बुढ़ापा आने के अनेक कारण बताए गए हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
ऋतु, काल तथा प्रकृति के विरुद्ध भोजन करना
अत्यधिक भोजन करना
बिल्कुल भोजन न करना या बार-बार खाना
परिश्रम न करना
दिन में अधिक सोना
रात्रि जागरण
पचने से पहले पुनः भोजन करना
खाली पेट सोना
विषय भोगों में अत्यधिक लिप्सा
नशीले पदार्थों का सेवन
तनाव, चिंता, भय, क्रोध
लोभ, मोह, ईर्ष्या
मानसिक अस्थिरता और उद्विग्नता
असंयमित जीवनशैली
असमय बूढ़ा वही व्यक्ति होता है जो हर समय तनाव में रहता है। अधिक खाना, बार-बार खाना या बिल्कुल न खाना—तीनों ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।
आयुर्वेद में काम, क्रोध और लोभ को अच्छे स्वास्थ्य का शत्रु माना गया है—
काम से वात दोष बढ़ता है
क्रोध से पित्त दोष बढ़ता है
लोभ से कफ दोष बढ़ता है
अतः इन तीनों पर नियंत्रण रखना उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।
आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि शरीर में वात, पित्त और कफ समान अवस्था में रहें।
यदि ये तीनों संतुलित रहते हैं, तो मनुष्य स्वस्थ रहता है। इनमें से किसी एक के भी दूषित या कुपित होने पर शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। इसलिए अपनी प्रकृति के अनुसार—
खान-पान
रहन-सहन
दिनचर्या
व्यायाम
ऋतुचर्या
पर नियंत्रण रखना आवश्यक है।
बुढ़ापे के कारणों को निम्न उपायों से दूर किया जा सकता है—
मानसिक स्थिरता बनाए रखें
नियमित दिनचर्या अपनाएं
प्रतिदिन व्यायाम करें
योगासन और प्राणायाम करें
स्वास्थ्यवर्धक आहार लें
समय पर सोएं और जागें
क्रोध और तनाव से बचें
संतुलित भोजन करें
आयुर्वेद में कहा गया है कि—
बाईं करवट सोने वाला
दिन में केवल दो बार भोजन करने वाला
दिन-रात में छह बार मूत्र त्याग और दो बार मल त्याग करने वाला व्यक्ति
100 वर्ष तक जीवित रह सकता है।
60 वर्ष की आयु के बाद भोजन में 30% से 50% तक कटौती करना उत्तम स्वास्थ्य और आयुवृद्धि में सहायक माना गया है।
बुढ़ापे में विशेष रूप से विटामिन C और विटामिन E का सेवन शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और मनुष्य को दीर्घायु बनाता है।
आहार में छह रसों का संतुलन आवश्यक है—
मधुर
अम्ल
लवण
कटु
कषाय
तिक्त
अपनी प्रकृति और शरीर की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उचित आहार लेने से शरीर स्वस्थ रहता है।
यदि प्रतिदिन सुबह दो नग छोटी हरड़ का सेवन निम्न में से किसी एक पदार्थ के साथ किया जाए—
गुड़
शक्कर
शहद
सोंठ
पीपल
सेंधा नमक
तो कोई रोग पास नहीं आता और मनुष्य 100 वर्षों तक स्वस्थ रह सकता है।
ग्रीष्म ऋतु – गुड़ के साथ
वर्षा ऋतु – सेंधा नमक के साथ
शरद ऋतु – आंवला चूर्ण के साथ
हेमंत ऋतु – सोंठ के साथ
शिशिर ऋतु – पीपल चूर्ण के साथ
शीत ऋतु – शहद के साथ
इस प्रकार हरड़ का सेवन करने से जीवन भर रोग नहीं होते।
आचार्य चरक ने यौवन को स्थिर रखने वाले पदार्थों में आंवले को सर्वोत्तम माना है।
हृदय और नाड़ी संस्थान के लिए लाभकारी
धमनियों में कठोरता नहीं आने देता
विटामिन C से भरपूर
हृदयाघात की संभावना कम करता है
नियमित सेवन से बुढ़ापा धीमा होता है
