आयुर्वेद में शरीर में उत्पन्न होने वाली सूजन, पाण्डु रोग, मन्दाग्नि, कब्ज, उदर विकार तथा शरीर में जल के असामान्य संचय जैसी स्थितियों के लिए अनेक पारंपरिक औषधि-योगों का वर्णन मिलता है। पुनर्नवादि मण्डूर भी ऐसा ही एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योग है, जिसमें पुनर्नवा तथा मण्डूर भस्म के साथ अनेक उपयोगी औषधीय द्रव्यों का समावेश किया गया है।
आयुर्वेदिक परंपरा में पुनर्नवादि मण्डूर का विशेष उल्लेख शोथ (सूजन) और पाण्डु रोग से संबंधित उपचार में मिलता है। इसके अतिरिक्त इसका प्रयोग उदर संबंधी विकारों, प्लीहा-वृद्धि, मन्दाग्नि, कब्ज तथा कुछ अन्य वात-कफ प्रधान विकारों में भी चिकित्सकीय निर्देशानुसार किया जाता रहा है।
इस योग में प्रयुक्त पुनर्नवा को आयुर्वेद में विशेष रूप से शोथहर अर्थात सूजन को कम करने वाले द्रव्य के रूप में जाना जाता है, जबकि मण्डूर का संबंध पाण्डु और रक्तधातु से जुड़े विकारों के पारंपरिक उपचार से माना जाता है। अन्य द्रव्य पाचन शक्ति को संतुलित करने, आम को कम करने तथा वात-कफ के असंतुलन को नियंत्रित करने में सहायक माने जाते हैं।
हालाँकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी भी आयुर्वेदिक औषधि का सेवन रोग की प्रकृति, व्यक्ति की आयु, शारीरिक स्थिति, पाचन शक्ति और अन्य चल रही दवाओं के अनुसार योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से ही किया जाना चाहिए।
पुनर्नवादि मण्डूर एक पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधि-योग है, जिसमें पुनर्नवा और मण्डूर भस्म प्रमुख घटक हैं। इसके निर्माण में कई अन्य वनौषधियों का भी प्रयोग किया जाता है।
आयुर्वेद में शोथ अर्थात शरीर के किसी अंग या पूरे शरीर में दिखाई देने वाली सूजन को विभिन्न दोषों तथा अन्य कारणों से जोड़कर देखा जाता है। विशेषकर जब पाचन शक्ति कमजोर हो, शरीर में जल का असामान्य संचय हो, मल का ठीक प्रकार से निष्कासन न हो और वात-कफ का प्रकोप हो, तब सूजन के साथ कई अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।
पुनर्नवादि मण्डूर को परंपरागत रूप से ऐसी परिस्थितियों में उपयोगी माना गया है।
परंपरागत विधि के अनुसार इसमें निम्न द्रव्यों का प्रयोग बताया गया है:
इन वनौषधियों का चयन केवल एक ही उद्देश्य से नहीं किया गया है। आयुर्वेदिक दृष्टि से इस प्रकार के योग में अलग-अलग द्रव्य पाचन, वात-कफ संतुलन, मल निष्कासन, शोथ तथा धातु-पोषण आदि विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखकर सम्मिलित किए जाते हैं।
पुनर्नवा इस योग का प्रमुख द्रव्य है। आयुर्वेद में पुनर्नवा को विशेष रूप से शोथहर और मूत्रवह संस्थान से संबंधित उपयोगों के लिए जाना जाता है।
शरीर में अतिरिक्त जल के कारण होने वाली सूजन में पुनर्नवा का पारंपरिक उपयोग मिलता है। इसी कारण पुनर्नवा को ऐसे योगों में प्रमुखता दी जाती है जिनका उद्देश्य शरीर में रुके हुए द्रव तथा शोथ को नियंत्रित करना होता है।
पुनर्नवा का उपयोग पाचन और उदर से संबंधित कुछ विकारों में भी आयुर्वेदिक चिकित्सा परंपरा में मिलता है।
मण्डूर आयुर्वेदिक औषधियों में लंबे समय से प्रयुक्त खनिज-आधारित द्रव्य है। पाण्डु रोग तथा रक्ताल्पता से जुड़े पारंपरिक उपचारों में मण्डूर का विशेष महत्व माना गया है।
पाण्डु में शरीर का वर्ण पीला या फीका पड़ना, कमजोरी, अरुचि, मन्दाग्नि तथा अन्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं। आयुर्वेद में ऐसे रोगों के उपचार में मण्डूर-आधारित योगों का उल्लेख मिलता है।
