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अभ्रक भस्म के गुण और उपयोग – Ayurvediya Upchar

Sep 17, 2026
जड़ी बूटियों से चिकित्सा
अभ्रक भस्म के गुण और उपयोग – Ayurvediya Upchar

अभ्रक

परिचय

अभ्रक प्रायः पर्वतों पर पाया जाता है। भारतवर्ष में सफेद, भूरा और काले रंग का अभ्रक मिलता है। बिहार प्रान्त में हजारीबाग और गिरिडीह तथा बंगाल में रानीगंज के आसपास कोयले की खानों के अन्दर मिलता है। राजस्थान में चित्तौड़ और भीलवाड़ा में इसकी खानें हैं।

यह तह पर तह जमे हुए बड़े-बड़े ढोकों (स्थानों) में पहाड़ों में मिलता है। साफ करके निकालने पर इसकी तह काँच की तरह निकलती है। इसके पत्र पारदर्शक, मृदु और सरलता से पृथक्-पृथक् किये जा सकते हैं।

आयुर्वेद में इसकी गणना महारसों में की गयी है। भस्म बनाने के लिए वज्राभ्रक (काला अभ्रक) काम में लिया जाता है। वज्राभ्रक में लोहे का अंश विशेष होने से इसकी भस्म बहुत गुणदायक होती है।

अभ्रक के भेद

आयुर्वेदीय मतानुसार पनाक, दर्दूर, नाग और वज्राभ्रक भेद से अभ्रक चार प्रकार का होता है।

इन्हें आग में डालने से जिस अभ्रक के पत्ते खिल जायें उसे पनाक कहते हैं। जो अभ्रक आग में डालने से मेंढक के समान (टर्र-टर्र) आवाज करे उसे दर्दूर कहते हैं। जो अभ्रक आग में डालने से साँप की तरह फुफकार छोड़े उसे नाग कहते हैं। एवं जो अभ्रक आग पर डालने से अपना रूप नहीं बदले तथा आवाज भी न करे, उसे वज्र कहते हैं।

वज्राभ्रक का ही विशेष उपयोग भस्म और रसायनादि में किया जाता है। वज्राभ्रक का धान्याभ्रक बनाकर भस्मादि कामों में लिया जाता है।

वज्राभ्रक के लक्षण

जो अभ्रक अंजन के समान काला हो और आग पर रखने से किसी तरह विकृत न हो, वही वज्राभ्रक है। यह सर्वत्र हितकारक माना गया है। भस्मादिक काम में यही अभ्रक लेना उत्तम माना जाता है।

अंजन समान कृष्णाभ्रक (वज्राभ्रक) वहीं होता है, जिसमें लौहांश अधिक हो। अच्छा कृष्णाभ्रक हिमालय तथा पंजाब में कांगड़ा जिले के नूरपुर तहसील की खानों में मिलता है और उत्तर प्रदेश में अल्मोड़ा के आगे बागेश्वर में भी कहीं-कहीं मिलता है। कभी-कभी भूटान से भी यह अभ्रक आता है।

यह भूगर्भ में शिरा-जाल की तरह मीलों तक पृथ्वी की गहराई में बिछा हुआ रहता है। अतः प्रारम्भिक भाग को खोदकर निकाल लेने के बाद सूक्ष्म पत्रवाला, अंजन के समान कृष्णवर्ण का जो अभ्रक का ढेला मिले, वही ग्रहण करना उत्तम बताया गया है।

इस अभ्रक में जो लौह का अंश होता है, वह विद्युत् या उल्कापात से निकले हुए लौह की जाति का है। इसलिए विद्युत् लौह सदृश लौह के सम्पर्क से ही इसका वज्राभ्रक नामकरण किया गया है।

अच्छे अभ्रक की पहचान

जो अभ्रक श्रेष्ठ कृष्णवर्ण का, छूने से चिकना और देखने में चमकदार ढेले के रूप में हो तथा जिसके पत्र मोटे हों और वे सहज ही खुल जाते हों एवं जो तौल में भारी हो, वह अभ्रक सबसे अच्छा माना जाता है।