लहसुन रसायन का कार्य करता है।
धमनियों को स्वस्थ रखता है
त्वचा की झुर्रियां कम करता है
पेट के रोगों में लाभकारी
ग्रीष्म ऋतु छोड़कर अन्य सभी ऋतुओं में उपयोगी
प्रतिदिन सुबह खाली पेट—
10 किलो वजन वाले व्यक्ति के लिए 1 ताजी नीम की पत्ती
70 किलो वजन वाले व्यक्ति के लिए 7 ताजी पत्तियां या 7 ग्राम चूर्ण
अन्य ऋतुओं में कम से कम 10 तुलसी की पत्तियां चबाकर खानी चाहिए।
इससे—
रोग नहीं होते
शरीर स्वस्थ रहता है
असमय बुढ़ापा नहीं आता
गाय के दूध में घी मिलाकर पीने से—
शरीर पुष्ट होता है
आयु बढ़ती है
शक्ति बढ़ती है
आयुर्वेद में कहा गया है—
“जिसकी मां नहीं होती, हरड़ उसकी मां के समान सेवा करती है।”
माता कभी कुपित हो सकती है, परंतु पेट में गई हरड़ कभी कुपित नहीं होती।
चित्रक का 5 ग्राम चूर्ण—
शहद
घी
दूध
के साथ वर्ष में केवल एक माह तक लेने से मनुष्य रोगमुक्त रह सकता है।
इसके अन्य उपयोग—
तेल के साथ – असाध्य रोगों में
गोमूत्र के साथ – कुष्ठ रोग में
मठे के साथ – बवासीर में लाभकारी
गाजर का रस पीते रहने से—
बुढ़ापे में भी युवाओं जैसी शक्ति
नेत्रों की रक्षा
रक्त की शुद्धि
त्वचा की चमक
शहद के सेवन से—
बुढ़ापे के कष्ट दूर होते हैं
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है
पाचन सुधरता है
दही जरा नाशक है।
इसके नियमित सेवन से—
पौरुष शक्ति बनी रहती है
पाचन अच्छा रहता है
शरीर में बल बना रहता है
स्नान से पहले प्रतिदिन तेल से मालिश करने से—
शरीर पुष्ट होता है
बुढ़ापा दूर रहता है
त्वचा कांतिमान होती है
रक्त संचार सुधरता है
यदि—
प्रातःकाल उठकर जल
भोजन के बाद मठा
शयन से पूर्व दूध
लिया जाए, तो वैद्य के पास जाने की आवश्यकता कम पड़ती है।
बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने के लिए गेहूं के जवारे का रस रामबाण औषधि माना गया है।
8 छोटे गमले या टोकरियां लें
उनमें मिट्टी भरें
प्रतिदिन एक-एक गमले में अच्छे गेहूं के दाने बोएं
छाया में रखें और पानी देते रहें
आठवें दिन तक पहले गमले में पौधे उग आएंगे
जब पौधों की ऊंचाई 6 इंच हो जाए—
जड़ काट दें
डंठल और पत्तियों को धो लें
मिक्सर में डालकर रस निकाल लें
सुबह खाली पेट आधा से एक कप ताजा रस पिएं।
यह रस—
ग्रीन ब्लड कहलाता है
मानव रक्त से लगभग 40% मेल खाता है
शरीर को बलवान, पुष्ट और कांतिमान बनाता है
सफेद बाल काले करने में सहायक
त्वचा की झुर्रियां कम करता है
चेहरा स्निग्ध और लावण्यमय बनाता है
गंभीर रोगों में भी उपयोगी माना जाता है
प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करें
तांबे के पात्र का जल पिएं
मौसमी फल अवश्य लें
भोजन के तुरंत बाद पानी न पिएं
देर रात तक मोबाइल न चलाएं
प्रसन्न रहें, हंसते रहें
प्रकृति के साथ तालमेल रखें
आयुर्वेद केवल रोगों का उपचार नहीं, बल्कि स्वस्थ और दीर्घायु जीवन जीने की कला है। यदि मनुष्य संयमित जीवन, उचित आहार, नियमित व्यायाम, मानसिक शांति और आयुर्वेदिक रसायनों का सेवन अपनाए, तो वह लंबे समय तक स्वस्थ, ऊर्जावान और युवा बना रह सकता है।
स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है—इसे संभालना ही सच्चा जीवन है।
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