नीम (Azadirachta indica) को आयुर्वेद में “सर्वरोगनिवारिणी” अर्थात अनेक रोगों को दूर करने वाला वृक्ष कहा गया है। यह कड़वा होने पर भी अत्यंत गुणकारी है। आयुर्वेद में इसे तिक्त (कड़वा), कषाय (कसैला), रक्तशोधक, कृमिनाशक, ज्वरनाशक, विषनाशक और त्वचारोगनाशक माना गया है।
नीम के पत्ते, छाल, बीज, फूल, फल और तेल — सभी भाग औषधि के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
यदि ज्वर लंबे समय से बना रहे और सामान्य औषधियों से लाभ न हो, तो नीम उपयोगी सिद्ध होता है।
विधि:
नीम की अंतरछाल – 10 ग्राम
पानी – 500 मि.ली.
इसे उबालकर 50 मि.ली. शेष रहने पर छान लें।
सेवन: प्रातः खाली पेट।
लाभ: कुछ दिनों में ज्वर का अवशेष दोष निकल जाता है और शरीर हल्का महसूस होता है।
नीम रक्त को शुद्ध कर पित्तजन्य ज्वर को शांत करता है।
पित्ती में त्वचा पर लाल चकत्ते, जलन और खुजली होती है।
उपचार:
नीम तेल में कपूर मिलाकर हल्की मालिश करें।
लाभ: जलन, सूजन और खुजली में शीघ्र आराम मिलता है।
पुराने या संक्रमित घाव जो अन्य दवाओं से ठीक न हों —
उपचार:
नीम की ताजी पत्तियों को पीसकर पुल्टिस बनाकर बांधें।
लाभ: मवाद सूखता है और घाव भरने लगता है।
कीड़े या विषैले जीव के काटने से बने घावों में —
विधि:
नीम पत्तों का रस + सरसों का तेल + थोड़ा पानी
इसे हल्का पकाकर प्रभावित स्थान पर लगाएं।
लाभ: विष का प्रभाव कम होता है और संक्रमण रुकता है।
नीम कफनाशक होने से श्वास रोगों में उपयोगी है।
विधि:
नीम बीजों का शुद्ध तेल 30–60 बूंद पान में रखकर सेवन करें।
लाभ: श्वास कष्ट में राहत मिलती है।
जो फोड़े लगातार रिसते हों —
उपचार:
नीम छाल की भस्म लगाएं।
लाभ: रिसाव रुकता है और फोड़ा सूखने लगता है।
विधि:
नीम की अंतरछाल 50 ग्राम को 625 मि.ली. पानी में उबालें।
छानकर पुनः उतने ही पानी में उबालें।
दोनों काढ़ों को मिलाकर सुरक्षित रखें।
सेवन: 50 मि.ली. दिन में 3 बार।
लाभ: दस्त नियंत्रित होते हैं।
उपचार:
नीम तेल पान में रखकर खाएं
या
30 बूंद रास्नादि क्वाथ में मिलाकर सेवन करें
लाभ: गैस, ऐंठन और वात विकार शांत होते हैं।
चोट या मोच में —
नीम पत्तियों का भाप (बफारा) देने से सूजन और दर्द कम होता है।
नीम पत्तियों का पुल्टिस नियमित बांधने से नासूर भरने लगता है।
नीम पत्तियों को सब्जी में छोंककर खाने से कृमि (कीड़े) नष्ट होते हैं।
नीम तेल और शहद मिलाकर रुई भिगोकर कान में रखने से पीब बंद होती है।
नीम की कोमल पत्तियों का रस निकालकर दुखती आंख के विपरीत कान में डालने से लाभ मिलता है।
नीम पत्तियों की राख 2 ग्राम जल के साथ नियमित सेवन करने से पथरी गलने में सहायता मिलती है।
नीम पत्तियां और अजवायन पीसकर कनपटियों पर लेप करने से नकसीर बंद होती है।
विधि:
नीम छाल – 4 ग्राम
पुराना गुड़ – 20 ग्राम
पानी – 375 मि.ली.
उबालकर 125 मि.ली. शेष रहने पर छानकर पिलाएं।
लाभ: रुका हुआ मासिक धर्म प्रारंभ होता है।
नीम बीजों के तेल से प्रभावित अंगों की नियमित मालिश करने से धीरे-धीरे लाभ होता है।
नीम अंतरछाल को चंदन की तरह पीसकर गाढ़ा लेप करें।
3–4 बार प्रयोग से दर्द में आराम मिलता है।
नीम पत्तियों को दही में पीसकर लगाने से दाद में लाभ होता है।
नीम पंचांग 10 ग्राम + मिश्री 10 ग्राम
पानी में पीसकर छानकर पिलाएं।
लाभ: लू के दुष्प्रभाव दूर होते हैं।
नीम मुख्यतः:
रक्तशोधक
पित्तशामक
कृमिनाशक
त्वचारोगनाशक
ज्वरनाशक
के रूप में कार्य करता है।
यह शरीर के दूषित रक्त और पित्त को शुद्ध कर रोगों की जड़ पर कार्य करता है।
गर्भवती स्त्रियां नीम का आंतरिक सेवन न करें।
अधिक मात्रा में सेवन से कमजोरी हो सकती है।
गंभीर रोगों में वैद्य की सलाह अनिवार्य है।
बच्चों में मात्रा कम रखें।
At AyurvediyaUpchar, we bring you a carefully selected range of quality Masala & Spices and Natural Products for your everyday needs. From Haldi and Red Chilli Powder to Neem, Amla, Moringa and other natural powders, our products are selected with a focus on quality, convenience and everyday use. Explore our products and informative blog resources for simple ideas, traditional knowledge and a more natural lifestyle.
आयुर्वेदीय उपचार में हम आपके दैनिक उपयोग के लिए गुणवत्तापूर्ण मसाले, स्पाइसेज़ और प्राकृतिक उत्पादों की चुनिंदा रेंज उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं। हल्दी और लाल मिर्च पाउडर से लेकर नीम, आंवला, मोरिंगा और अन्य प्राकृतिक पाउडर तक, हमारे उत्पादों का चयन गुणवत्ता, उपयोगिता और सुविधा को ध्यान में रखकर किया जाता है। हमारे उत्पादों के साथ-साथ जानकारीपूर्ण ब्लॉग का भी आनंद लें, जहाँ आपको पारंपरिक ज्ञान, उपयोगी जानकारी और प्राकृतिक जीवनशैली से जुड़े विषय मिलेंगे।