बिच्छू डसने जैसी भयंकर पीड़ादायक बीमारी: आमवात (रुमेटिज्म) यानी जोड़ों का दर्द

May 29, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
बिच्छू डसने जैसी भयंकर पीड़ादायक बीमारी: आमवात (रुमेटिज्म) यानी जोड़ों का दर्द

प्रस्तावना

मानव शरीर सिर से लेकर पैरों तक अनेक अंगों और उपांगों से मिलकर बना है। ये सभी अंग निरंतर सक्रिय रहकर शरीर को स्वस्थ, चुस्त और कार्यक्षम बनाए रखते हैं। यदि किसी भी अंग में थोड़ा-सा विकार उत्पन्न हो जाए तो सम्पूर्ण शरीर प्रभावित होने लगता है। इसलिए शरीर का प्रत्येक अंग, चाहे छोटा हो या बड़ा, अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

शरीर को आकार और मजबूती अस्थियों (हड्डियों) के ढांचे से प्राप्त होती है। प्रकृति ने शरीर को गतिशील बनाए रखने के लिए विभिन्न स्थानों पर जोड़ों (संधियों) की रचना की है। चिकित्सा विज्ञान में जोड़ों को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है—

1. फाइब्रस (स्थिर) जोड़

  • खोपड़ी की हड्डियों के जोड़
  • दांतों और जबड़ों के जोड़

2. कार्टिलेजिनस (अल्प गति वाले) जोड़

  • पसलियों और छाती की हड्डियों के जोड़
  • रीढ़ तथा कूल्हे की अस्थियों के जोड़

3. साइनोवियल (अधिक गतिशील) जोड़

  • कंधा
  • कोहनी
  • कूल्हा
  • घुटना
  • जांघ आदि

इस लेख में हम तीसरे प्रकार के जोड़ों में होने वाली प्रमुख बीमारी आमवात (रुमेटिज्म या गठिया) पर विस्तार से चर्चा करेंगे।


आमवात क्या है?

आयुर्वेद में जिस रोग में वात दोष संधियों (जोड़ों) में विकृति उत्पन्न करता है, उसे आमवात कहा जाता है।

"आम" शरीर में बनने वाला एक प्रकार का विषैला अपाचित पदार्थ है, जो संधियों में जाकर सूजन, दर्द और अन्य अनेक रोग उत्पन्न करता है।

आज के बदलते खान-पान और जीवनशैली के कारण आमवात तेजी से बढ़ने वाली बीमारी बन चुकी है। पहले यह रोग अधिकतर वृद्धावस्था में दिखाई देता था, लेकिन अब युवाओं और विशेष रूप से महिलाओं में भी बड़ी संख्या में देखने को मिल रहा है।


आम (Ama) क्या होता है?

सामान्य भाषा में आम का अर्थ होता है—कच्चा, अपका या अपाचित पदार्थ।

आयुर्वेद के अनुसार—

  • अपक्व आमरस को आम कहते हैं।
  • दुर्गंधयुक्त, अपाचित अन्नरस आम कहलाता है।
  • मन्दाग्नि से उत्पन्न अपाचित आहार रस को आम कहते हैं।
  • शरीर में मलों के संचय को भी आम कहा गया है।
  • दोषदुष्टि की प्रथम अवस्था आम कहलाती है।

अर्थात जब पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और भोजन पूर्ण रूप से नहीं पचता, तब आम का निर्माण होता है।


आधुनिक विज्ञान के अनुसार आमवात

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार जब शरीर में प्यूरिन नामक प्रोटीन का पाचन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता, तब यूरिक एसिड का निर्माण अधिक मात्रा में होने लगता है।

जब—

  • वृक्क (किडनी) कमजोर हो जाए,
  • यूरिक एसिड शरीर से बाहर न निकल पाए,
  • रक्त में इसकी मात्रा बढ़ जाए,

