सीने में जलन पैदा करने वाला रोग : अम्लपित्त (एसिडिटी) – कारण, लक्षण, बचाव एवं आयुर्वेदिक उपचार

Jun 21, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
सीने में जलन पैदा करने वाला रोग : अम्लपित्त (एसिडिटी) – कारण, लक्षण, बचाव एवं आयुर्वेदिक उपचार

परिचय

अम्लपित्त, जिसे सामान्य भाषा में एसिडिटी (Acidity) कहा जाता है, पाचन तंत्र का एक सामान्य किन्तु कष्टदायक विकार है। जब आमाशय (पेट) में अम्ल (Acid) की मात्रा आवश्यकता से अधिक बढ़ जाती है, तब खट्टी डकारें, छाती में जलन, गले में जलन, मुँह में खट्टापन तथा पेट में भारीपन जैसे लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं। आयुर्वेद में इस स्थिति को अम्लपित्त कहा गया है।

आज की अनियमित जीवनशैली, गलत खान-पान, तनाव एवं शारीरिक श्रम की कमी के कारण यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। यदि समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए तो यह गैस्ट्राइटिस, अल्सर एवं अन्य पाचन संबंधी समस्याओं का कारण भी बन सकती है।


अम्लपित्त (एसिडिटी) के प्रमुख कारण

अम्लपित्त रोग के उत्पन्न होने के पीछे अनेक कारण उत्तरदायी होते हैं। इनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

1. अनुचित खान-पान

  • अत्यधिक मिर्च-मसालेदार भोजन का सेवन

  • तले हुए खाद्य पदार्थों का अधिक उपयोग

  • मैदा से बने पदार्थों का बार-बार सेवन

  • अत्यधिक नमकीन एवं खट्टे पदार्थों का सेवन

  • फास्ट फूड एवं जंक फूड का अधिक सेवन

  • भोजन में रेशेदार पदार्थों (फाइबर) की कमी

  • फल एवं सब्जियों के छिलकों को हटाकर सेवन करना

2. चाय, कॉफी एवं नशीले पदार्थ

अत्यधिक मात्रा में—

  • चाय

  • कॉफी

  • मदिरा (शराब)

  • धूम्रपान

  • पान मसाला

  • तम्बाकू

का सेवन आमाशय की आंतरिक परत को प्रभावित करता है और अम्ल स्राव को बढ़ाकर अम्लपित्त उत्पन्न कर सकता है।

3. पाचन तंत्र के रोग

निम्न स्थितियां भी अम्लपित्त का कारण बन सकती हैं—

  • आमाशय में सूजन (गैस्ट्राइटिस)

  • आमाशय के व्रण (अल्सर)

  • पाचन शक्ति का कमजोर होना

  • कब्ज की समस्या

4. शारीरिक श्रम का अभाव

जो व्यक्ति शारीरिक श्रम नहीं करते तथा भारी भोजन करते हैं, उनके भोजन का समुचित पाचन नहीं हो पाता। अपचित भोजन आमाशय में अम्ल की वृद्धि कर अम्लपित्त को जन्म देता है।

5. मानसिक तनाव

तनाव, चिंता, क्रोध, भय एवं अवसाद जैसी मानसिक स्थितियां पाचन क्रिया को प्रभावित करती हैं। तनाव की अवस्था में भोजन करने से अम्लपित्त की संभावना बढ़ जाती है।

6. बिना चिकित्सकीय परामर्श दवाओं का सेवन

कुछ दर्दनिवारक एवं अन्य एलोपैथिक औषधियों का लंबे समय तक बिना सलाह सेवन करने से भी पेट में अम्लता बढ़ सकती है।

7. अनियमित दिनचर्या

  • भोजन का निश्चित समय न होना

  • देर रात तक जागना

  • सुबह देर से उठना

  • बार-बार कुछ न कुछ खाते रहना

  • पर्याप्त नींद न लेना

ये सभी आदतें अम्लपित्त को बढ़ाने में सहायक होती हैं।

8. पर्याप्त पानी न पीना

दिनभर कम पानी पीने से पाचन प्रक्रिया प्रभावित होती है और शरीर में विभिन्न विकार उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें अम्लपित्त भी शामिल है।


अम्लपित्त (एसिडिटी) के लक्षण

अम्लपित्त रोग में निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे सकते हैं—

  • मुँह में खट्टा पानी आना

  • खट्टी डकारें आना

  • छाती एवं गले में जलन होना

  • पेट में भारीपन महसूस होना

  • भोजन के बाद असुविधा होना

  • पेट फूलना (अफारा)

  • सिरदर्द होना

  • भूख कम लगना

  • जी मिचलाना

  • उल्टी की इच्छा होना

  • बिना अधिक श्रम के थकान महसूस होना

  • शरीर में बेचैनी रहना

अम्ल की मात्रा अधिक बढ़ जाने पर रोगी को उल्टी हो सकती है तथा उल्टी के बाद कुछ समय के लिए राहत महसूस होती है।


अम्लपित्त में क्या खाएं? (पथ्य)

अम्लपित्त के उपचार में उचित आहार अत्यंत महत्वपूर्ण है। कई बार केवल पथ्य पालन से ही रोग में काफी सुधार हो जाता है।

