मानव शरीर सिर से लेकर पैरों तक अनेक अंगों और उपांगों से मिलकर बना है। ये सभी अंग निरंतर सक्रिय रहकर शरीर को स्वस्थ, चुस्त और कार्यक्षम बनाए रखते हैं। यदि किसी भी अंग में थोड़ा-सा विकार उत्पन्न हो जाए तो सम्पूर्ण शरीर प्रभावित होने लगता है। इसलिए शरीर का प्रत्येक अंग, चाहे छोटा हो या बड़ा, अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शरीर को आकार और मजबूती अस्थियों (हड्डियों) के ढांचे से प्राप्त होती है। प्रकृति ने शरीर को गतिशील बनाए रखने के लिए विभिन्न स्थानों पर जोड़ों (संधियों) की रचना की है। चिकित्सा विज्ञान में जोड़ों को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है—
इस लेख में हम तीसरे प्रकार के जोड़ों में होने वाली प्रमुख बीमारी आमवात (रुमेटिज्म या गठिया) पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
आयुर्वेद में जिस रोग में वात दोष संधियों (जोड़ों) में विकृति उत्पन्न करता है, उसे आमवात कहा जाता है।
"आम" शरीर में बनने वाला एक प्रकार का विषैला अपाचित पदार्थ है, जो संधियों में जाकर सूजन, दर्द और अन्य अनेक रोग उत्पन्न करता है।
आज के बदलते खान-पान और जीवनशैली के कारण आमवात तेजी से बढ़ने वाली बीमारी बन चुकी है। पहले यह रोग अधिकतर वृद्धावस्था में दिखाई देता था, लेकिन अब युवाओं और विशेष रूप से महिलाओं में भी बड़ी संख्या में देखने को मिल रहा है।
सामान्य भाषा में आम का अर्थ होता है—कच्चा, अपका या अपाचित पदार्थ।
आयुर्वेद के अनुसार—
अर्थात जब पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और भोजन पूर्ण रूप से नहीं पचता, तब आम का निर्माण होता है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार जब शरीर में प्यूरिन नामक प्रोटीन का पाचन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता, तब यूरिक एसिड का निर्माण अधिक मात्रा में होने लगता है।
जब—
तो यह संधियों, स्नायु तथा कार्टिलेज में जमा होने लगता है।
यही बढ़ा हुआ यूरिक एसिड संधियों में सूजन, दर्द और जकड़न पैदा करता है।
इसके अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट और वसा के अपूर्ण पाचन से बनने वाला लेक्टिक एसिड भी पेशियों में जमा होकर दर्द और सूजन पैदा कर सकता है।
आमवात मुख्य रूप से गलत आहार-विहार और कमजोर पाचन शक्ति के कारण होता है।
जब पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है तो आम बनने लगता है। यह आम वात दोष के साथ मिलकर संधियों में जाकर रोग उत्पन्न करता है।
आमवात की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दर्द और सूजन एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते, बल्कि एक जोड़ से दूसरे जोड़ में घूमते रहते हैं।
जब वात और आम मिलकर संधियों में जमा हो जाते हैं तो वहां रक्त एवं वायु की गति बाधित होने लगती है।
इसके परिणामस्वरूप—
उत्पन्न होती है।
रोग की उन्नत अवस्था में दर्द इतना बढ़ जाता है कि रोगी उसे बिच्छू के डंक जैसी पीड़ा के रूप में अनुभव करता है।
जब रोग संधियों और मांसपेशियों को प्रभावित करता है।
जब रोग अस्थियों तक पहुंच जाता है।
यह अवस्था अधिक कष्टदायक होती है तथा लंबे समय तक पथ्य पालन और चिकित्सा की आवश्यकता होती है।
आमवात केवल जोड़ों तक सीमित नहीं रहता।
विशेषकर बच्चों में होने वाला आमवातिक ज्वर (रुमेटिक फीवर) आगे चलकर हृदय को भी प्रभावित कर सकता है।
इसमें—
जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
आयुर्वेदाचार्यों ने आमवात की चिकित्सा में निम्न उपायों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना है—
केवल दवाओं के भरोसे रोग को पूरी तरह नियंत्रित करना कठिन माना गया है।
आमवात में सबसे पहले लंघन करने की सलाह दी गई है।
रोगी की स्थिति के अनुसार 3, 5 या 7 दिन तक लंघन कराया जा सकता है।
वात रोगों में सिकाई अत्यंत लाभकारी मानी गई है।
दर्द वाले स्थान पर गर्म पानी की थैली से सेंक करें।
बाष्प स्वेदन भी अत्यंत लाभकारी माना गया है।
गर्म पत्तों को बांधकर ऊपर से गर्म पानी की थैली रखने से भी लाभ मिलता है।
सौंठ को आयुर्वेद में महौषधि और विश्वभेषज कहा गया है।
यह—
एरण्ड मूल (अरंडी की जड़) वात रोगों की श्रेष्ठ औषधि मानी गई है।
उबालकर 100 ग्राम शेष रहने पर छान लें।
50 ग्राम सुबह और 50 ग्राम शाम सेवन करें।
गुग्गुलु वात, कफ तथा आमवात में अत्यंत उपयोगी औषधि मानी गई है।
इसमें निम्न द्रव्य समान मात्रा में लिए जाते हैं—
20 ग्राम चूर्ण को 500 ग्राम जल में उबालकर 100 ग्राम रहने पर छान लें।
दिन में दो बार सेवन करें।
लगातार 2-3 माह सेवन करने से लाभ मिलता है।
इसमें प्रमुख रूप से—
आदि द्रव्य होते हैं।
यह सूजन, आमवात, साइटिका, कटिशूल तथा वातजन्य रोगों में उपयोगी माना गया है।
सहजन (मोरिंगा) और लहसुन दोनों आहार एवं औषधि के रूप में उपयोगी हैं।
इनका नियमित सेवन—
आदि का उल्लेख आयुर्वेद ग्रंथों में मिलता है।
इन औषधियों का सेवन केवल योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की देखरेख में ही करें।
आमवात केवल जोड़ों का साधारण दर्द नहीं है, बल्कि यह शरीर में बनने वाले आम दोष और वात विकृति का परिणाम है। यदि समय रहते उचित पथ्य, लंघन, स्वेदन, जीवनशैली सुधार तथा योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के मार्गदर्शन में उपचार किया जाए तो इस कष्टदायक रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। रोग की उपेक्षा करने पर यह बिच्छू के डंक जैसी असहनीय पीड़ा, जोड़ों की विकृति और हृदय संबंधी जटिलताओं तक का कारण बन सकता है।
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