आज के समय में चर्म रोग (Skin Diseases) बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। खुजली, दाद, एक्जिमा, सोरायसिस, फंगल इन्फेक्शन, एलर्जी, पित्ती, सफेद दाग, मुंहासे और त्वचा पर लाल चकत्ते जैसी समस्याएं लगभग हर घर में देखने को मिलती हैं। पहले लोग इन्हें सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते थे, लेकिन अब ये रोग लंबे समय तक बने रहते हैं और बार-बार वापस आते हैं।
इसीलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि चर्म रोग आखिर क्यों होते हैं, किन लोगों को अधिक होते हैं, और आयुर्वेद में इनके स्थायी समाधान क्या बताए गए हैं।
संहिता ग्रंथों में महा कुष्ठ या गलित कुष्ठ को पूर्व जन्म के पापों का परिणाम माना गया है। इसके अतिरिक्त गुरु, देव, द्विजों की अवमानना, तीर्थस्थलों को अपवित्र करना आदि भी कारण बताए गए हैं। हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इन कारणों को स्वीकार नहीं करता, लेकिन आयुर्वेद यह मानता है कि शरीर के दोष, विशेषकर रक्तदोष, पित्तदोष और कफदोष के बिगड़ने से चर्म रोग उत्पन्न होते हैं।
जब शरीर में रक्त अशुद्ध हो जाता है, पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है और विषैले तत्व जमा होने लगते हैं, तब त्वचा पर खुजली, दाद, फोड़े-फुंसी, एलर्जी, चकत्ते और अन्य चर्म रोग दिखाई देने लगते हैं।
महा कुष्ठ और विभिन्न चर्म रोगों के अनेक कारणों में विरुद्ध आहार सबसे प्रमुख माना गया है। विरुद्ध आहार का अर्थ है ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन जो एक-दूसरे के विपरीत प्रभाव वाले हों।
जैसे—
ये सभी शरीर में रक्त को दूषित करते हैं और त्वचा रोगों को जन्म देते हैं।
अहित औषध यानी ऐसी दवाइयाँ जो शरीर के लिए हानिकारक हों। बिना डॉक्टर की सलाह के बार-बार एंटीबायोटिक लेना, स्टेरॉइड युक्त क्रीम लगाना, कॉर्टिसोन आधारित दवाइयाँ और तेज प्रभाव वाली आधुनिक औषधियाँ त्वचा रोगों को बढ़ा देती हैं।
ये दवाइयाँ कुछ समय के लिए आराम देती हैं, लेकिन बाद में रोग और अधिक गंभीर रूप में वापस आता है। विशेष रूप से एलर्जी और एक्जिमा में स्टेरॉइड का अधिक प्रयोग खतरनाक माना जाता है।
गंदगी और प्रदूषण चर्म रोगों के सबसे बड़े कारणों में से एक हैं। धूल, मिट्टी, पसीना, सीलन, उमस, गंदे कपड़े, गंदे बिस्तर और अस्वच्छ वातावरण त्वचा पर बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण बढ़ाते हैं।
विशेष रूप से—
इन सब कारणों से दाद, खुजली, फंगल इन्फेक्शन और एलर्जी तेजी से फैलती है।
आजकल फैशन के कारण लोग सूती कपड़ों की जगह पॉलिस्टर, नायलॉन और अन्य सिंथेटिक वस्त्रों का अधिक उपयोग करते हैं। ये वस्त्र त्वचा को हवा नहीं लगने देते, जिससे पसीना रुकता है और त्वचा रोग बढ़ते हैं।
हमेशा मोजे पहनना, टाई का अधिक प्रयोग करना, नायलॉन के जूते, रबर के सैंडल, प्लास्टिक की चप्पल पहनना भी त्वचा रोगों का कारण बनता है।
विशेष रूप से महिलाओं में पॉलिस्टर वस्त्र और नायलॉन के अंतर्वस्त्रों के कारण एलर्जी, खुजली और फंगल संक्रमण अधिक देखे जाते हैं।
आजकल घरों में प्लास्टिक, रबर और फोम का उपयोग बहुत बढ़ गया है। जैसे—
इनका लगातार उपयोग शरीर को अप्राकृतिक वातावरण में रखता है और धीरे-धीरे त्वचा रोग उत्पन्न करता है।
फास्ट फूड आज चर्म रोगों का छिपा हुआ बड़ा कारण है। पिज्जा, बर्गर, चिप्स, कोल्ड ड्रिंक, पैकेटबंद भोजन, अत्यधिक मसालेदार भोजन और बार-बार बाहर का खाना शरीर में विषैले तत्वों को बढ़ाता है।
बासी भोजन भी चर्म रोगों को जन्म देता है। कई बार गर्म किया गया भोजन, पुराना भोजन या खराब भोजन रक्त को दूषित करता है।