तो यह संधियों, स्नायु तथा कार्टिलेज में जमा होने लगता है।

यही बढ़ा हुआ यूरिक एसिड संधियों में सूजन, दर्द और जकड़न पैदा करता है।

इसके अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट और वसा के अपूर्ण पाचन से बनने वाला लेक्टिक एसिड भी पेशियों में जमा होकर दर्द और सूजन पैदा कर सकता है।


आमवात होने के कारण

आमवात मुख्य रूप से गलत आहार-विहार और कमजोर पाचन शक्ति के कारण होता है।

प्रमुख कारण

  • विरुद्ध आहार का सेवन
  • अधिक चिकनाईयुक्त भोजन
  • भोजन के तुरंत बाद व्यायाम करना
  • भारी भोजन
  • अनियमित दिनचर्या
  • आरामप्रिय जीवनशैली
  • ऋतु के अनुसार आहार-विहार न अपनाना
  • मन्दाग्नि
  • बार-बार अपच होना

जब पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है तो आम बनने लगता है। यह आम वात दोष के साथ मिलकर संधियों में जाकर रोग उत्पन्न करता है।


आमवात के लक्षण

आमवात की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दर्द और सूजन एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते, बल्कि एक जोड़ से दूसरे जोड़ में घूमते रहते हैं।

प्रमुख लक्षण

  • जोड़ों में सूजन
  • जोड़ों में तीव्र दर्द
  • हाथ-पैर की अंगुलियों में दर्द
  • जोड़ों में जकड़न
  • चलने-फिरने में कठिनाई
  • अंगुलियों का टेढ़ा होना
  • बार-बार बुखार आना
  • शरीर में भारीपन
  • अरुचि
  • आलस्य
  • बेचैनी
  • हृदय में दर्द
  • छाती में पीड़ा
  • दाह (जलन)
  • अंगों में जड़ता

बिच्छू के डंक जैसा दर्द क्यों होता है?

जब वात और आम मिलकर संधियों में जमा हो जाते हैं तो वहां रक्त एवं वायु की गति बाधित होने लगती है।

इसके परिणामस्वरूप—

  • तीव्र सूजन
  • असहनीय दर्द
  • जलन
  • जकड़न

उत्पन्न होती है।

रोग की उन्नत अवस्था में दर्द इतना बढ़ जाता है कि रोगी उसे बिच्छू के डंक जैसी पीड़ा के रूप में अनुभव करता है।


आमवात के प्रकार

1. रुमेटिक जटिल आर्थराइटिस

जब रोग संधियों और मांसपेशियों को प्रभावित करता है।

2. ओस्टियो आर्थराइटिस

जब रोग अस्थियों तक पहुंच जाता है।

यह अवस्था अधिक कष्टदायक होती है तथा लंबे समय तक पथ्य पालन और चिकित्सा की आवश्यकता होती है।


आमवात और हृदय रोग का संबंध

आमवात केवल जोड़ों तक सीमित नहीं रहता।

विशेषकर बच्चों में होने वाला आमवातिक ज्वर (रुमेटिक फीवर) आगे चलकर हृदय को भी प्रभावित कर सकता है।

इसमें—

  • हृदय वाल्व में सूजन
  • हृदय में दर्द
  • घुर-घुर जैसी आवाज
  • हृदय की कार्यक्षमता में कमी

जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।


आयुर्वेदिक चिकित्सा सिद्धांत

आयुर्वेदाचार्यों ने आमवात की चिकित्सा में निम्न उपायों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना है—

  • लंघन (उपवास)
  • स्वेदन (सिकाई)
  • दीपन-पाचन
  • विरेचन
  • स्नेहन
  • बस्ति कर्म
  • आम दोष का शोधन

केवल दवाओं के भरोसे रोग को पूरी तरह नियंत्रित करना कठिन माना गया है।


1. लंघन (उपवास) – आमवात की प्रथम चिकित्सा

आमवात में सबसे पहले लंघन करने की सलाह दी गई है।

लंघन के लाभ

  • आम पकने लगता है।
  • संधियों से आम हटने लगता है।
  • पाचन शक्ति सुधरती है।
  • रोग की जड़ समाप्त होती है।

