आज की बदलती जीवनशैली में कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या बन चुका है, जिसके बारे में लगभग हर व्यक्ति ने कभी न कभी सुना है। अनियमित खान-पान, अत्यधिक तला-भुना भोजन, शारीरिक गतिविधि की कमी, बढ़ता मोटापा, तनाव, धूम्रपान और मधुमेह जैसी स्थितियां हृदय एवं रक्तवाहिनियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।
अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न रहता है कि आखिर प्रतिदिन हमें क्या और कितना खाना चाहिए ताकि भोजन शरीर को पोषण दे, ऊर्जा प्रदान करे और बीमारी का कारण न बने। केवल पेट भर लेना ही पर्याप्त नहीं है। शरीर के प्रत्येक अंग को आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा में मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि शरीर को आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाए तो कमजोरी और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। दूसरी ओर आवश्यकता से अधिक कैलोरी, शक्कर और अस्वास्थ्यकर वसा का सेवन वजन बढ़ने तथा चयापचय संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है।
इसीलिए कोलेस्ट्रॉल को समझना और उसे नियंत्रित रखने के लिए भोजन, व्यायाम, तनाव नियंत्रण और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय उपचार—इन सभी पर ध्यान देना जरूरी है।
कोलेस्ट्रॉल शरीर में पाया जाने वाला एक मोम जैसा, वसा-सदृश पदार्थ है। शरीर को इसकी आवश्यकता कोशिकाओं के निर्माण तथा कुछ महत्वपूर्ण हार्मोन और अन्य जैविक प्रक्रियाओं के लिए होती है।
इसलिए यह कहना सही नहीं है कि कोलेस्ट्रॉल अपने आप में पूरी तरह खराब पदार्थ है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब रक्त में कुछ प्रकार के लिपिड, विशेषकर LDL cholesterol, लंबे समय तक अधिक मात्रा में बने रहते हैं।
कोलेस्ट्रॉल रक्त में अकेले यात्रा नहीं करता। यह लिपोप्रोटीन नामक कणों के माध्यम से शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचता है।
सामान्य रूप से रक्त की जांच में HDL और LDL जैसे नाम सुनने को मिलते हैं।
HDL का पूरा नाम High-Density Lipoprotein है। इसे सामान्य भाषा में "अच्छा कोलेस्ट्रॉल" कहा जाता है क्योंकि यह शरीर में अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को वापस यकृत तक पहुंचाने में भूमिका निभाता है।
LDL का पूरा नाम Low-Density Lipoprotein है। इसे सामान्यतः "खराब कोलेस्ट्रॉल" कहा जाता है क्योंकि रक्त में इसकी अधिक मात्रा धमनियों में प्लाक बनने के जोखिम से जुड़ी होती है।
हालांकि केवल HDL और LDL देखकर ही व्यक्ति के हृदय रोग का पूरा जोखिम निर्धारित नहीं किया जा सकता। डॉक्टर आमतौर पर उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास और अन्य जोखिम कारकों को भी ध्यान में रखते हैं।
American Heart Association भी स्वस्थ भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उपचार को कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती है।
जी हां। शरीर को कुछ मात्रा में कोलेस्ट्रॉल की आवश्यकता होती है। इसलिए लक्ष्य कोलेस्ट्रॉल को पूरी तरह खत्म करना नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए उचित स्तर बनाए रखना है।
शरीर स्वयं भी कोलेस्ट्रॉल बनाता है और भोजन से भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए केवल यह सोच लेना कि "मैंने कोलेस्ट्रॉल वाला भोजन नहीं खाया, इसलिए मेरा कोलेस्ट्रॉल सामान्य रहेगा", सही नहीं है।