अभ्रक शोधन-विधि

काले रंग के, पत्थर रहित और वजनदार अभ्रक के ढेले लाकर छोटे-छोटे टुकड़े कर उसको अग्नि में तपा-तपा कर खूब लाल हो जाने पर गो-मूत्र, त्रिफला क्वाथ तथा गाय के दूध में सात बार बुझावें। पीछे जल से अच्छी तरह धोकर, सुखाकर, इमामदस्ते में कूटकर कपड़छन चूर्ण कर लें।

वक्तव्य

शुद्ध किये अभ्रक को दो-तीन दिन जल में डालकर पड़ा रहने के बाद धोना विशेष अच्छा रहता है।

दूसरी विधि

अभ्रक को तपा-तपा कर सात बार सम्भालू (निर्गुण्डी) के रस में बुझावें, तो अभ्रक शुद्ध होता है।

तीसरी विधि

अभ्रक को तपा-तपा कर सात बार बेर के काढ़े में बुझावें, फिर सुखाकर हाथों से मर्दन कर रख लें तो यह धान्याभ्रक से भी अच्छा होता है।

अभ्रक निश्चन्द्रीकरण

अभ्रक भस्म वही अच्छी और विशेष गुणकारी मानी जाती है जिसमें चमक नहीं होती। इस चमक को दूर करने के लिए वैद्य लोग अनेक प्रक्रियाओं से अनेक पुट देते हैं, किन्तु चमक दूर नहीं होती।

भस्म में चमक रहने से रोगी की आँतें कटने लगती हैं, खून आने लगता है, गर्मी अत्यधिक बढ़ जाती है तथा अन्यान्य उपद्रव होने लगते हैं। अतः रोगी और वैद्य इस चमक के बारे में परेशान हो जाते हैं।

इस चमक को दूर करने के लिए एक ऐसी सरल युक्ति बतलायी जाती है, जिससे एक से दो पुट में ही अभ्रक निश्चन्द्र हो जायेगा।

विधि

पुराना गुड़ S1, सोरा कलमी S2, दोनों को थोड़ा पानी डालकर एक जगह मिलाकर मांड़ी में भर दें। ऊपर से हाँडी का मुख एक ढक्कन से ढंक कर सर्वार्थकरी भट्ठी की लौह जाली पर अथवा काढ़ा बनाने वाली भट्टी की लोह जाली पर रख दें। नीचे लकड़ी लगा कोयला लगा लें और इसी कोयले पर अभ्रक की हाँड़ी रख दें। एक बार में एक ही हाँड़ी रखें।

आँच पर रखने से आँच की तेजी के कारण हाँड़ी में से सोरा आवाज के साथ निकलता जायेगा, इसमें डरने की कोई बात नहीं है। कभी-कभी सोरा नहीं भी उड़ता है।

इस विधान से एक-दो पुट में ही अभ्रक निश्चन्द्र हो जाता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि यदि हाँड़ी पतली पेंदी की रही, तो सोरा बहुत जल्द निकल जाता है, जिससे ऊपरी भाग का अभ्रक निश्चन्द्र नहीं होता। तो उस अभ्रक को अलग निकालकर पुनः उक्त विधान से निश्चन्द्र करना चाहिए।

इस अभ्रक में सोरा का भाग कुछ-न-कुछ रह ही जाता है। अतएव इसको कूटकर एक दिन-रात जल में भिगोकर छोड़ दें। बाद में हाथ से खूब मल दें। जब जल स्थिर हो जाय और अभ्रक भी नीचे पात्र में बैठ जाये, तब धीरे-धीरे सावधानी के साथ पानी बहा दें। अभ्रक बह न जाय, इस पर खूब ध्यान रखें। फिर पानी भरकर छोड़ दें।