गर्मियों में लगातार रूम कूलर, डेजर्ट कूलर और एयर कंडीशनर में रहना भी त्वचा की प्राकृतिक नमी और संतुलन को बिगाड़ देता है।
महंगे साबुन, फेस पैक, पाउडर, क्रीम, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और स्टेरॉइड युक्त आधुनिक क्रीम त्वचा को धीरे-धीरे कमजोर बनाती हैं।
फैशन के नाम पर उपयोग किए जाने वाले ये उत्पाद तुरंत चमक तो देते हैं, लेकिन बाद में त्वचा को पतला, संवेदनशील और रोगग्रस्त बना देते हैं।
कॉर्टिसोन युक्त क्रीमों का बार-बार प्रयोग विशेष रूप से हानिकारक माना जाता है।
जो तरुणियाँ और स्त्रियाँ सदा पॉलिस्टर वस्त्र तथा नायलॉन के अंतर्वस्त्र पहनती हैं, वे अधिक चर्म रोगों से पीड़ित होती हैं।
जो महिलाएँ चटपटे, मसालेदार भोजन, अधिक वसा वाले आमिष भोजन तथा अंडों का अधिक सेवन करती हैं, उनमें भी त्वचा रोग जल्दी उत्पन्न होते हैं।
तैलीय भोजन और गरिष्ठ आहार शरीर में पित्त और रक्तदोष बढ़ाता है, जिसका सीधा प्रभाव त्वचा पर दिखाई देता है।
जिन्हें पोषक आहार नहीं मिलता, जो उमस, कीचड़, सीलन और अंधेरे में रहते हैं, उनमें चर्म रोग अधिक पाए जाते हैं।
जो लोग—
वे लगातार धूल, रसायनों और प्रदूषण के संपर्क में रहते हैं, इसलिए अनेक प्रकार के चर्म रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।
आरोग्यवर्द्धनी वटी, महा मजिस्ठादि क्वाथ, रस सिन्दूर, रस माणिक्य, पंचतिक्त घृत गुग्गुल, महातिक्त घृत, निंबादी चूर्ण, हरिद्राखंड, अनूर्जता (एलर्जीजन्य रोगों में) खदिरारिष्ट, सारिवाद्धासव, ताल सिंदूर, व्याधि हरण रसायन कैशोर गूगल आदि हैं।
महातिपुरा निवादि चूर्णर (अनुता/एमजीजना रोगों में दि सारिवाद्यारा ताल सिन्दुर रसायन कैशोर गूगल आदि है।
आयुर्वेद विज्ञान के प्राचीन ग्रंथों में चर्म रोगों, रति रोगों, रक्तरोगों का प्रथक से विवेचन या वर्णन नहीं मिलता, परन्तु अष्ट महारोगों में कुष्ठ रोग का बड़ा विस्तृत विवेचन है।
ताल चंद्रोदय, ताल सिन्दूर, रस माणिक्य, माणिक्य रस, शिला सिन्दूर तथा रति जन्य चर्म रोगों में अष्ट मूर्ति रसायन, तथा व्याधि हरण रसायन, स्वर्ण वंग, इत्यादि।
कुष्ठ हर रस, शुद्ध गंधक, गंधक रसायन, स्वर्ण क्षीरी रस, मंजिष्ठादि क्वाथ, ताल सिन्दूर, हरताल भस्म, शुभ्रा भस्म, गलत्कुष्ठारि रस, पीतल भस्म, त्रैलोक्य चिंतामणि रस, कुष्ठ कुठार रस, वीर चंडेश्वर रस, अश्वकंचुकी रस, प्रवालपिष्टी, तालकेश्वर रस अहिवध रस, इत्यादि।
मल्लातकावलेह पंचतिक्त घृत गुग्गुल, कैशोर गूगल, मल्लादि वटी. इत्यादि।
वाकुच्यादि चूर्ण, नारसिंह चूर्ण, मंजिष्ठादि चूर्ण, निंबादि चूर्ण, मदयन्त्यादि चूर्ण, पंच निबादि चूर्ण, दशांग लेप, चंद्रप्रभा उबटन, अमृतारिष्ट, खदिरारिष्ट, मंजिष्ठाद्यरिष्ट, सारिवाद्यासव, सारिवादिहिम, रक्तशोधकारिष्ट, लोध्रासव, वृहद् मंजिष्ठादि क्वाथ इत्यादि।
महातिक्त घृत, कासीसादि घृत, महाखदिरादि घृत, कासीसादि तैल, निंबादि तैल, चालमोंगरा तैल. श्वेत करवीराद्य तैल, मरिच्यादि तैल, करंज तैल, मनः शिलादि तैल, चर्मदलारि तैल, भृंगराज तैल, चर्मरोग नाशक तैल, सोमराजी तैल, कुंकुमादि तैल, किंशुकादि तैल, निशादि तैल, महासिन्दूराद्य तैल, वृहद मरिच्यादि तैल, दद्रुदावानल लेप, मदयंतिकादि लेप, सिन्दूरादि लेप, पामाहर लेप, गुलाबी मलहम, पारदादि लेप मलहम, करंज तैलादि मलहम, विपादिकाहर मलहम, कण्डूनाशक योग, गंधक मलहम, यशद मलहम, टंकण मलहम, आदि।
इन रोगों से पूर्ण मुक्ति केवल क्रीम लगाने से नहीं होती। इसके लिए खान-पान, रहन-सहन और जीवनशैली बदलना आवश्यक है।
चिकित्सक के परामर्श से लंबे समय तक—
का उचित प्रयोग करना चाहिए।
साथ ही—
ये सभी उपाय स्थायी राहत देते हैं।
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