आहार में मौजूद वसा की गुणवत्ता, कुल कैलोरी, वजन, शारीरिक गतिविधि और आनुवंशिक कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लंबे समय तक असामान्य LDL cholesterol और अन्य जोखिम कारकों की मौजूदगी में धमनियों की अंदरूनी दीवारों में atherosclerotic plaque बनने की प्रक्रिया हो सकती है।
इसे आम बोलचाल में लोग "नसों में कोलेस्ट्रॉल जमना" कहते हैं।
समय के साथ प्लाक बढ़ सकता है और धमनी के अंदर रक्त के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। यदि हृदय की धमनियां प्रभावित हों तो कोरोनरी हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है।
यदि प्लाक टूटकर रक्त का थक्का बनने की स्थिति पैदा करे, तो गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है।
इसीलिए लंबे समय तक बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को केवल एक सामान्य रिपोर्ट की समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
इस विषय में एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।
कार्बोहाइड्रेट शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। अनाज, दालें, फल और कई सब्जियां कार्बोहाइड्रेट के स्रोत हैं। लेकिन सभी कार्बोहाइड्रेट एक जैसे नहीं होते।
साबुत अनाज, दालें, फल और सब्जियों से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट तथा फाइबर स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकते हैं, जबकि अत्यधिक मात्रा में मिठाई, मीठे पेय, रिफाइंड खाद्य पदार्थ और अत्यधिक कैलोरी लेना वजन तथा चयापचय संबंधी समस्याओं में योगदान कर सकता है।
WHO स्वस्थ आहार में साबुत अनाज, फल, सब्जियां, दालें और मेवे शामिल करने तथा अतिरिक्त शर्करा, अत्यधिक वसा और विशेष रूप से संतृप्त एवं ट्रांस वसा को सीमित करने की सलाह देता है।
कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का केवल एक कारण नहीं होता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे:
असंतुलित आहार
अत्यधिक संतृप्त वसा का सेवन
ट्रांस फैट का सेवन
अधिक वजन या मोटापा
शारीरिक गतिविधि की कमी
धूम्रपान
मधुमेह
उच्च रक्तचाप
आनुवंशिक कारण
बढ़ती उम्र
कुछ चिकित्सकीय स्थितियां
कुछ दवाइयों का प्रभाव
लंबे समय तक खराब जीवनशैली
WHO के अनुसार अस्वास्थ्यकर आहार, शारीरिक निष्क्रियता, तंबाकू और अन्य जोखिम कारक हृदय एवं रक्तवाहिका संबंधी रोगों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
आज के समय में मानसिक तनाव भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। काम का दबाव, आर्थिक चिंता, पारिवारिक समस्याएं, नींद की कमी और लगातार मानसिक तनाव जीवनशैली को प्रभावित कर सकते हैं।
तनाव के दौरान व्यक्ति अक्सर अधिक मीठा, फास्ट फूड या तला-भुना भोजन खाने लगता है। तनाव के कारण नींद खराब हो सकती है और शारीरिक गतिविधि भी कम हो सकती है।
इस प्रकार तनाव अप्रत्यक्ष रूप से वजन, रक्तचाप और हृदय स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
इसलिए कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में केवल भोजन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और मानसिक तनाव को संभालना भी आवश्यक है।
कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर हमेशा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि कई लोगों को काफी समय तक पता ही नहीं चलता कि उनका LDL cholesterol बढ़ा हुआ है।
एक साधारण लिपिड प्रोफाइल टेस्ट से कुल कोलेस्ट्रॉल, LDL, HDL और triglycerides जैसी जानकारी मिल सकती है।