लेकिन मण्डूर भस्म का प्रयोग अपने आप करना उचित नहीं है। भस्म की गुणवत्ता, शोधन एवं निर्माण की सही प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए बाजार से प्राप्त किसी भी उत्पाद की गुणवत्ता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
परंपरागत वर्णन के अनुसार पुनर्नवा, निशोथ, सोंठ, पीपल, मरीच, वायविडंग, देवदारू, चित्रक, पुष्करमूल, हल्दी, दारुहल्दी, दंतीमूल, हरड़, बहेड़ा, आंवला, चव्य, इंद्रजौ, कुटकी, पीपलामूल और नागरमोथा को समान मात्रा में लेकर अच्छी तरह कूट-पीसकर कपड़े से छानकर चूर्ण तैयार किया जाता है।
इसके बाद मण्डूर भस्म को निर्धारित मात्रा में लेकर गोमूत्र में पकाने की पारंपरिक विधि बताई गई है। तैयार मण्डूर को पुनर्नवा आदि के चूर्ण में मिलाकर अच्छी तरह मिश्रित किया जाता है।
जब मिश्रण गाढ़ा होकर गोली बनाने योग्य हो जाए तो घी लगे हाथों से छोटी-छोटी गोलियाँ बनाने का वर्णन मिलता है। पारंपरिक विवरण में प्रत्येक गोली लगभग तीन रत्ती की बताई गई है।
महत्वपूर्ण: यह निर्माण-विधि पारंपरिक ग्रंथीय विवरण के रूप में दी जा रही है। घर पर स्वयं मण्डूर भस्म या अन्य खनिज/धातु-आधारित औषधि तैयार करना सुरक्षित नहीं माना जाना चाहिए। औषधि का निर्माण प्रशिक्षित एवं अधिकृत आयुर्वेदिक औषधि-निर्माता द्वारा उचित गुणवत्ता नियंत्रण के साथ किया जाना चाहिए।
पारंपरिक विवरण के अनुसार:
शोथ रोग में: 2–3 गोली सुबह-शाम गोमूत्र के साथ।
पाण्डु रोग में: 2–3 गोली सुबह-शाम पुनर्नवा-स्वरस के साथ।
उदर रोग में: 2–3 गोली सुबह-शाम त्रिफला क्वाथ के साथ।
यहाँ यह विशेष रूप से समझना जरूरी है कि यह पारंपरिक मात्रा-विवरण है। आज के समय में किसी व्यक्ति के लिए वास्तविक मात्रा उसकी उम्र, वजन, रोग की अवस्था, पाचन शक्ति, गर्भावस्था, अन्य दवाओं तथा स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर चिकित्सक द्वारा तय की जानी चाहिए।
बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली महिलाओं तथा पहले से गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों में बिना चिकित्सकीय सलाह इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।
आयुर्वेदिक परंपरा में पुनर्नवादि मण्डूर को मुख्य रूप से शोथहर, पाण्डुहर तथा दीपनीय-पाचन संबंधी गुणों वाला योग माना गया है।
पारंपरिक रूप से इसके उपयोग का वर्णन निम्न स्थितियों में मिलता है:
इन उपयोगों को आयुर्वेदिक चिकित्सा के संदर्भ में समझना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति में रोग का कारण अलग हो सकता है, इसलिए केवल लक्षण देखकर औषधि शुरू कर देना उचित नहीं है।
शोथ को सामान्य भाषा में शरीर के किसी हिस्से या पूरे शरीर में दिखाई देने वाली सूजन कहा जा सकता है। पैरों, टखनों, हाथों, चेहरे या आँखों के आसपास सूजन दिखाई दे सकती है।
कभी-कभी लंबे समय तक बैठे रहने, अधिक नमक खाने या सामान्य कारणों से हल्की सूजन हो सकती है, लेकिन लगातार रहने वाली या तेजी से बढ़ने वाली सूजन कई स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत भी हो सकती है।
हृदय, गुर्दे, यकृत, रक्तवाहिनियों, पोषण की कमी अथवा कुछ दवाओं से संबंधित कारणों से भी शरीर में पानी जमा हो सकता है।
इसलिए सूजन को केवल एक सामान्य समस्या मानकर लंबे समय तक स्वयं औषधि लेना उचित नहीं है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा में रोगी की प्रकृति, दोष, अग्नि, मल-मूत्र की स्थिति तथा सूजन के कारण को देखकर उपचार निर्धारित किया जाता है। इसी संदर्भ में पुनर्नवादि मण्डूर का पारंपरिक उपयोग शोथ में वर्णित है।