रोगी की स्थिति के अनुसार 3, 5 या 7 दिन तक लंघन कराया जा सकता है।

लंघन के दौरान

  • उबला हुआ गर्म पानी पिएं।
  • हल्का भोजन लें।
  • चिकनाई रहित आहार लें।

आमवात में पालन करने योग्य 10 नियम

  1. लंघन
  2. उष्ण जलपान
  3. हल्का भोजन
  4. रुक्ष आहार
  5. सहजन के सूप का सेवन
  6. वमन, विरेचन एवं बस्ति
  7. गर्म सेंक
  8. पाचन औषधियों का सेवन
  9. मल निष्कासन
  10. जठराग्नि बढ़ाने के उपाय

2. सेंक (सिकाई)

वात रोगों में सिकाई अत्यंत लाभकारी मानी गई है।

सेंक के प्रकार

गर्म पानी से सेंक

दर्द वाले स्थान पर गर्म पानी की थैली से सेंक करें।

बालू की पोटली

  • बालू गर्म करें।
  • सूती कपड़े में बांधें।
  • दर्द वाले स्थान पर सेंक करें।

भाप द्वारा सेंक

बाष्प स्वेदन भी अत्यंत लाभकारी माना गया है।

सम्भालू के पत्तों से सिकाई

गर्म पत्तों को बांधकर ऊपर से गर्म पानी की थैली रखने से भी लाभ मिलता है।


सौंठ और एरण्ड मूल का विशेष प्रयोग

सौंठ को आयुर्वेद में महौषधि और विश्वभेषज कहा गया है।

यह—

  • आम दोष को नष्ट करती है।
  • वात को नियंत्रित करती है।
  • पाचन सुधारती है।

एरण्ड मूल (अरंडी की जड़) वात रोगों की श्रेष्ठ औषधि मानी गई है।

प्रयोग विधि

  • एरण्ड मूल – 2 तोला
  • सौंठ – 1 तोला
  • पानी – 400 ग्राम

उबालकर 100 ग्राम शेष रहने पर छान लें।

50 ग्राम सुबह और 50 ग्राम शाम सेवन करें।


गुग्गुलु का महत्व

गुग्गुलु वात, कफ तथा आमवात में अत्यंत उपयोगी औषधि मानी गई है।

उपयोगी योग

  • महायोगराज गुग्गुलु
  • रास्नादि गुग्गुलु
  • सिंहनाद गुग्गुलु
  • त्रयोदशांग गुग्गुलु

रास्नासप्तक क्वाथ

इसमें निम्न द्रव्य समान मात्रा में लिए जाते हैं—

  • रास्ना
  • गोखरू
  • एरण्ड मूल
  • देवदार
  • पुनर्नवा
  • गिलोय
  • आरग्वध

20 ग्राम चूर्ण को 500 ग्राम जल में उबालकर 100 ग्राम रहने पर छान लें।

दिन में दो बार सेवन करें।

लगातार 2-3 माह सेवन करने से लाभ मिलता है।


अजमोदादि चूर्ण

इसमें प्रमुख रूप से—

  • अजवायन
  • विडंग
  • सैन्धव
  • देवदार
  • चित्रक
  • पीपली
  • सौंठ
  • काली मिर्च

