आज के समय में हायपर एसिडिटी एक बहुत ही सामान्य लेकिन गंभीर होती जा रही समस्या है। इसे आम भाषा में खट्टी डकारों की बीमारी कहा जाता है, जबकि आयुर्वेद में इसे अम्लपित्त कहा गया है।
यह रोग मुख्य रूप से आमाशय (स्टमक) में अत्यधिक अम्ल बनने के कारण होता है, जिससे व्यक्ति को गले और छाती में जलन महसूस होती है।
हायपर एसिडिटी वह स्थिति है जिसमें पेट में जरूरत से ज्यादा एसिड बनता है।
इसकी वजह से शरीर में कई असहज लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे:
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, गलत खान-पान और अनियमित दिनचर्या इस बीमारी को बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रही है।
आजकल लोग:
इसी कारण भोजन के बाद या कभी भी खट्टी डकारें और जलन जैसी समस्या आम हो गई है।
? यह समस्या खासकर इन लोगों में ज्यादा देखी जाती है:
भारतीय चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद) के अनुसार, यह रोग पित्त दोष के कुपित होने से होता है।
मुख्य कारण:
अम्लपित्त को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
यदि इसका सही समय पर उपचार न किया जाए तो यह गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है, जैसे:
आजकल एलोपैथी में एंटासिड (Antacids) का उपयोग किया जाता है, जो पेट के अम्ल को कम करते हैं।
उदाहरण:
इन चीजों से पूरी तरह बचना चाहिए:
इन चीजों का सेवन लाभकारी होता है:
? कुछ समय के लिए दुग्धाहार (Milk Diet) भी लाभकारी माना गया है।
सूखे आंवले का चूर्ण 2–4 ग्राम, दिन में 2–3 बार दूध या ठंडे पानी के साथ लें।
ताजा रस उपलब्ध हो तो 6 ग्राम लें।
150–500 मि.ली. दिन में दो बार।
2–5 ग्राम चूर्ण, गुड़ और गुनगुने पानी के साथ।
काढ़ा बनाकर 12–20 मि.ली. दिन में दो बार।
काढ़ा बनाकर 12–20 मि.ली. दिन में दो बार।
चूर्ण 2–4 ग्राम, अदरक रस के साथ।
30 बूंद, दिन में दो बार।
काढ़ा 12–18 मि.ली. दिन में दो बार।
काढ़ा 12–20 मि.ली. मधु के साथ।
14–22 मि.ली. दिन में दो बार।
काढ़ा 12–20 मि.ली.
1–3 ग्राम मिश्री के साथ।
काढ़ा, मसालों के साथ भोजन में।
काढ़ा 12–20 मि.ली.
काढ़ा दिन में दो बार।
1–2 ग्राम मधु के साथ।
12–18 मि.ली. शर्करा के साथ।
3–6 ग्राम चूर्ण।
3–5 ग्राम मधु या घी के साथ।
आधा या एक गिलास, दिन में 1–2 बार।
हायपर एसिडिटी यानी अम्लपित्त आज के आधुनिक समाज की एक आम लेकिन गंभीर समस्या बन चुकी है।
यदि सही समय पर इसका उपचार और खान-पान में सुधार किया जाए, तो इसे पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।
आयुर्वेदीय उपचार चिकित्सा टीम
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