पाण्डु रोग का वर्णन आयुर्वेद में महत्वपूर्ण रोगों के अंतर्गत मिलता है। इसमें शरीर का वर्ण फीका या पीला पड़ना, कमजोरी, अरुचि, मन्दाग्नि तथा अन्य लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।
जब पाण्डु रोग पुराना हो जाता है और शरीर में द्रव का असामान्य संचय होने लगता है, तब स्थिति अधिक जटिल हो सकती है। ऐसे रोगी में सूजन, कब्ज, मन्दाग्नि, भूख की कमी, पेट का फूलना, हाथ-पैर और चेहरे पर सूजन तथा कमजोरी जैसी समस्याएँ दिखाई दे सकती हैं।
पारंपरिक आयुर्वेदिक विवरण में ऐसी अवस्था में पुनर्नवादि मण्डूर को उपयोगी बताया गया है।
इस योग में पुनर्नवा को शोथ से संबंधित उपयोगों के लिए तथा मण्डूर को पाण्डु से संबंधित उपयोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। साथ में मौजूद दीपनीय एवं पाचन संबंधी द्रव्य पाचन तंत्र को सहारा देने के उद्देश्य से जोड़े गए हैं।
आयुर्वेद में अग्नि को स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। जब पाचन शक्ति कमजोर होती है तो भोजन का उचित पाचन नहीं हो पाता और इससे अरुचि, पेट फूलना, भारीपन तथा कब्ज जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
पुनर्नवादि मण्डूर में सोंठ, पीपल, मरीच, चित्रक, चव्य, नागरमोथा तथा अन्य पाचन-सहायक द्रव्य सम्मिलित हैं।
परंपरागत दृष्टि से इन द्रव्यों का उद्देश्य पाचन शक्ति को सुधारने तथा आम की स्थिति को कम करने में सहायता करना माना जाता है।
हालाँकि कब्ज का कारण केवल कमजोर पाचन नहीं होता। कम पानी पीना, कम फाइबर, शारीरिक निष्क्रियता, कुछ दवाएँ तथा कई अन्य कारण भी कब्ज पैदा कर सकते हैं।
आयुर्वेद में प्लीहा को महत्वपूर्ण अंग माना गया है और प्लीहा-वृद्धि का संबंध कई रोग अवस्थाओं से जोड़ा जाता है।
पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्लीहा संबंधी विकारों के लिए विभिन्न योगों का उपयोग किया जाता रहा है। पुनर्नवादि मण्डूर भी ऐसे योगों में वर्णित है।
लेकिन यदि किसी व्यक्ति को चिकित्सकीय जांच में प्लीहा बढ़ी हुई मिली है तो केवल आयुर्वेदिक गोली लेकर स्वयं उपचार करना उचित नहीं है। प्लीहा-वृद्धि के पीछे संक्रमण, यकृत संबंधी समस्या, रक्त संबंधी रोग अथवा अन्य कारण हो सकते हैं।
शरीर में पानी का अत्यधिक जमाव सूजन के रूप में दिखाई दे सकता है। विशेषकर पैरों और टखनों में सूजन अक्सर दिखाई देती है।
पुनर्नवा को आयुर्वेद में मूत्रल एवं शोथहर उपयोगों के लिए जाना जाता है और इसी कारण पुनर्नवा-प्रधान योगों का प्रयोग ऐसे विकारों में मिलता है।
लेकिन यदि सूजन अचानक बढ़े, सांस लेने में परेशानी हो, छाती में दर्द हो, पेशाब बहुत कम हो जाए या चेहरे और पैरों में लगातार सूजन बनी रहे तो तत्काल चिकित्सकीय जांच आवश्यक है।
पुनर्नवादि मण्डूर में अनेक ऐसे द्रव्य हैं जिनका आयुर्वेद में पाचन और अग्नि से संबंधित उपयोग मिलता है।
सोंठ, पीपल, मरीच और चित्रक जैसे द्रव्यों को पारंपरिक रूप से दीपनीय-पाचन गुणों से जोड़ा जाता है। हरड़, बहेड़ा और आंवला से बने त्रिफला समूह का भी आयुर्वेद में महत्वपूर्ण स्थान है।
इसी कारण यह योग केवल सूजन के संदर्भ में ही नहीं बल्कि पाचन एवं उदर संबंधी विकारों में भी पारंपरिक रूप से उपयोग किया गया है।
पारंपरिक विवरण में शोथ रोग के दौरान दही और नमक का सेवन बंद करने की बात कही गई है।
इसके पीछे आयुर्वेदिक आहार-विचार को समझना आवश्यक है। अत्यधिक नमक शरीर में जल धारण को बढ़ा सकता है, इसलिए सूजन वाले व्यक्तियों में नमक का अत्यधिक सेवन सामान्यतः उचित नहीं माना जाता।
रोग की अवस्था के अनुसार हल्का, सुपाच्य और संतुलित भोजन लेना उपयोगी हो सकता है।