इस तरह जब तक इसमें से खारापन न निकल जाये, तब तक बराबर पानी डाल-डाल कर धोते रहें।

अभ्रक मारण

उपरोक्त विधि से निश्चन्द्र किया हुए अभ्रक को आक (मदार) के पत्तों के रस में घोंटकर टिकिया बना लें। जब टिकिया खूब सूख जाय, तब गजपुट में सम्पुट को रखकर फूंक दें। ऐसे तीन पुट देने से लाल वर्ण की भस्म बनेगी। इसे सब रोगों में प्रयुक्त करें।

दूसरी विधि

धान्याभ्रक को 24 घण्टे आक के दूध में खूब घोंटकर गोल-गोल छोटी-छोटी टिकिया बना, आक के पत्तों में लपेट सराब-सम्पुट में बन्द कर गजपुट में फूंक दें।

स्वांग शीतल होने पर निकालकर आक के दूध में उसी प्रकार घोंटकर पुट दें। ऐसे 7 पुट आक के दूध के साथ और तीन पुट बड़ की जटा के क्वाथ के साथ देने से 10 पुट में ही अभ्रक की उत्तम भस्म बनती है।

अभ्रक भस्म का रोगानुसार अनुपान

प्रमेह के लिए

अभ्रक भस्म को पीपल और हल्दी के चूर्ण में मिला शहद (मधु) के साथ दें।

क्षय के लिए

सोना भस्म चौथाई रत्ती (अथवा वर्क), सितोपलादि चूर्ण या च्यवनप्राशावलेह में मिला न्यूनाधिक मात्रा में घी और शहद के साथ दें।

धातु बढ़ाने के लिए

सोना और चाँदी की भस्म चौथाई रत्ती या वर्क, छोटी इलायची के चूर्ण और शहद (मधु) या मक्खन के साथ दें।

रक्तपित्त के लिए

अभ्रक भस्म को गुड़ या शक्कर और हरड़ का चूर्ण मिलाकर या इलायची का चूर्ण और चीनी मिलाकर दूर्वा-स्वरस के साथ दें।

बवासीर, पाण्डु और क्षय के लिए

दालचीनी, इलायची, नागकेशर, तेजपात, सौंठ, पीपर, मिर्च, आँवला, हरड़, बहेड़े का महीन चूर्ण, चीनी या मिश्री मिलाकर शहद के साथ दें।

पैत्तिक प्रमेह के लिए

गुर्च सत्त्व और मिश्री मिलाकर शहद के साथ दें।

मूत्रकृच्छ के लिए

इलायची, गोखरू, भूमि-आँवले का चूर्ण एवं मिश्री मिलाकर दूध के साथ दें।

जीर्णज्वर और भ्रम के लिए

पिप्पलामूल का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ दें।

नेत्र की ज्योति बढ़ाने के लिए

त्रिफला, हरड़, बहेड़ा, आँवला के चूर्ण और शहद के साथ दें।

व्रण-नाश के लिए

मूर्वा का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ दें।

बल-वृद्धि के लिए

विदारीकन्द का चूर्ण मिलाकर गाय के धारोष्ण दूध के साथ दें।

बादी अर्श के लिए

शु० मिलावे का चूर्ण या निशोथ का चूर्ण मिलाकर गर्म जल के साथ दें।

अम्लपित्त में

आँवला चूर्ण डेढ़ माशा या आँवला-रस 1 तोला के साथ दें।

स्नायु दौर्बल्य में

अभ्रक भस्म 1 रत्ती को मकरध्वज आधी रत्ती के साथ मिलाकर मक्खन या मलाई के साथ दें।

हृदय रोग में

अभ्रक भस्म एक रत्ती को मोती पिष्टी 1 रत्ती और अर्जुनछाल चूर्ण 4 रत्ती के साथ मधु में मिलाकर दें।

