सोरायसिस एक जटिल और लंबे समय तक रहने वाला त्वचा रोग है, जो देखने में साधारण त्वचा समस्या जैसा लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह शरीर की आंतरिक विकृतियों, रक्तदूषिता, पाचन तंत्र की खराबी, वंशानुगत प्रभाव और जीवनशैली की गड़बड़ियों से जुड़ा हुआ रोग है। आयुर्वेद में इसे केवल त्वचा रोग नहीं माना गया, बल्कि शरीर के दोषों—विशेषकर वात, पित्त और कफ—की विकृति तथा रक्तदोष से उत्पन्न रोग के रूप में समझा गया है।
आयुर्वेदीय संहिताओं में हजारों वर्ष पूर्व आचार्यों ने सोरायसिस जैसे रोगों का उल्लेख किया था। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इस रोग को स्वतंत्र पहचान सन 1841 में वैज्ञानिक हेब्रा (Hebra) के प्रयासों के बाद मिली। आज यह रोग विश्वभर में तेजी से बढ़ रहा है और लाखों लोग इससे प्रभावित हैं।
यह रोग पुरुष, स्त्री, बालक, युवा और वृद्ध—सभी में समान रूप से देखा जाता है। भारत में पुरुषों में इसकी संख्या स्त्रियों की तुलना में अधिक पाई जाती है। उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में यह रोग अधिक देखने को मिलता है। स्त्रियों में गर्भावस्था के दौरान तथा शिशु के स्तनपान काल तक यह रोग कई बार स्वतः शांत हो जाता है, लेकिन स्तनपान बंद होने के बाद फिर से उभर सकता है।
सोरायसिस कोई संक्रामक (छूत) रोग नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता। यह शरीर के आंतरिक अंगों को सीधे नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन त्वचा की सुंदरता को प्रभावित करता है, इसलिए इसे सौंदर्य का शत्रु भी कहा जाता है। रोगी को शारीरिक से अधिक मानसिक परेशानी होती है, क्योंकि त्वचा पर लाल चकत्ते, सफेद परतें और खुजली आत्मविश्वास को प्रभावित करती हैं।
सोरायसिस क्या है?
सामान्य रूप से हमारे शरीर की त्वचा की कोशिकाओं का जीवनकाल लगभग 20 से 30 दिन होता है। इस दौरान पुरानी कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं और नई कोशिकाएं उनका स्थान ले लेती हैं। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।
लेकिन जब यह प्रक्रिया असंतुलित हो जाती है, तब नई कोशिकाएं बहुत तेजी से बनने लगती हैं। पुरानी कोशिकाएं पूरी तरह हट नहीं पातीं और नई कोशिकाएं उनके ऊपर जमने लगती हैं। यही जमाव त्वचा पर मोटी परत, लालपन और सफेद छिलकों के रूप में दिखाई देता है। इस स्थिति को ही सोरायसिस कहा जाता है।
नई कोशिकाओं को जीवित रखने के लिए शरीर उस स्थान पर अधिक रक्त भेजता है, जिससे त्वचा लाल हो जाती है। बाद में जब रक्त प्रवाह कम हो जाता है, तो कोशिकाएं सूखकर सफेद परतों के रूप में झड़ने लगती हैं।
सोरायसिस होने के प्रमुख कारण
सोरायसिस के पीछे कई कारण हो सकते हैं। आयुर्वेद में इसे मुख्य रूप से रक्तदूषिता और विषजन्य विकार माना गया है।
1. रक्त की अशुद्धता
रक्त की अशुद्धता इस रोग का सबसे बड़ा कारण मानी जाती है। जब शरीर में विषैले तत्व जमा होते रहते हैं और समय पर बाहर नहीं निकलते, तब वे त्वचा पर अपना दुष्प्रभाव दिखाने लगते हैं।
2. विषजन्य कारण
विषैले पदार्थों का लंबे समय तक सेवन, गलत खानपान, प्रदूषित भोजन, रासायनिक पदार्थों का अधिक संपर्क और शरीर में विष का संचय सोरायसिस को जन्म दे सकता है।
3. वंशानुगत कारण
यह रोग कई बार पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। यदि माता-पिता में से किसी एक को सोरायसिस है, तो संतान में लगभग 25% संभावना रहती है। यदि दोनों माता-पिता प्रभावित हों, तो यह संभावना 70% तक हो सकती है।
कई बार यह रोग तीन-चार पीढ़ी बाद भी प्रकट होता है। मातृपक्ष (ननिहाल) से भी रोग की संभावना रहती है, लेकिन पितृपक्ष से अधिक प्रभाव माना जाता है।
4. विरुद्ध आहार-विहार
दूध और दही का एक साथ सेवन, गर्म और ठंडे पदार्थों का एक साथ सेवन, अधिक तला-भुना भोजन, अनियमित भोजन, देर रात खाना और पाचन तंत्र की खराबी रोग को बढ़ा सकती है।
5. तंत्रिका तंत्र की कमजोरी
मानसिक तनाव, चिंता, नींद की कमी और तंत्रिका तंत्र की कमजोरी भी सोरायसिस के प्रकोप को बढ़ा सकती है।
6. एलर्जी और संक्रमण
