पर्वतों पर पाया जाता है। भारतवर्ष में सफेद, भूरा और काले रंग का अभ्रक मिलता है। बिहार प्रान्त में हजारीबाग और गिरिडीह तथा बंगाल में रानीगंज के आसपास कोयले की खानों के अन्दर मिलता है। राजस्थान में चित्तौड़ और भीलवाड़ा में इसकी खानें हैं। यह तह पर तह जमे हुए बड़े-बड़े ढोकों (स्थानों) में पहाड़ों में मिलता है। साफ करके निकालने पर इसकी तह काँच की तरह निकलती है। इसके पत्र पारदर्शक, मृदु और सरलता से पृथक्-पृथक् किये जा सकते हैं। आयुर्वेद में इसकी गणना महारसों में की गयी है। भस्म बनाने के लिए वज्राभ्रक (काला अभ्रक) काम में लिया जाता है। वज्राभ्रक में लोहे का अंश विशेष होने से इसकी भस्म बहुत गुणदायक होती है।
आयुर्वेद में वात दोष को शरीर की गति, स्नायु-तंत्र की गतिविधियों, संचार, संकुचन-प्रसारण तथा विभिन्न शारीरिक क्रियाओं का प्रमुख नियंत्रक माना गया है। जब वात दोष अत्यधिक विकृत या क्षुब्ध हो जाता है, तब शरीर में अनेक प्रकार के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। इनमें तीव्र शूल, अंगों में खिंचाव, अकड़न, झनझनाहट, बेचैनी, गति में कठिनाई तथा विभिन्न प्रकार की वातजन्य पीड़ा प्रमुख हैं। महावातविध्वंसक रस का वर्णन पारंपरिक आयुर्वेदिक रसौषधि परंपरा में एक शक्तिशाली वातशामक एवं शूलहर योग के रूप में मिलता है। इसका उल्लेख विशेष रूप से तीव्र वातक्षोभ, विभिन्न प्रकार के शूल तथा वात प्रधान अवस्थाओं में किया गया है। हालाँकि, यह सामान्य घरेलू औषधि नहीं है। पारंपरिक विवरण में इसमें शुद्ध पारद, शुद्ध गंधक,
चन्द्रप्रभा वटी आयुर्वेद की प्रसिद्ध पारंपरिक औषधियों में से एक मानी जाती है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका वर्णन मुख्य रूप से मूत्रवह संस्थान, प्रमेह, मूत्र संबंधी विकार, पाचन शक्ति तथा शरीर के सामान्य बल-पोषण से जुड़े विभिन्न प्रयोगों के संदर्भ में मिलता है। इसमें अनेक वनौषधियों के साथ खनिज एवं अन्य आयुर्वेदिक द्रव्यों का भी प्रयोग किया जाता है।
आरोग्यवर्द्धिनी बटी आयुर्वेद की प्रसिद्ध पारंपरिक औषधियों में से एक मानी जाती है। आयुर्वेदिक ग्रंथों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में इसका उपयोग विशेष रूप से अग्निमांद्य, अजीर्ण, यकृत की कमजोरी, शोथ, मेद-विकार तथा कुछ त्वचा संबंधी विकारों में किया जाता रहा है। “आरोग्यवर्द्धिनी” नाम से ही इसका अर्थ स्वास्थ्य को बढ़ाने वाली औषधि से जुड़ा हुआ है। पारंपरिक
वृद्धिबाधिका बटी का उल्लेख पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा में ऐसे योग के रूप में मिलता है जिसका संबंध मुख्यतः वृद्धि रोग, विशेषकर अण्डवृद्धि (अण्डकोष/अण्डथैली की सूजन), वायुजन्य अण्डवृद्धि तथा आंत्रवृद्धि (हर्निया) जैसे विकारों से बताया गया है। पारंपरिक ग्रंथों में वृद्धि रोग को वात आदि दोषों से संबंधित विकारों के रूप में समझाया गया है और इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन मिलता है। अण्डकोष या अण्डथैली में अचानक या धीरे-धीरे सूजन आना कई अलग-अलग कारणों से हो सकता है। यह केवल साधारण वात-विकार नहीं होता। इसके पीछे हाइड्रोसील, हर्निया, संक्रमण, चोट, वैरिकोसील, एपिडिडिमिस की समस्या या कभी-कभी आपातकालीन स्थिति जैसे टेस्टिकुलर टॉर्शन भी हो सकता है। इसलिए अण्डकोष में नई सूजन दिखाई देने पर केवल घरेलू उपचार या किसी औषधि पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय जाँच आवश्यक है।