वातव्याधि के लिए

सोंठ, पुष्करमूल, भारंङ्गी और असगन्ध का चूर्ण मिलाकर शहद (मधु) के साथ दें।

पित्त-प्रकोप में

दालचीनी, इलायची, तेजपात और नागकेशर का चूर्ण मिलाकर चीनी या मिश्री के साथ दें।

कफ-प्रकोप में

कायफल और पिप्पली के चूर्ण में शहद के साथ दें।

अग्नि-प्रदीप्त के लिए

यवक्षार, सुहागे की खील (फूला), सज्जीखार के चूर्ण में मिलाकर गर्म जल के साथ दें।

मूत्राघात और पथरी के लिए

मूत्रकृच्छ्र का अनुपान ठीक है।

वीर्यस्तम्भन के लिए

भांग के चूर्ण के साथ दें।

धातुक्षीणता के लिए

लौंग का चूर्ण और शहद (मधु) के साथ दें।

शारीरिक उत्ताप (दाह) के लिए

चीनी, मिश्री और गाय के दूध के साथ दें।

पाण्डु, संग्रहणी और कुष्ठ के लिए

वायविडंग, त्रिकुटा और घी के साथ 2-4 रत्ती की मात्रा में अभ्रक भस्म सेवन करें।

मिश्र अनुपान

अभ्रक भस्म अकेली तथा पूर्वोक्त अनुपान के साथ जैसी दी जाती है, वैसे ही भस्मों के मिश्रण के साथ देने से अपूर्व लाभ करती है। जैसे:

प्रसूत और कफक्षय में

अभ्रक भस्म 4 रत्ती, सुवर्ण वर्क 1 रत्ती, दोनों की 6 पुड़िया बना, प्रातः-सायं दाडिमावलेह में मिलाकर देने से लाभ होता है।

कफक्षय, कामला, जीर्ण ज्वर तथा संग्रहणी पर

अभ्रक भस्म 3 रत्ती, कान्तलौह भस्म 3 रत्ती और सोने का वर्क 1 रत्ती — इनकी 6 पुड़िया बनाकर प्रातः-सायं 1-1 पुड़िया दाडिमावलेह के साथ सेवन करावें।

धातुक्षय और मधुमेह के लिए

1 रत्ती अभ्रक भस्म, 1 रत्ती कान्तलौह भस्म, 2 रत्ती शोधित शिलाजीत — इनकी गोली बना, प्रातः-सायं दूध के साथ सेवन करें।

सन्निपात, पाण्डु आदि पर

अभ्रक भस्म 1 रत्ती, मौक्तिक भस्म 1 रत्ती और 4 रत्ती गोरोचन मिला, इन सबकी 6 पुड़िया बनाना और 6 माशा दाडिमावलेह के साथ एक-एक पुड़िया प्रातः, दोपहर और शाम को देना।

इससे ज्वर, दाह, खाँसी, दमा, नकसीर (नाक से खून गिरना) आदि में अमित लाभ होता है और अति कमजोरी पर इसका उत्तम प्रभाव पड़ता है तथा क्षय, प्रसूतरोग, सन्निपात, पाण्डु, रक्तपित्त और पित्तज कास आदि में यह मिश्रण बहुत काम करता है। इसके अतिरिक्त आँव एवं खूनी बवासीर में अच्छा काम करता है।

अभ्रक भस्म के गुण और उपयोग

अभ्रक भस्म अनेक रोगों को नष्ट करता है, देह को दृढ़ करता है एवं वीर्य बढ़ाता है, तरुणावस्था प्राप्त कराता और सम्भोग (मैथुन) करने की शक्ति प्रदान करता है।

राजयक्ष्मा, कफक्षय, बढ़ी हुई खाँसी, उरःक्षत, कफ, दमा, धातुक्षय, विशेष कर मधुमेह, बहुमूत्र, वीसों प्रकार के प्रमेह, सोम रोग, शरीर का दुबलापन, प्रसूत रोग और अति कमजोरी, सूखी खाँसी, काली खाँसी, पाण्डु, दाह, नकसीर, जीर्ण ज्वर, संग्रहणी, शूल, गल्म, आँव, अरुचि, अग्निमांद्य, अम्लपित्त, रक्तपित्त, कमला, खूनी अर्श (बवासीर), हृदय रोग, उन्माद, मिर्गी, मूत्रकृच्छ, पथरी तथा नेत्र रोगों में यह भस्म लाभदायक सिद्ध हुई है। यह रसायन और वाजीकरण भी है।