टॉन्सिल की समस्या, बार-बार जुकाम, नजला, इन्फ्लुएंजा, त्वचा एलर्जी और विषैले कीड़ों के काटने से भी रोग उत्पन्न हो सकता है।
7. रक्त चढ़ाना या रक्त परिवर्तन
कुछ मामलों में रक्त चढ़ाने (Blood Transfusion) या रक्त परिवर्तन के बाद प्रतिक्रियात्मक प्रभाव से भी सोरायसिस देखा गया है।
सोरायसिस के प्रमुख लक्षण
सोरायसिस के लक्षण धीरे-धीरे शुरू होते हैं और समय के साथ बढ़ते जाते हैं। शुरुआत में इसे सामान्य खुजली, एलर्जी या रूसी समझ लिया जाता है।
त्वचा पर लाल या भूरे चकत्ते
शरीर के किसी भी भाग पर गहरे लाल या गहरे भूरे रंग के छोटे-छोटे उभार दिखाई देते हैं। ये मसूर के दाने जैसे होते हैं।
सफेद परत या छिलके
इन उभारों पर पारदर्शी सफेद झिल्ली या परत दिखाई देती है, जो बाद में सूखकर छिलकों के रूप में झड़ने लगती है।
खुजली और जलन
प्रभावित स्थान पर खुजली, जलन और खिंचाव महसूस हो सकता है।
सिर में रूसी जैसी समस्या
कई रोगियों में यह रोग सिर से शुरू होता है। शुरुआत में इसे सामान्य डैंड्रफ समझ लिया जाता है।
घुटने, कोहनी और कमर पर अधिक प्रभाव
घुटने, पिंडलियां, कोहनी, कमर, कान के पीछे और सिर की त्वचा पर यह अधिक देखा जाता है।
नाखूनों में बदलाव
कुछ लोगों में त्वचा की बजाय नाखून प्रभावित होते हैं। नाखून मोटे, कमजोर या टूटने लगते हैं।
जोड़ों में दर्द
पुराने रोगियों में जोड़ों में दर्द और सूजन होने लगती है, जिसे सोरायटिक अर्थराइटिस कहा जाता है।
मौसम के अनुसार बदलाव
गर्मियों में यह रोग दब जाता है, जबकि सर्दियों में अधिक बढ़ जाता है।
सोरायसिस की आयुर्वेदिक चिकित्सा
आयुर्वेद में सोरायसिस की चिकित्सा दो मुख्य भागों में की जाती है—
1. शोधन चिकित्सा
2. स्थानीय (बाह्य) चिकित्सा
शोधन चिकित्सा
सबसे पहले पंचकर्म द्वारा शरीर की शुद्धि की जाती है। पंचकर्म आयुर्वेद की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें शरीर से दोषों और विषैले तत्वों को बाहर निकाला जाता है।
पंचकर्म के अंतर्गत वमन, विरेचन, बस्ती, रक्तमोक्षण आदि प्रक्रियाएं रोग की स्थिति के अनुसार की जाती हैं। इससे रक्त शुद्ध होता है और रोग की जड़ पर काम होता है।
स्थानीय चिकित्सा
पंचकर्म के बाद प्रभावित त्वचा पर बाहरी लेप, तेल, मलहम और औषधियों का प्रयोग किया जाता है।
सोरायसिस में उपयोगी आयुर्वेदिक औषधियां
त्रिफला रसायन
आंवला, हरड़ और बहेड़ा—तीनों को समान मात्रा में लेकर उसमें शुद्ध गंधक मिलाया जाता है।
लगभग 250 मि.ग्राम मात्रा सुबह-शाम सेवन करना लाभकारी माना जाता है। इसके साथ पंचतिक्त घृत का सेवन भी श्रेष्ठ माना गया है।
पंचतिक्त घृत
यह रक्त शोधन, त्वचा रोगों और पुरानी सूजन में अत्यंत लाभकारी माना जाता है। यह शरीर के अंदर से रोग को शांत करने में सहायता करता है।
खदिरारिष्ट
भोजन के बाद 30–30 मि.ली. मात्रा में समान जल मिलाकर सेवन करना लाभकारी होता है। यह रक्त को शुद्ध करने और त्वचा विकारों में उपयोगी माना जाता है।
वृहत मंजिष्ठादि चूर्ण
5 ग्राम चूर्ण और 5 ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। मंजिष्ठा रक्तशोधक औषधि मानी जाती है।
तालकेश्वर रस
मूंग के दाने के समान 1–2 गोली मंजिष्ठादि क्वाथ के साथ सेवन करना लाभकारी माना गया है।
गंधक रसायन
गंधक रसायन, रसमाणिक्य और आमलकी रसायन का सेवन शहद के साथ करना रोग में उपयोगी बताया गया है।
बाह्य उपचार और लेप
औषधीय तेल
नावची का तेल, नीम का तेल, जैतून का तेल और चालमोंगरा तेल—इन सभी को समान मात्रा में मिलाकर प्रभावित भाग पर लगाने से लाभ मिलता है।
करंज और पंवाड़ बीज लेप
करंज के बीज और पंवाड़ के बीज का चूर्ण बनाकर गोमूत्र में मिलाकर लेप किया जाता है।
नारियल और शीशम मलहम
पके नारियल की गिरी, शीशम चूर्ण और तेल में सैलिसिलिक एसिड मिलाकर मलहम तैयार किया जाता है।
कमीला और सुहागा लेप
कमीला चूर्ण और फूला हुआ सुहागा गोघृत में मिलाकर प्रभावित भाग पर लगाया जाता है।
कांजी वाला लेप
पंवाड़, कूठ, सैंधव नमक, सरसों और विडंग को कांजी में पीसकर लगाने से लाभ होता है।
महत्वपूर्ण सावधानी
इन सभी बाह्य उपचारों का प्रयोग अत्यंत सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि कई बार इनसे जलन बहुत अधिक हो सकती है। बिना विशेषज्ञ सलाह के प्रयोग नहीं करना चाहिए।