आहार में ताजा सब्जियाँ, पर्याप्त प्रोटीन, मौसमी फल तथा चिकित्सक द्वारा उचित समझे गए खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।
बहुत अधिक तला-भुना, अत्यधिक नमकीन, अत्यधिक मसालेदार तथा पैकेज्ड भोजन का सेवन कम करना लाभकारी हो सकता है।
पुनर्नवादि मण्डूर सामान्य घरेलू हर्बल चूर्ण नहीं है। इसमें मण्डूर भस्म जैसी धातु-खनिज आधारित औषधि शामिल होती है। इसलिए इसकी गुणवत्ता और सही निर्माण प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निम्न लोगों को विशेष रूप से चिकित्सकीय सलाह के बिना इसका सेवन नहीं करना चाहिए:
हर सूजन का उपचार एक जैसा नहीं होता। यदि सूजन के साथ निम्न में से कोई लक्षण दिखाई दे तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए:
ऐसे लक्षणों में केवल किसी आयुर्वेदिक औषधि पर निर्भर रहना उचित नहीं है।
शरीर में खून की कमी को आम भाषा में एनीमिया कहा जाता है। इसके पीछे आयरन की कमी, विटामिन B12 या फोलेट की कमी, रक्तस्राव, संक्रमण, दीर्घकालिक रोग तथा अन्य कई कारण हो सकते हैं।
इसलिए यदि किसी व्यक्ति को कमजोरी, चक्कर, थकान, सांस फूलना, त्वचा का पीला या फीका पड़ना जैसी शिकायत है तो पहले चिकित्सकीय जांच कराना महत्वपूर्ण है।
आमतौर पर डॉक्टर आवश्यकता के अनुसार हीमोग्लोबिन तथा अन्य रक्त जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।
इससे पाण्डु या एनीमिया के वास्तविक कारण को समझने में सहायता मिलती है और उचित उपचार चुना जा सकता है।
आयुर्वेदिक औषधि होने का अर्थ यह नहीं है कि वह हर व्यक्ति के लिए बिना जांच के सुरक्षित होगी।
विशेषकर भस्मयुक्त औषधियों में उचित निर्माण, शोधन, मात्रा और गुणवत्ता का विशेष महत्व है। गलत मात्रा या निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद का सेवन नुकसानदायक हो सकता है।
इसीलिए यदि पुनर्नवादि मण्डूर का उपयोग करना हो तो किसी योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श करके ही लेना चाहिए।
पुनर्नवादि मण्डूर आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध पारंपरिक योग है, जिसमें पुनर्नवा, मण्डूर भस्म तथा अनेक वनौषधीय द्रव्यों का समावेश किया गया है। आयुर्वेदिक परंपरा में इसका विशेष उपयोग शोथ (सूजन), पाण्डु तथा कुछ उदर एवं पाचन संबंधी विकारों में बताया गया है।
पुनर्नवा को शोथ और मूत्र संबंधी उपयोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि मण्डूर का प्रयोग पाण्डु तथा रक्तधातु से संबंधित पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता है। सोंठ, पीपल, मरीच, चित्रक, चव्य आदि द्रव्यों को पाचन एवं अग्नि से संबंधित गुणों के लिए जाना जाता है।
पारंपरिक विवरण के अनुसार शोथ में इसे गोमूत्र, पाण्डु में पुनर्नवा-स्वरस और उदर रोग में त्रिफला क्वाथ के साथ देने का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार शोथ के दौरान दही और अधिक नमक से परहेज की बात भी बताई गई है।
फिर भी आधुनिक संदर्भ में यह समझना बहुत आवश्यक है कि शरीर में सूजन या रक्त की कमी स्वयं कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि इसके पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। इसलिए लगातार सूजन, अत्यधिक कमजोरी, पीलापन, सांस फूलना या अन्य गंभीर लक्षण होने पर पहले चिकित्सकीय जांच कराना चाहिए।
पुनर्नवादि मण्डूर का सेवन योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह, सही मात्रा और प्रमाणित गुणवत्ता वाली औषधि के साथ ही किया जाना चाहिए।
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