त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) में जो दोष विशेष बढ़े हुए हों, उन्हें शमन करने के लिए उचित अनुपात के साथ अभ्रक भस्म का सेवन करना चाहिए।

प्रमेह रोग में शिलाजीत के साथ और कुष्ठ तथा रक्त विकार में अभ्रक भस्म एक रत्ती, बावची चूर्ण चार रत्ती, खदिरारिष्ट के साथ दें। उदर रोगों में कुमार्यासव के साथ इसका सेवन करना लाभदायक है।

राजयक्ष्मा में उपयोग

राजयक्ष्मा की प्रारम्भिक अवस्था में जब रोगी कास और ज्वर में दुर्बल हो गया हो, उस अवस्था में प्रवाल पिष्टी, मृगशृंग भस्म और गिलोय सत्व के साथ अभ्रक भस्म के नियमित सेवन से 80 प्रतिशत लाभ हुआ है।

रक्ताणुओं की कमी से उत्पन्न पाण्डु और कामला पर अभ्रक भस्म को मण्डूर भस्म और अमृतारिष्ट के साथ देने से बहुत लाभ होता है।

आजकल डॉक्टर लोग शरीर में रक्त की कमी की पूर्ति दूसरों के रक्त का इंजेक्शन देकर करते हैं, किन्तु कभी-कभी इसके परिणाम भयंकर भी सिद्ध होते हैं। परन्तु आयुर्वेद में गुड़ूची सत्व के साथ अभ्रक सेवन कराने से यह काम निरापद रूप से पूरा हो जाता है।

संग्रहणी में उपयोग

संग्रहणी में अभ्रक भस्म का सेवन कुटजावलेह के साथ करने से यह आँव रोग को समूल नष्ट कर शरीर को निरोग बना देती है।

वातजन्य शूल में अभ्रक भस्म का सेवन शंख भस्म में मिलाकर अजवायन अर्क के साथ करना परमोपयोगी है।

श्वास-रोग में उपयोग

श्वास-रोग पुराना हो जाने पर रोगी बहुत कमजोर हो जाता है और बहुत खाँसने पर थोड़ा-सा चिकना सफेद कफ निकलता है तथा थोड़ा-सा भी परिश्रम करने से पसीना आ जाता है। ऐसी अवस्था में अभ्रक भस्म का सेवन पिप्पली चूर्ण के साथ मधु मिलाकर करना बहुत लाभदायक है अथवा 1 तोला च्यवनप्राश चौथाई रत्ती स्वर्ण वर्क के साथ सेवन कराने से भी लाभ होता है।

सामान्य कास

सामान्य कास रोग में अधिक कफस्त्राव होने पर श्रृंग भस्म या वासावलेह के साथ तथा शुष्क कास रोग में प्रवाल पिष्टी, सितोपलादि चूर्ण तथा मक्खन या मधु के साथ इस भस्म का सेवन कराने में भी लाभ होता है।

आँव (पेचिश) में कुटजारिष्ट के साथ, मन्दाग्नि में त्रिकटु (सोंठ, पीपल, मिर्च) चूर्ण के साथ तथा जीर्णज्वर में लघु वसन्तमालिनी के साथ अभ्रक भस्म विशेष लाभ करती है।

रक्तार्श (खूनी बवासीर) में

रक्तार्श (खूनी बवासीर) पुराना हो जाने पर बारम्बार रक्तस्त्राव होने लगता है। शरीर में थोड़ा भी रक्त उत्पन्न होने से रक्तस्त्राव होने लगता है। ऐसी अवस्था में अभ्रक भस्म शुक्ति पिष्टी के साथ देने से रक्तस्राव बन्द हो जाता है।

