यह व्याधि बालक, युवा और वृद्ध किसी को भी हो सकती है। किन्तु आज की युवा पीढ़ी में इस रोग का व्याधि-विस्तार तीव्रता से बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण व्यसन और पर्यावरण प्रदूषण है। व्यसनों में मद्यपान, धूम्रपान आदि का सेवन और पर्यावरण प्रदूषण में आज वायुमंडल इतना दूषित है, खासकर शहरी वातावरण में, कि शुद्ध सांस लेना भी दूभर हो गया है।
आज हमारा आहार दूषित है, जल दूषित है और वायुमंडल दूषित है। एक युवा व्यक्ति एक मिनट में लगभग 18 बार सांस लेता है। हृदय लगभग 72 बार धड़कता है। सांस (वायु) श्वास मार्ग से श्वास नली में प्रवेश कर फेफड़ों में जाती है, फिर फेफड़े उसका शीतलांश ग्रहण कर उसी मार्ग में कुछ वायु को वापस भेज देते हैं और कुछ वायु अंदर ही शेष रह जाती है, जो जठराग्नि को प्रदीप्त करने में सहायक होती है। बाद में वह अवशिष्ट वायु आंत्र प्रक्रिया को सहयोग प्रदान कर अपान वायु के रूप में अधोमार्ग से बाहर निकल जाती है।
शरीर की समस्त क्रियाएं वायु के द्वारा ही होती हैं। नासाछिद्र से श्वास नली में सांस के आवागमन में जब कोई व्यवधान उत्पन्न हो जाता है, तब सांस लेने में व्यक्ति को बड़ी तकलीफ होती है। स्वर यंत्र (स्टैथस्कोप) से सुनने पर श्वास नली से फेफड़ों में साँय-साँय की आवाज आती है, तो उसे सामान्यतः श्वास रोग कहते हैं।
श्वास रोग पांच प्रकार का होता है—
धूल, धूम्र और विकृत वायु के लगने में, शीतल स्थान में रहने से, अत्यन्त शीतल जल पीने से, अति व्यायाम, मैथुन, मार्गश्रम, रुक्षान्न के सेवन से, विषम आशन से, आम दोष के बढ़ने में, अफारा, रूक्षता, अनशन, दुर्बलता और मर्म स्थान में किसी प्रकार के आघात पहुंचने से, वमन और विरेचन के अतियोग से, अतिसार, ज्वर, प्रतिश्याय, क्षय, क्षत, रक्तपित्त, उदावर्त, विसूचिका, अलसक, पाण्डुरोग और विष विकार — इनमें से किसी भी रोगकाल में उपद्रव रूप में श्वास रोग हो सकता है।
सेम, उड़द, पिण्याक, तिल और तेल के अत्यंत सेवन से तथा जल और आनूपसंचारी जीवों का मांस, दही और कच्चे दूध के अधिक सेवन से, अभिष्यंद (क्लेदकारक) आहार-विहार करने से, कफकारी द्रव्यों के अधिक सेवन से तथा कण्ठ और छाती में किसी प्रकार का आघात पहुंचने से और किसी भी प्रकार से विबन्ध होने से, वायु प्राणवाही स्रोतों में प्राप्त होकर कुपित हो जाती है। तब यही वायु छाती में से कफ को उखाड़कर मनुष्यों के प्राणों को घोर कष्ट देने के लिये श्वास रोग को उत्पन्न करती है।
ये श्वास रोग के पूर्वरूप हैं।
रूक्ष अन्न-पान के सेवन करने से और अधिक परिश्रम करने से, अल्प कारणों से क्षुद्र वायु उदीर्ण होकर क्षुद्र श्वास को उत्पन्न करती है। यह क्षुद्र श्वास न तो अत्यन्त दुःख देता है और न ही अत्यंत पीड़ा करता है।
अन्य श्वासों के समान यह श्वास मनुष्यों के प्राणों को हरने वाला नहीं होता और न ही शरीर को अत्यधिक कष्ट देता है। अन्न-पान की उचित गति को नहीं रोकता। इन्द्रियों में भी किसी प्रकार की व्यथा उत्पन्न नहीं करता और किसी प्रकार के अन्य उपद्रवों को भी प्रकट नहीं करता।
ऋषियों ने तमक श्वास के लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा है कि जब वायु प्रतिलोम होकर प्राणवाही स्रोतों में प्रवेश कर लेती है, तब ग्रीवा और शिर को ग्रहण करके श्वास नलिका व फेफड़े के क्षेत्र को प्रभावित करती हुई कफ दोष को उखाड़कर जुकाम को उत्पन्न कर देती है।