यदि रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल अधिक है तो उसे देखकर स्वयं कोई दवा शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए। डॉक्टर व्यक्ति के पूरे स्वास्थ्य और हृदय रोग के जोखिम को देखकर उपचार की सलाह देते हैं।
कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण के लिए भोजन में प्राकृतिक और कम-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देना उपयोगी हो सकता है।
पालक, मेथी, सरसों का साग, लौकी, तोरई, भिंडी, गोभी और अन्य मौसमी सब्जियां भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाई जा सकती हैं।
सब्जियों में फाइबर, विटामिन, खनिज और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं।
मूंग, मसूर, चना, राजमा, लोबिया और अन्य फलियां संतुलित आहार का हिस्सा हो सकती हैं।
इनसे प्रोटीन और फाइबर प्राप्त होता है।
रिफाइंड अनाज की तुलना में साबुत अनाज जैसे ओट्स, दलिया, जौ, साबुत गेहूं और अन्य संपूर्ण अनाज अधिक फाइबर प्रदान कर सकते हैं।
सेब, अमरूद, संतरा, पपीता, नाशपाती, मौसमी और अन्य फल संतुलित मात्रा में लिए जा सकते हैं।
फलों का सेवन सामान्यतः पूरे फल के रूप में करना बेहतर होता है, बजाय इसके कि बार-बार मीठे फलों का रस या पैकेज्ड जूस लिया जाए।
WHO प्रतिदिन कम से कम 400 ग्राम फल और सब्जियों के सेवन का सामान्य लक्ष्य बताता है।
बादाम, अखरोट, अलसी और अन्य बीजों का सीमित मात्रा में सेवन किया जा सकता है। इनमें असंतृप्त वसा और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं।
लेकिन यह याद रखें कि मेवे कैलोरी से भरपूर होते हैं। इसलिए इन्हें "जितना ज्यादा उतना अच्छा" समझकर अत्यधिक मात्रा में नहीं खाना चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति का कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है तो निम्न खाद्य पदार्थों को सीमित करना उपयोगी हो सकता है:
बहुत अधिक तला हुआ भोजन
पैकेज्ड स्नैक्स
अत्यधिक मिठाइयां
मीठे शीतल पेय
बेकरी के अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ
अत्यधिक मक्खन
अत्यधिक घी
अत्यधिक वसायुक्त मांस
प्रोसेस्ड मीट
ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थ
अत्यधिक नमक
अत्यधिक चीनी
विशेष रूप से औद्योगिक ट्रांस फैट हृदय स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है। WHO के अनुसार ट्रांस फैट धमनियों को प्रभावित कर हृदयाघात के जोखिम को बढ़ा सकता है और इसे यथासंभव कम करना चाहिए।
आम तौर पर वसा को पूरी तरह खत्म करना उचित नहीं है। शरीर को कुछ आवश्यक वसा की जरूरत होती है।
लेकिन वसा की मात्रा और गुणवत्ता दोनों महत्वपूर्ण हैं।
संतृप्त वसा का अत्यधिक सेवन LDL cholesterol बढ़ाने में योगदान कर सकता है। इसके स्थान पर असंतृप्त वसा के बेहतर स्रोतों को उचित मात्रा में शामिल करना अधिक उपयोगी हो सकता है।
WHO कुल वसा को संतुलित रखने और संतृप्त एवं ट्रांस वसा की जगह असंतृप्त वसा को प्राथमिकता देने की सलाह देता है।
इसलिए किसी भी एक तेल या घी को "कोलेस्ट्रॉल की दवा" समझना सही नहीं है।
आयुर्वेद आधुनिक चिकित्सा के LDL और HDL जैसे प्रयोगशाला मानकों के समान सीधे वर्गीकरण का उपयोग नहीं करता।
आयुर्वेद में शरीर की प्रकृति, आहार-विहार, अग्नि, मेद, आम, दोषों के संतुलन और व्यक्ति की संपूर्ण अवस्था को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य का मूल्यांकन किया जाता है।