सूर्य की नियंत्रित किरणें भी लाभकारी मानी जाती हैं। आवश्यकता अनुसार अल्ट्रावायलेट किरणों द्वारा चिकित्सा भी की जाती है।
कई रोगियों में कार्टीसोन मलहम भी उपयोगी पाया गया है।
सोरायसिस में पथ्य (क्या खाएं)
सही आहार रोग को नियंत्रित करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रोगी के लिए ये पदार्थ लाभकारी माने जाते हैं—
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गेहूं
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मूंग
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मसूर
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मक्खन
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आंवला
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अनार
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करेला
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मेथी
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खदिर
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चंदन
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हल्का सुपाच्य भोजन
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पर्याप्त पानी
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ताजे फल
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हरी सब्जियां
सोरायसिस में अपथ्य (क्या न खाएं)
इन चीजों से परहेज करना चाहिए—
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अधिक नमक
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तीखा और मसालेदार भोजन
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खट्टे पदार्थ
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दही
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तैलीय भोजन
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फास्ट फूड
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अधिक तला-भुना भोजन
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शराब
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धूम्रपान
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अफीम, ड्रग्स, कोकीन आदि
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दिन में सोना
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अत्यधिक व्यायाम
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अधिक मैथुन
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आम
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विरुद्ध आहार
जीवनशैली में सुधार
सोरायसिस केवल दवा से नहीं, बल्कि दिनचर्या सुधारने से भी नियंत्रित होता है।
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समय पर भोजन करें
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पर्याप्त नींद लें
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तनाव कम करें
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योग और ध्यान करें
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कब्ज न रहने दें
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त्वचा को अधिक रगड़ें नहीं
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केमिकल युक्त उत्पादों से बचें
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त्वचा को मॉइस्चराइज रखें
निष्कर्ष
सोरायसिस एक पुराना लेकिन नियंत्रित किया जा सकने वाला त्वचा रोग है। यह रोग भले ही जल्दी समाप्त न हो, लेकिन सही आयुर्वेदिक उपचार, पंचकर्म, रक्तशोधन, संतुलित आहार, उचित परहेज और नियमित जीवनशैली से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
धैर्य, अनुशासन और सही उपचार ही सोरायसिस से राहत का सबसे बड़ा उपाय है। यदि रोग प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान लिया जाए, तो इसके बढ़ने की संभावना को काफी हद तक रोका जा सकता है।
इसलिए लक्षणों को अनदेखा न करें और समय रहते उचित आयुर्वेदिक सलाह अवश्य लें।