कफ से अवरुद्ध होकर गले में घुर-घुर शब्द जैसी आवाज होने लगती है तथा अत्यन्त तीव्र वेग से रोगी अत्यन्त व्याकुल हो जाता है। खांसी वेगपूर्वक आती है और रुक जाती है। रोगी खांसते-खांसते बार-बार मोह को प्राप्त हो जाता है। जब तक खांसी के साथ बलगम न निकल जाए, तब तक रोगी को अत्यन्त दुःख होता है। कफ निकल जाने पर थोड़ी देर के लिए शांति प्रतीत होती है।
जब यह कफ रोगी के कण्ठ में पहुंचता है, तब रोगी बड़े कष्ट से बोल पाता है। श्वास की पीड़ा से व्याकुल रोगी लेटने पर भी निद्रा को प्राप्त नहीं होता। वह जिस करवट लेटता है, उसी ओर से वायु उठकर श्वास को उत्पन्न करती है, इसलिए रोगी किसी प्रकार शांति से लेट नहीं सकता। बैठने से कुछ आराम प्रतीत होता है।
गर्म पदार्थ खाने की इच्छा होती है। दोनों नेत्र बाहर निकले से प्रतीत होते हैं। मस्तक में पसीना आता है। श्वास की पीड़ा से निरंतर दुःख होता है। मुख सूख जाता है। बार-बार सांस का वेग उठता है। शरीर में हलचल होने से श्वास का वेग उखड़ जाता है।
बादल, शीतल जल, सर्दी और पूर्वा हवा से कफ की वृद्धि होकर श्वास का वेग बढ़ जाता है। इन लक्षणों से युक्त श्वास को “तमक श्वास” कहते हैं। यह याप्य-साध्य होता है और नवीन अवस्था में शीघ्र चिकित्सा करने से साध्य होता है।
जिस रोगी का श्वास ऊर्ध्वगत हो जाए अर्थात रोगी ऊपर की ओर मुंह करके बड़े जोर से लंबा श्वास निकाले और श्वास को भीतर की ओर न खींच सके, मुख से दुर्गंधयुक्त कुपित पवन निकले, पीड़ा से व्याकुल होकर बेहोश हो जाए, मुख सूख जाए और रोगी अत्यंत कष्ट को प्राप्त हो — इस प्रकार ऊर्ध्व श्वास चलते हुए अधःश्वास रुक जाए, जिससे रोगी मोह को प्राप्त हो, उसे ऊर्ध्व श्वास कहते हैं।
यह ऊर्ध्व श्वास रोगी के प्राणों को शीघ्र नष्ट कर देता है।
जो रोगी ऊर्ध्वगामी वायु को उद्धपूयमान होने में कठिनता पूर्वक श्वास लेता हुआ मतवाले बैल के समान ऊँचे शब्द के साथ निरन्तर कष्ट से श्वास छोड़ता हुआ संज्ञाहीन, ज्ञानहीन, विभ्रान्त तथा विकृत नेत्र और विकृत मुख वाला हो जाए तथा उसका मल और मूत्र रुक जाए, जिह्वा से कठिनता पूर्वक बिखरे हुए शब्द उच्चारण करे और अत्यंत दीन हो — उसको वैद्यजन महाश्वास ग्रस्त जानकर दूर से ही त्याग देते हैं, क्योंकि यह महाश्वास रोगी को शीघ्र ही मार डालता है।
उपरोक्त पांच श्वासों में से क्षुद्र श्वास साध्य है और अन्य प्रकार के श्वास भी यदि बलवान मनुष्य के शरीर में प्रकट लक्षण वाले न हों, तो साध्य होते हैं।
इनमें जो प्राणों को हरने वाले कहे गये हैं, उनका त्याग देना चाहिए या जो चिकित्सा करने से ठीक होने की संभावना हो, उनकी चिकित्सा के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
आजकल जो ज्यादातर समाज में रोग फैल रहा है, वह तमक श्वास ही है, जिसके दो भेद हैं—
तमक श्वास युक्त रोगी को ज्वर और मूर्छा आती हो, तो उसको “प्रतमक श्वास” कहते हैं।
यदि अंधकार में श्वास बढ़े और शीतल क्रिया से शांत हो जाए, रोगी श्वास के समय अपने को अंधकार में हुआ प्रतीत करे, उसको “संतमक श्वास” कहते हैं।
यह कफ प्रधान रोग है। कफ जब श्वास नलिका को अवरोध कर लेता है, तब घर-घर की आवाज गले से आती है। इसलिए रोगी को आराम प्रदान करने के लिए सर्वप्रथम ऐसी औषधि देना चाहिए जिससे गले का कफ ढीला हो जाए और वह आराम से श्वास ले सके।
फिर रोगी के बल के अनुसार उसकी कोष्ठ शुद्धि करनी चाहिए। यदि रोगी का कोष्ठ वमन और विरेचन द्वारा शुद्ध करके फिर उसकी चिकित्सा की जाती है, तो वह पूर्ण स्वस्थ हो जाता है।