आधुनिक संदर्भ में आयुर्वेदिक जीवनशैली का सबसे उपयोगी हिस्सा संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, उचित शारीरिक गतिविधि और भोजन की गुणवत्ता पर ध्यान देने के रूप में समझा जा सकता है।
कुछ आयुर्वेदिक पौधों और खाद्य पदार्थों पर हृदय स्वास्थ्य तथा लिपिड प्रोफाइल से संबंधित शोध हुआ है। लेकिन किसी भी औषधि को सभी लोगों के लिए समान रूप से प्रभावी मानना उचित नहीं है।
अर्जुन (Terminalia arjuna) आयुर्वेद में हृदय स्वास्थ्य के लिए लंबे समय से प्रयोग किया जाने वाला पौधा है।
आयुर्वेदिक परंपरा में अर्जुन की छाल का उल्लेख हृदय संबंधी स्वास्थ्य के संदर्भ में मिलता है। आधुनिक शोध में भी अर्जुन पर अध्ययन हुए हैं, लेकिन इसे उच्च LDL या कोरोनरी धमनी रोग के स्थापित उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति पहले से हृदय की दवा ले रहा है तो अर्जुन या किसी अन्य हर्बल उत्पाद को शुरू करने से पहले चिकित्सक/योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से सलाह लेना उचित है।
लहसुन का उपयोग भारतीय भोजन और पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से किया जाता रहा है।
कुछ अध्ययनों में लहसुन के सेवन और रक्त लिपिड पर संभावित प्रभाव का अध्ययन किया गया है। हालांकि लहसुन को cholesterol-lowering medicine का विकल्प नहीं समझना चाहिए।
अलसी में फाइबर और पौध-आधारित ओमेगा-3 फैटी एसिड पाए जाते हैं। इसे संतुलित आहार में उचित मात्रा में शामिल किया जा सकता है।
आंवला भारतीय परंपरा में एक महत्वपूर्ण फल माना जाता है। इसमें विटामिन C तथा अन्य जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं।
आंवले को भोजन का हिस्सा बनाया जा सकता है, लेकिन केवल आंवला खाने से बहुत अधिक LDL cholesterol सामान्य हो जाएगा—ऐसा दावा वैज्ञानिक रूप से निश्चित नहीं है।
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
पारंपरिक आयुर्वेद में विभिन्न रस, भस्म और खनिज-आधारित तैयारियों का वर्णन मिलता है। लेकिन इनका सेवन स्वयं से शुरू करना उचित नहीं है।
कुछ आयुर्वेदिक तैयारियों में धातु या खनिज घटक हो सकते हैं। NCCIH के अनुसार कुछ Ayurvedic preparations में lead, mercury या arsenic जैसे पदार्थ विषाक्त मात्रा में पाए जाने की संभावना हो सकती है। इसलिए ऐसे उत्पादों का उपयोग योग्य चिकित्सक की देखरेख तथा विश्वसनीय, गुणवत्ता-नियंत्रित उत्पाद के साथ ही किया जाना चाहिए।
इसलिए जहरमोहरा पिष्टी, मुक्तापिष्टी, स्वर्णभस्म, रजत भस्म, योगेंद्र रस, प्रभाकर वटी या अन्य किसी औषधि की खुराक इंटरनेट पर देखकर स्वयं तय नहीं करनी चाहिए।
विशेषकर यदि व्यक्ति को हृदय रोग, किडनी की समस्या, लिवर की बीमारी, मधुमेह या रक्तचाप की समस्या है अथवा वह पहले से कई दवाएं ले रहा है तो चिकित्सकीय सलाह और भी आवश्यक है।
इस प्रश्न का उत्तर व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है, लेकिन सामान्य रूप से यह कहना उचित नहीं है कि आयुर्वेदिक दवा हर व्यक्ति में statin या अन्य cholesterol-lowering medicine का विकल्प है।
कुछ लोगों में LDL cholesterol कम करने के लिए चिकित्सकीय दवा आवश्यक हो सकती है। American Heart Association के अनुसार statins और अन्य cholesterol-lowering medicines कुछ मरीजों में हृदय रोग के जोखिम को कम करने के लिए उपयोग की जाती हैं।
यदि डॉक्टर ने पहले से cholesterol की दवा दी है तो केवल आयुर्वेदिक उपचार शुरू करने के लिए उसे अचानक बंद नहीं करना चाहिए।
आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा को आवश्यकता के अनुसार एक-दूसरे के साथ सुरक्षित तरीके से उपयोग करने के लिए डॉक्टरों से सलाह लेना बेहतर है।
कुछ लोग मानते हैं कि यदि आयुर्वेदिक दवा ले ली जाए तो बाईपास या एंजियोप्लास्टी की जरूरत कभी नहीं पड़ेगी। यह दावा उचित नहीं है।
यदि किसी व्यक्ति की coronary arteries में गंभीर blockage है और डॉक्टर angioplasty, stent या bypass की सलाह देते हैं तो केवल किसी घरेलू या आयुर्वेदिक उपाय के भरोसे उपचार में देरी करना खतरनाक हो सकता है।
उपचार का निर्णय blockage की गंभीरता, लक्षण, हृदय की कार्यक्षमता और व्यक्ति के संपूर्ण cardiovascular risk के आधार पर किया जाता है।
आयुर्वेदिक आहार-विहार और supportive approaches स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन गंभीर हृदय रोग में आवश्यक चिकित्सा का विकल्प नहीं हैं।
नियमित शारीरिक गतिविधि कोलेस्ट्रॉल और हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
यदि व्यक्ति स्वस्थ है और डॉक्टर ने व्यायाम की अनुमति दी है तो नियमित तेज चाल से चलना, योग, साइकिलिंग, तैराकी या अन्य उपयुक्त गतिविधि की जा सकती है।
लेकिन जिस व्यक्ति को पहले से सीने में दर्द, सांस फूलना, चक्कर या ज्ञात हृदय रोग है, उसे व्यायाम की शुरुआत डॉक्टर की सलाह के अनुसार करनी चाहिए।
WHO हृदय रोग के जोखिम को कम करने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ आहार और तंबाकू से बचने जैसे उपायों पर जोर देता है।
अधिक वजन और विशेषकर पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी कई metabolic risk factors से जुड़ी हो सकती है।
वजन को स्वस्थ सीमा में रखना, भोजन की मात्रा को नियंत्रित करना और नियमित शारीरिक गतिविधि करना cholesterol management में सहायक हो सकता है।
वजन कम करने के लिए अचानक बहुत कम खाना या बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई crash diet अपनाना उचित नहीं है।
सुबह उठने के बाद:
सामान्य या गुनगुना पानी
आवश्यकता और व्यक्तिगत सहनशीलता के अनुसार हल्का नाश्ता
नाश्ते में:
दलिया या ओट्स
मूंग दाल चीला
सब्जियों वाला पोहा
सीमित मात्रा में फल
दोपहर में:
2 छोटी/मध्यम रोटी या उचित मात्रा में साबुत अनाज
एक कटोरी दाल
एक या दो प्रकार की सब्जियां
सलाद
दही, यदि व्यक्ति को अनुकूल हो
शाम में:
फल
थोड़े मेवे
बिना अधिक चीनी वाला पेय
रात में:
हल्का भोजन
सब्जी
दाल
रोटी या अन्य उपयुक्त साबुत अनाज
यह केवल सामान्य उदाहरण है। मधुमेह, किडनी रोग, लिवर रोग, मोटापा या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं वाले व्यक्ति के लिए भोजन की मात्रा अलग हो सकती है।
स्वस्थ भोजन भी आवश्यकता से अधिक मात्रा में खाने पर अतिरिक्त कैलोरी दे सकता है।
बार-बार डीप फ्राई भोजन लेने की आदत को कम करें।
वनस्पति शॉर्टनिंग, कुछ पैकेज्ड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में ट्रांस फैट हो सकता है। लेबल पढ़ना उपयोगी है।
दाल, फलियां, सब्जियां, फल और साबुत अनाज को भोजन में शामिल करें।
धूम्रपान हृदय एवं रक्तवाहिकाओं के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है।
योग, ध्यान, प्राणायाम, पर्याप्त नींद और पसंदीदा गतिविधियां तनाव प्रबंधन में सहायता कर सकती हैं।
यदि परिवार में कम उम्र में हृदय रोग या उच्च cholesterol का इतिहास है तो नियमित जांच विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।
उच्च cholesterol स्वयं अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देता।