मानसिक दुर्बलता में

मानसिक दुर्बलता होने पर कार्य करने का उत्साह नष्ट हो जाता है। चित्त में अत्यधिक चंचलता रहती है। रोगी निस्तेज, चिन्ताग्रस्त और क्रोधी हो जाता है। ऐसी अवस्था में अभ्रक भस्म का सेवन मुक्ता पिष्टी के साथ करना अधिक लाभप्रद है।

मन्दाग्नि हो जाने से खाया हुआ अन्न ठीक तरह से नहीं पचता, जिससे शरीर में बल की वृद्धि नहीं होती। परिणाम यह होता है कि अपस्मार, उन्माद, स्मृतिनाश, अनिद्रा, चित्तचांचल्य, हिस्टीरिया आदि अनेक मानसिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसी दशा में अभ्रक भस्म के सेवन से थोड़े ही दिनों में बल की वृद्धि होकर शरीर पुष्ट हो जाता है। ब्राह्मी चूर्ण के साथ अभ्रक भस्म का सेवन करना मानसिक रोगों में लाभदायक है।

हृदय की दुर्बलता में

हृदय की दुर्बलता को नष्ट करने के लिए अभ्रक भस्म बहुत उपयोगी है। नागार्जुनाभ्र, जो हृदय-पुष्टि के लिए ही प्रसिद्ध है, इसके गुणों में सहस्रपुटी अभ्रक भस्म का ही विशेष प्रभाव है।

अभ्रक भस्म हृदय को उत्तेजना देने वाली है, किन्तु यह कर्पूर और कुचिला के समान हृदय को विशेष उत्तेजित नहीं करती। यह हृदय के स्नायुमंडल को सबल बनाकर हृदय में स्फूर्ति पैदा करती है।

अभ्रक सहस्त्रपुटी 1-1 रत्ती को मधु में मिलाकर सेवन करने से हृदय में अच्छा लाभ होता है।

पुरानी खाँसी और दमा में

पुरानी खाँसी, श्वास, दमा आदि रोगों में रोगी खाँसते-खाँसते या दमा के मारे परेशान हो जाता है। श्वास नली या कण्ठ में क्षत (घाव) हो गया हो, ज्यादा खाँसने पर जरा-सा सफेद-चिकना कफ निकल पड़ता हो, रोगी पसीने से तर हो जाता हो — इन कारणों से दुर्बलता विशेष बढ़ गयी हो, तो अभ्रक भस्म, पिप्पली चूर्ण और मिश्री की चाशनी के साथ मिलाकर लेने से अच्छा लाभ करती है।

चिरस्थायी अम्लपित्त में

चिरस्थायी (बहुत दिनों का) अम्लपित्त रोग में अनेक दवा करके थक गए हों, अनेक डॉक्टर या वैद्य, हकीम असाध्य कहकर छोड़ दिये हों, पेट में दर्द बना रहता हो, हर वक्त वमन करने की इच्छा होती हो, कुछ खाते ही वमन हो जाय, वमन के साथ रक्त भी निकलता हो, तो ऐसी अवस्था में अभ्रक भस्म को अम्लपित्तान्तक लौह और शहद के साथ मिलाकर देने से बहुत शीघ्र लाभ होता है।

प्रसूत रोग में

प्रसूत रोग में देवदार्वादि क्वाथ अथवा दशमूल क्वाथ या दशमूलारिष्ट के साथ अभ्रक भस्म का सेवन लाभप्रद है।

धातुक्षीणता की बीमारी में च्यवनप्राश और प्रवाल पिष्टी के साथ इसका सेवन करना उत्तम है।

अभ्रक भस्म योगवाही

अभ्रक भस्म योगवाही है। अतः यह अपने साथ मिले हुए द्रव्यों के गुणों को बढ़ाती है। पाचन विकार को नष्ट कर आंत को सशक्त बनाने और रुचि उत्पन्न करने के लिए अभ्रक भस्म का मिश्रण देना अति उत्तम है।