यदि रोगी अधिक कमजोर हो, तो उसे तीव्र विरेचन न देकर मधुर विरेचन देकर विवंध को धीरे-धीरे निवारण करना चाहिए और फिर वक्ष स्थल पर सेंधा नमक और तेल का या सेंधवादी तेल गर्म करके हल्का मालिश करना चाहिए, जिससे कफ ढीला होकर आंतों की ओर द्रवीभूत हो जाता है।
सेंधा नमक, पिप्पली का चूर्ण ऊष्ण जल से पीने को देना चाहिए। इससे तीव्र वमन होकर संचित कफ बाहर निकल जाता है। इससे रोगी को बहुत आराम मिलता है। इस प्रकार प्राणवह स्रोतों के शुद्ध हो जाने पर अवरोध रहित वायु का भलीभांति गमनागमन होने लगता है।
उपरोक्त औषधि की एक मात्रा बनाकर सुबह, दोपहर और शाम शहद या च्यवनप्राश में मिलाकर चटावें।
वासारिष्ट 5 मि.ली. सुबह-शाम समान भाग पानी मिलाकर पिलायें। बच्चे की उम्र के अनुसार मात्रा कम या ज्यादा कर सकते हैं।
उपरोक्त औषधियों को अच्छी तरह खरल करके 3 मात्रा बना लें। प्रातः और सायं मधु या ऊष्ण जल से दें। जिस वस्तु से असहिष्णुता होती हो उसे सोच-समझकर त्याग दें। रोगी की सामर्थ्य के अनुसार मात्रा कम या अधिक कर सकते हैं।
उक्त औषधि की एक पुड़िया बना लें। जब भी गले में कफाधिक्यता प्रतीत हो, ऊष्ण जल से एक-दो दिन लगातार दें। इससे कफ ढीला होकर निकल जायेगा।
सैन्धवादि तैल पहले वर्णित विधि से छाती पर लगायें। इससे रोगी को बहुत आराम और शान्ति मिलेगी तथा अच्छी नींद आयेगी।
उपरोक्त औषधियों की एक मात्रा बना लें। श्वास रोगी को जब घबराहट हो, तब शहद या गर्म जल से दवा खिला दें।
उपरोक्त औषधियों को अच्छी तरह घोंटकर एक मात्रा बना लें। सुबह-शाम शहद या गुनगुने जल से दें।
5 ग्राम सुबह-शाम शहद या गुनगुने पानी से लें।
इन सबको मिलाकर सुबह-शाम भोजन के आधा घंटे बाद लें।
उपरोक्त औषधियों को अच्छी तरह घोटकर एक मात्रा बना लें। ऐसी प्रति मात्रा सुबह, दोपहर और शाम शहद या गुनगुने जल से दें।
गले में कफाधिक्यता होने पर—
शहद मिलाकर 5 ग्राम सुबह-शाम सेवन करें।
कफ की मात्रा शमन होते ही वासाविलेह के बदले—
5 ग्राम की मात्रा में लें।
दोनों में से किसी एक को 10 मि.ली. समान भाग जल मिलाकर प्रातः-सायं पिलायें।
महालाक्षादि तेल या सेंधवादी तेल को गर्म करके गले व छाती पर मलने को दें।
ध्यान रहे कि रोगी को कब्ज न होने पाए। कब्ज की स्थिति में—
उपरोक्त औषधियों को अच्छी तरह मिलाकर 100 पुड़िया बना लें।
एक पुड़िया सुबह और शाम गुनगुने जल से दें। यदि लाभ प्रतीत हो तो आठ दिन बाद इसी मात्रा की तीन पुड़िया रोज दे सकते हैं। यदि आवश्यक समझें तो इस योग की दुगनी मात्रा सुबह-शाम दे सकते हैं।
उपरोक्त संखिया का योग लगातार लगभग 1 या 2 मास तक देने से आशातीत लाभ होता है।
प्रातःकाल शौचादि से निवृत्त होकर थोड़ी देर भ्रमण करें, जिससे शुद्ध वायु फेफड़ों को प्राप्त होकर उन्हें बल मिल सके।
यदि शीत ऋतु हो तो धूप निकलने पर जागें। अधिक गर्मी से बचें। अधिक श्रम न करें। वाहन तेज न चलायें। क्षमता से अधिक भार न उठायें। अधिक वार्तालाप न करें।
मध्याह्न में गेहूं की बिना चुपड़ी रोटी, दाल तथा हरे पत्तेदार सब्जियों का सेवन करें। रात्रि में सदैव भूख से कुछ कम ही खायें।
यदि दूध लेना आवश्यक हो तो—
पीपल को 250 ग्राम दूध और 250 ग्राम पानी में मिलाकर खूब पकायें। जब दूध आधा रह जाए तब मिश्री मिलाकर शीतल करके पियें। इससे कफ वृद्धि नहीं होगी।
चिन्ता से बचें। रोगी को ध्यान रहे कि कब्ज न हो जाये, इसलिए दवा के साथ कोई रेचक औषधि अवश्य देते रहें।
लेखक : AyurvediyaUpchar Team
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