सेवन करने योग्य पदार्थ

  • पका हुआ पपीता

  • अंकुरित मूंग

  • हरी पत्तेदार सब्जियां

  • मोटे आटे की रोटी

  • सौंफ

  • छोटी इलायची

  • मिश्री

  • आंवला

  • पर्याप्त मात्रा में पानी

  • गाय का उबला हुआ दूध

  • नारियल पानी

  • खीरा एवं ककड़ी

भोजन संबंधी सुझाव

  • भोजन कम मात्रा में और कई बार करें।

  • भोजन अच्छी तरह चबा-चबाकर खाएं।

  • भोजन के तुरंत बाद न लेटें।

  • रात का भोजन हल्का रखें।

  • भोजन के बाद सौंफ एवं छोटी इलायची चबाएं।


अम्लपित्त में क्या नहीं खाना चाहिए? (अपथ्य)

  • अत्यधिक मिर्च-मसाले

  • तले हुए पदार्थ

  • फास्ट फूड

  • अत्यधिक नमकीन भोजन

  • अचार

  • सिरका युक्त खाद्य पदार्थ

  • अधिक चाय एवं कॉफी

  • मदिरापान

  • धूम्रपान

  • पान मसाला एवं तम्बाकू


जीवनशैली में आवश्यक सुधार

अम्लपित्त से बचने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए—

  • प्रतिदिन नियमित समय पर भोजन करें।

  • कम से कम 7–8 घंटे की नींद लें।

  • तनाव से बचें।

  • प्रतिदिन प्रातः भ्रमण करें।

  • हल्का व्यायाम एवं योग करें।

  • पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं।

  • देर रात जागने की आदत छोड़ें।


आयुर्वेदिक उपचार

महत्वपूर्ण: निम्न औषधियों का सेवन केवल योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से ही करें।

1. पुनर्नवादि मण्डूर योग

  • पुनर्नवादि मण्डूर – 125 मि.ग्रा.

  • शंख भस्म – 125 मि.ग्रा.

  • सूतशेखर रस – 125 मि.ग्रा.

  • कामदुधा रस – 125 मि.ग्रा.

  • गिलोय सत्व – 125 मि.ग्रा.

इन सभी को मिलाकर मधु के साथ प्रातः एवं सायंकाल सेवन किया जा सकता है।

2. द्राक्षासव

20 मि.ली. द्राक्षासव समान मात्रा जल मिलाकर भोजनोपरांत लिया जा सकता है।

3. अविपत्तिकर चूर्ण

1 से 3 ग्राम मात्रा रात्रि में सोते समय गाय या बकरी के दूध के साथ लिया जा सकता है।


अम्लपित्त के घरेलू उपाय

1. मुलहठी चूर्ण

मुलहठी का 1 ग्राम चूर्ण प्रातः एवं सायंकाल सेवन करना लाभकारी माना जाता है।

2. सौंफ-गुलाब मिश्रण

सौंफ, गुलाब की पंखुड़ियां, छोटी इलायची एवं मिश्री समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें।

सेवन विधि:
1 से 2 ग्राम चूर्ण दिन में दो बार पानी के साथ लें।

3. आंवला-मिश्री चूर्ण

आंवला एवं मिश्री समान मात्रा में लेकर महीन चूर्ण बना लें।

सेवन विधि:
1 से 2 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम सेवन करें।

4. कब्ज होने पर उपयोगी योग

सनाय की पत्ती, सौंफ, सोंठ, गुलाब पुष्प, आंवला एवं मिश्री समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार करें।

इसका सेवन किसी अनुभवी चिकित्सक के परामर्श से ही करें।


योग एवं प्राणायाम

अम्लपित्त में निम्न योगासन एवं प्राणायाम लाभदायक हो सकते हैं—

  • वज्रासन

  • पवनमुक्तासन

  • शशांकासन

  • भ्रामरी प्राणायाम

  • अनुलोम-विलोम

इनका अभ्यास विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में करना चाहिए।


कब चिकित्सक से संपर्क करें?

यदि निम्न स्थितियां उत्पन्न हों तो तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए—

  • लगातार कई सप्ताह तक एसिडिटी रहना

  • भोजन निगलने में कठिनाई

  • खून की उल्टी होना

  • अत्यधिक वजन कम होना

  • लगातार पेट दर्द रहना

  • बार-बार उल्टी होना


निष्कर्ष

अम्लपित्त (एसिडिटी) एक सामान्य किन्तु उपेक्षा करने योग्य रोग नहीं है। इसका मुख्य कारण अनियमित खान-पान, मानसिक तनाव, शारीरिक श्रम की कमी तथा गलत जीवनशैली है। उचित आहार-विहार, पर्याप्त पानी का सेवन, तनाव नियंत्रण एवं चिकित्सकीय परामर्शानुसार आयुर्वेदिक उपचार अपनाकर इस रोग से काफी हद तक बचा जा सकता है। यदि समस्या लंबे समय तक बनी रहे तो विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख केवल सामान्य शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य जागरूकता हेतु है। किसी भी औषधि, आयुर्वेदिक योग या घरेलू उपचार का प्रयोग करने से पूर्व योग्य आयुर्वेदाचार्य अथवा चिकित्सक की सलाह अवश्य लें। गंभीर या लगातार बनी रहने वाली समस्या में स्वयं उपचार न करें।

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