संग्रहणी में अभ्रपर्पटी (गगन पर्पटी) उत्तम कार्य करती है। मलावरोध तथा संचित मल के विकारों के लिये अभ्रपर्पटी का प्रयोग महोपकारी है।

यकृत् विकार में

पाचक और रंजक पित्त की कमी होने पर यकृत् विकार को दूर करने के लिए मण्डूर भस्म के साथ अभ्रक भस्म देना चाहिए।

इसी प्रकार अरुचि, अम्लपित्त और पित्त की प्रबलता में कपर्दक भस्म और प्रवाल-पिष्टी के साथ प्रयोग करने से अच्छा लाभ होता है।

गर्भावस्था एवं शिशु-पुष्टि संबंधी पारंपरिक उल्लेख

जिस स्त्री के बच्चे कमजोर पैदा होते हों, उस स्त्री को अभ्रक भस्म सितोपलादि चूर्ण मिलाकर कुछ रोज तक सेवन करावें तो गर्भस्थ बालक सुपुष्ट होकर पैदा होगा।

अभ्रक भस्म रसायन और वृष्य होने के कारण इसका प्रभाव रस, रक्तादि धातुओं पर बहुत अच्छा पड़ता है।

शरीर में रक्ताणुओं की कमी हो जाने के कारण शरीर पीला हो जाता है। यह रोग अक्सर कच्ची उम्र में जिस स्त्री को बच्चा पैदा होता है, इसके साथ-साथ ज्वर, शरीर में आलस्य, कमजोरी, मंदाग्नि आदि उपद्रव भी होते हैं। ऐसी दशा में अभ्रक भस्म कान्तलोह भस्म के साथ दें और ऊपर से दशमूल क्वाथ का अनुपान देने से बहुत लाभ होता है।


महत्वपूर्ण सावधानी

अभ्रक भस्म एक पारंपरिक आयुर्वेदिक खनिज-आधारित तैयारी है। ऊपर दी गयी शोधन, मारण, पुट, मात्रा और अनुपान संबंधी विधियाँ पारंपरिक ग्रंथीय विवरण के रूप में प्रस्तुत की गयी हैं। इन्हें घर पर स्वयं तैयार करना या बिना योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की देखरेख के सेवन करना उचित नहीं है।

विशेष रूप से अभ्रक भस्म के निर्माण में शोधन, निश्चन्द्रीकरण, मारण और भस्म-परीक्षा की प्रक्रियाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। खनिज-आधारित भस्म की गुणवत्ता, शुद्धता और संभावित धातु/खनिज अवशेषों के कारण आधुनिक सुरक्षा मानकों के अनुसार परीक्षण भी महत्वपूर्ण है।

गर्भावस्था, बच्चों, बुजुर्गों तथा गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों में किसी भी भस्म का सेवन चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिए। ऊपर उल्लिखित रोगों के उपचार संबंधी दावों को पारंपरिक आयुर्वेदिक साहित्य में वर्णित उपयोग के रूप में समझना चाहिए, आधुनिक चिकित्सा द्वारा सिद्ध उपचार के रूप में नहीं।

निष्कर्ष

अभ्रक को आयुर्वेद में महारसों में स्थान दिया गया है और विशेष रूप से वज्राभ्रक का उल्लेख भस्म निर्माण के लिए किया गया है। पारंपरिक आयुर्वेदिक साहित्य में अभ्रक भस्म का वर्णन रसायन, बलवर्धक, वृष्य तथा विभिन्न रोगों में विभिन्न अनुपानों के साथ प्रयोग किये जाने वाली औषधि के रूप में मिलता है।

इसके शोधन, निश्चन्द्रीकरण, मारण और भस्म-परीक्षा की प्रक्रियाओं को विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए अभ्रक भस्म का प्रयोग केवल उचित रूप से तैयार और परीक्षित औषधि के रूप में तथा योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए।

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