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खांसी और दमा की अचूक पिप्पली (लॉन्ग पेपर)

Feb 07, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
खांसी और दमा की अचूक पिप्पली (लॉन्ग पेपर)

आयुर्वेदिक दृष्टि से गुण, प्रयोग और सावधानियाँ
पिप्पली (Long Pepper)
भारतीय आयुर्वेद की अत्यंत महत्वपूर्ण औषधि है। इसे संस्कृत में पिप्पली, हिंदी में छोटी पीपल और अंग्रेज़ी में Long Pepper कहा जाता है। इसका वानस्पतिक नाम Piper longum है। पिप्पली का उपयोग केवल औषधि के रूप में ही नहीं, बल्कि मसाले के रूप में भी प्राचीन काल से होता आया है।

यह विशेष रूप से श्वसन तंत्र (Respiratory System) और पाचन तंत्र (Digestive System) पर प्रभावकारी मानी जाती है। आयुर्वेद में इसे दीपन, पाचन, रसायन और कफ-वात हर औषधि कहा गया है।


पिप्पली का वनस्पतिक परिचय

पिप्पली एक लता जाति की वनस्पति है। इसके पत्ते पान के समान किंतु छोटे और नौकाकार होते हैं।

  • पत्तों की लंबाई: 2–5 इंच

  • चौड़ाई: ½–2 इंच

  • फल: शहतूत जैसे, 1–1.5 इंच लंबे

  • पकने पर रंग: लाल

  • सूखने पर: काले

इसके फल को पिप्पली तथा जड़ को पिप्पलीमूल या पीपलामूल कहा जाता है। औषधि में दोनों का प्रयोग किया जाता है।

ध्यान रहे — पिप्पली का सेवन सोंठ या काली मिर्च की तरह प्रतिदिन अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए।


पिप्पली के आयुर्वेदिक गुण

आयुर्वेद में पिप्पली के गुणों का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

पिप्पली दीपनी, वृष्या, स्वादुपाका, रसायनी।
कटुका, स्निग्धा, लघु, वात-कफ-हरिणी॥

गुण और प्रभाव:

  • रस (स्वाद) – कटु (चरपरी)

  • वीर्य – उष्ण

  • विपाक – मधुर

  • गुण – लघु, स्निग्ध

प्रमुख प्रभाव:

  • जठराग्नि को प्रबल करती है

  • कफ और वात दोष कम करती है

  • श्वास (दमा) और कास (खांसी) में लाभकारी

  • पुराने ज्वर में उपयोगी

  • पाचन सुधारक

  • बलवर्धक और रसायन

⚠️ किंतु उष्ण होने के कारण यह पित्त को बढ़ा सकती है। इसलिए अधिक मात्रा में सेवन वर्जित है।


दमा और खांसी में पिप्पली का महत्व

दमा (Asthma) और पुरानी खांसी प्रायः कफ और वात दोष के बढ़ने से संबंधित मानी जाती हैं। पिप्पली इन दोनों दोषों को संतुलित करती है।

कैसे लाभ करती है?

  • श्वसन नलिकाओं को खोलती है

  • बलगम को पतला करती है

  • कफ निष्कासन में सहायता

  • फेफड़ों को सुदृढ़ करती है

  • ब्रोंकाइटिस में सहायक


दमा-खांसी में उपयोगी प्रमुख योग

1. पिप्पली चूर्ण + गुड़

½–1 ग्राम पिप्पली चूर्ण में दूना गुड़ मिलाकर सुबह सेवन करें।
लाभ: दमा, अरुचि, मंदाग्नि, खांसी।


2. घी में भुनी पिप्पली

थोड़ा देशी घी डालकर पिप्पली हल्की भूनें।
¼ भाग सेंधा नमक मिलाकर चूर्ण बना लें।
¼ ग्राम सुबह-शाम लें।
लाभ: श्वास, दमा में उपयोगी।
बच्चों को आधी मात्रा दें।


3. शहद के साथ

125 मि.ग्रा. पिप्पली चूर्ण शहद के साथ 2–3 बार चाटें।
लाभ: कफ, दमा, पुरानी खांसी।


शक्तिवर्द्धक पिप्पली दूध

2–3 पिप्पली 250 मि.ली. दूध + 100 मि.ली. पानी में पकाएँ।
पानी समाप्त होने पर मिश्री मिलाएँ।
पिप्पली चबाकर खाएँ और दूध पिएँ।

लाभ:

  • पाचन शक्ति वृद्धि

  • फुफ्फुस रोगों से बचाव

  • बल और ऊर्जा वृद्धि


वर्धमान पिप्पली योग

पहले दिन 1 पिप्पली दूध में उबालकर लें।
दूसरे दिन 2… ऐसे 10 तक बढ़ाएँ।
फिर 1-1 घटाते हुए बंद करें।

यह विशेष रूप से दमा, खांसी और वात रोगों में उपयोगी माना जाता है।


पाचन सुधारक पिप्पली

नींबू-नमक पिप्पली

100 ग्राम पिप्पली
25 ग्राम सेंधा नमक
250 ग्राम नींबू रस

रस सूखने के बाद छाया में सुखाएँ।
भोजन के बाद 1–2 पिप्पली चबाएँ।

लाभ:

  • गैस

  • कब्ज

  • अपच

  • पेट गुड़गुड़ाहट


पिप्पलीमूल का उपयोग

1–3 ग्राम चूर्ण गर्म पानी/दूध के साथ लें।
लाभ:

  • सिरदर्द

  • मांसपेशी दर्द

  • वात विकार

  • अच्छी नींद


अन्य उपयोग

  • मसूड़ों की सूजन: पिप्पली + जीरा + सेंधा नमक चूर्ण मलें

  • बवासीर: 125–250 मि.ग्रा. दिन में दो बार

  • ग्रहणी रोग: अन्य औषधियों के साथ काढ़ा

  • मंदाग्नि: पिप्पली युक्त काढ़ा


पिप्पली के आधुनिक वैज्ञानिक पहलू

आधुनिक शोध में पाया गया है कि पिप्पली में पाइपरीन (Piperine) नामक तत्व होता है जो:

  • औषधियों के अवशोषण को बढ़ाता है

  • एंटी-इन्फ्लेमेटरी प्रभाव देता है

  • श्वसन मार्ग को साफ करता है

इसी कारण कई आयुर्वेदिक और हर्बल फार्मूले में पिप्पली शामिल की जाती है।


सावधानियाँ

  • अधिक मात्रा में लंबे समय तक सेवन न करें

  • गर्भवती स्त्रियाँ चिकित्सकीय सलाह लें

  • अत्यधिक पित्त प्रकृति वाले सावधानी रखें

  • अल्सर रोगी चिकित्सक से पूछकर सेवन करें


निष्कर्ष

पिप्पली एक प्रभावशाली आयुर्वेदिक औषधि है जो विशेष रूप से खांसी, दमा, कफ विकार और पाचन समस्याओं में लाभकारी मानी जाती है। उचित मात्रा और सही विधि से सेवन करने पर यह बलवर्धक और रसायन के रूप में कार्य करती है।

परंतु हर औषधि की तरह इसका सेवन भी विवेकपूर्ण और चिकित्सकीय परामर्श के साथ करना चाहिए।

यदि दमा या खांसी पुरानी या गंभीर हो, तो आधुनिक चिकित्सा जांच अवश्य कराएँ।

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