आयुर्वेद में शरीर में उत्पन्न होने वाली सूजन, पाण्डु रोग, मन्दाग्नि, कब्ज, उदर विकार तथा शरीर में जल के असामान्य संचय जैसी स्थितियों के लिए अनेक पारंपरिक औषधि-योगों का वर्णन मिलता है। पुनर्नवादि मण्डूर भी ऐसा ही एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योग है, जिसमें पुनर्नवा तथा मण्डूर भस्म के साथ अनेक उपयोगी औषधीय द्रव्यों का समावेश किया गया है। आयुर्वेदिक परंपरा में पुनर्नवादि मण्डूर का विशेष उल्लेख शोथ (सूजन) और पाण्डु रोग से संबंधित उपचार में मिलता है। इसके अतिरिक्त इसका प्रयोग उदर संबंधी विकारों, प्लीहा-वृद्धि, मन्दाग्नि, कब्ज तथा कुछ अन्य वात-कफ प्रधान विकारों में भी चिकित्सकीय निर्देशानुसार किया जाता रहा है। इस योग में प्रयुक्त पुनर्नवा को आयुर्वेद में विशेष रूप से शोथहर अर्थात सूजन को कम करने वाले
प्रौढ़ावस्था में शरीर में होने वाले परिवर्तन स्वाभाविक हैं। उम्र बढ़ने के साथ शारीरिक शक्ति, पाचन क्षमता, मांसपेशियों की ताकत, नींद, मानसिक उत्साह और दैनिक कार्य करने की क्षमता में कुछ कमी आ सकती है। स्त्री हो या पुरुष, एक निश्चित आयु के बाद कई लोग स्वयं को पहले की तुलना में अधिक थका हुआ और कमजोर महसूस करने लगते हैं। कई पुरुषों को इस अवस्था में अपने वैवाहिक जीवन से संबंधित असहजता का भी अनुभव हो सकता है। महिलाओं में भी हार्मोनल और शारीरिक परिवर्तनों के कारण ऊर्जा में कमी, नींद की समस्या, मन में चिड़चिड़ापन तथा वैवाहिक संबंधों में असुविधा जैसी समस्याएं हो सकती हैं। हालांकि ऐसी समस्याओं के बारे में बात करने में आज भी बहुत से लोग संकोच करते हैं।
पेप्टिक अल्सर को लेकर लोगों के मन में तरह-तरह की भ्रांतियां रहती हैं। कुछ लोग इसे पेट का फोड़ा समझते हैं, तो कुछ इसे कैंसर का एक रूप मान लेते हैं। वहीं कई लोग इसे केवल आंतों की बीमारी समझकर लंबे समय तक परेशान रहते हैं। वास्तव में पेप्टिक अल्सर क्या है? यह शरीर में कहां बनता है? इसके प्रमुख कारण क्या हैं? इसके लक्षण कैसे पहचाने जा सकते हैं और इससे बचाव के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? इन सभी सवालों को समझना जरूरी है, क्योंकि समय पर पहचान और उचित उपचार से पेप्टिक अल्सर की अधिकांश स्थितियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
आज की बदलती जीवनशैली में कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या बन चुका है, जिसके बारे में लगभग हर व्यक्ति ने कभी न कभी सुना है। अनियमित खान-पान, अत्यधिक तला-भुना भोजन, शारीरिक गतिविधि की कमी, बढ़ता मोटापा, तनाव, धूम्रपान और मधुमेह जैसी स्थितियां हृदय एवं रक्तवाहिनियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न रहता है कि आखिर प्रतिदिन हमें क्या और कितना खाना चाहिए ताकि भोजन शरीर को पोषण दे, ऊर्जा प्रदान करे और बीमारी का कारण न बने। केवल पेट भर लेना ही पर्याप्त नहीं है। शरीर के प्रत्येक अंग को आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा में मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पाँव की उँगलियों के बीच घाव होना एक आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या है। कई लोगों को उँगलियों के बीच खुजली, जलन, लालिमा, त्वचा का सफेद पड़ना, त्वचा का गलना, छिलना, दरार पड़ना या दर्द होने की शिकायत रहती है। कुछ लोगों में यह समस्या कुछ दिनों में ठीक हो जाती है, जबकि कुछ लोगों को बार-बार उँगलियों के बीच घाव बनते रहते हैं। गर्म और नमी वाले वातावरण में यह समस्या अधिक दिखाई दे सकती है। पसीने से पैर गीले रहना, लंबे समय तक बंद जूते पहनना, गीले मोजे पहनना और पैर धोने के बाद उँगलियों के बीच की जगह को ठीक से न सुखाना इसके प्रमुख कारणों में शामिल हो सकते हैं।
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