लेकिन यदि किसी व्यक्ति को:
सीने में दबाव या दर्द
सांस लेने में परेशानी
अचानक अत्यधिक पसीना
अचानक कमजोरी
चेहरे या हाथ-पैर के एक हिस्से में कमजोरी
बोलने में कठिनाई
अचानक चक्कर या बेहोशी
जैसे लक्षण हों तो इसे केवल "कोलेस्ट्रॉल की समस्या" समझकर घर पर इलाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण गंभीर हृदय या मस्तिष्क संबंधी आपातस्थिति का संकेत हो सकते हैं और तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
उम्र बढ़ने के साथ हृदय रोग के कई जोखिम कारक बढ़ सकते हैं। इसलिए 40 वर्ष के बाद विशेष रूप से नियमित स्वास्थ्य जांच, रक्तचाप, रक्त शर्करा और lipid profile पर ध्यान देना उपयोगी है।
हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि cholesterol संबंधी समस्या केवल बुजुर्गों में नहीं होती। आनुवंशिक कारणों और अन्य स्थितियों के कारण कम उम्र के लोगों में भी cholesterol बढ़ सकता है।
American Heart Association के अनुसार cholesterol से संबंधित cardiovascular risk कम उम्र से ही विकसित हो सकता है और नियमित जांच व्यक्तिगत जोखिम को समझने में मदद करती है।
आयुर्वेद का मूल दृष्टिकोण केवल बीमारी आने के बाद उपचार करने तक सीमित नहीं है। दिनचर्या, ऋतुचर्या, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, व्यायाम और मानसिक संतुलन पर भी जोर दिया जाता है।
आज के समय में इन्हीं सिद्धांतों को वैज्ञानिक रूप से समझते हुए स्वस्थ जीवनशैली के साथ अपनाया जा सकता है।
एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने भोजन को प्राकृतिक और विविध बनाए, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को सीमित करे, नियमित गतिविधि करे और अपनी स्वास्थ्य जांच कराता रहे।
कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए पूरी तरह अनावश्यक पदार्थ नहीं है। शरीर को इसकी आवश्यकता होती है, लेकिन रक्त में LDL cholesterol का अत्यधिक स्तर और अन्य cardiovascular risk factors धमनियों में plaque बनने तथा हृदय रोग के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
इसलिए cholesterol नियंत्रण का सबसे अच्छा तरीका केवल किसी एक दवा या घरेलू नुस्खे पर निर्भर रहना नहीं है।
संतुलित आहार + नियमित व्यायाम + स्वस्थ वजन + तनाव नियंत्रण + धूम्रपान से दूरी + नियमित जांच + आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय उपचार—इन सभी का संयोजन अधिक प्रभावी और सुरक्षित दृष्टिकोण है।
आयुर्वेद में अर्जुन, आंवला, अलसी, लहसुन आदि जैसे खाद्य एवं औषधीय घटकों का पारंपरिक महत्व है, लेकिन इन्हें व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार ही उपयोग करना चाहिए। विशेष रूप से रस, भस्म और खनिज-आधारित आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन बिना योग्य चिकित्सक की सलाह के नहीं करना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि किसी व्यक्ति का cholesterol बहुत अधिक है, उसे पहले से हृदय रोग है या डॉक्टर ने cholesterol-lowering medicine दी है, तो वह अपनी दवा स्वयं बंद न करे। आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक जीवनशैली के बीच सुरक्षित एवं व्यक्तिगत समन्वय के लिए योग्य चिकित्सक से सलाह लेना ही उचित है।
स्वस्थ हृदय के लिए बीमारी का इंतजार करने के बजाय आज से ही भोजन, व्यायाम और जीवनशैली पर ध्यान देना सबसे बेहतर कदम है।
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