आदि द्रव्य होते हैं।

यह सूजन, आमवात, साइटिका, कटिशूल तथा वातजन्य रोगों में उपयोगी माना गया है।


सहजन और लहसुन का महत्व

सहजन (मोरिंगा) और लहसुन दोनों आहार एवं औषधि के रूप में उपयोगी हैं।

इनका नियमित सेवन—

  • वात दोष कम करता है।
  • कफ कम करता है।
  • आमवात में लाभ पहुंचाता है।

अन्य विशेष उपचार

  • पंचमूल क्वाथ के साथ सौंठ चूर्ण
  • चित्रक, कटुकी, पाठा, इन्द्रयव आदि का चूर्ण
  • सौंठ और हरड़ का चूर्ण
  • सौंठ एवं गौरखमुंडी का काढ़ा
  • सौंठ, हरड़, गिलोय क्वाथ में गुग्गुल
  • एरण्ड तैल और सौंठ का सेवन

आदि का उल्लेख आयुर्वेद ग्रंथों में मिलता है।


आमवात एवं हृदय बाधा में वर्णित योग

चूर्ण एवं भस्म योग

  • अजमोदादि चूर्ण
  • त्रिकटु चूर्ण
  • श्रृंग भस्म
  • जवाहर मोहरा भस्म
  • हृदयावरण रस

अन्य योग

  • वृहत वात चिन्तामणि रस

इन औषधियों का सेवन केवल योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की देखरेख में ही करें।


आमवात में पथ्य

सेवन करें

  • बैंगन
  • सौंठ
  • सहजन फली
  • परवल
  • लहसुन
  • मेथीदाना
  • चना
  • मूंग
  • कुल्थी
  • जौ
  • चावल
  • उष्ण जल
  • मूली
  • करेला
  • दूध
  • तुरई
  • अदरक
  • बाजरा
  • गेहूं

आमवात में अपथ्य

इनसे बचें

  • दही
  • तले हुए पदार्थ
  • खटाई
  • मिठाई
  • विरुद्ध आहार
  • बार-बार भोजन
  • रात्रि जागरण
  • मालिश
  • दिन में सोना
  • अधिक परिश्रम
  • मैथुन

निष्कर्ष

आमवात केवल जोड़ों का साधारण दर्द नहीं है, बल्कि यह शरीर में बनने वाले आम दोष और वात विकृति का परिणाम है। यदि समय रहते उचित पथ्य, लंघन, स्वेदन, जीवनशैली सुधार तथा योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के मार्गदर्शन में उपचार किया जाए तो इस कष्टदायक रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। रोग की उपेक्षा करने पर यह बिच्छू के डंक जैसी असहनीय पीड़ा, जोड़ों की विकृति और हृदय संबंधी जटिलताओं तक का कारण बन सकता है।

महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सूचना (Disclaimer)

यह लेख आयुर्वेदिक ग्रंथों एवं पारंपरिक आयुर्वेदिक सिद्धांतों में वर्णित जानकारी पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य संबंधी सामान्य जानकारी प्रदान करना है। किसी भी रोग की पहचान, उपचार या औषधि सेवन के लिए यह लेख चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं है।

आमवात (रुमेटिज्म), गठिया, जोड़ों का दर्द, यूरिक एसिड या हृदय संबंधी समस्याओं के लिए किसी भी आयुर्वेदिक औषधि, रस, भस्म, गुग्गुलु, क्वाथ, चूर्ण अथवा घरेलू नुस्खे का उपयोग करने से पहले योग्य आयुved चिकित्सक या विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श अवश्य करें। विशेष रूप से गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, बच्चे, बुजुर्ग तथा पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई उपचार न अपनाएं।

लेख में वर्णित औषधियों एवं उपचारों के परिणाम व्यक्ति की प्रकृति, आयु, रोग की अवस्था तथा स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। किसी भी प्रकार की असुविधा, एलर्जी या समस्या होने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें।

Ayurvediya Upchar इस लेख में दी गई जानकारी के आधार पर किए गए किसी भी स्व-उपचार, औषधि सेवन या स्वास्थ्य संबंधी निर्णय के लिए उत्तरदायी नहीं होगा। स्वस्थ जीवनशैली, संतुलित आहार एवं विशेषज्ञ चिकित्सकीय सलाह ही उत्तम स्वास्थ्य का आधार है।

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