घरेलू तौर पर निरापद रूप से प्रयोग किये जाने योग्य, परीक्षित और गुणकारी घरेलू नुस्खों की जानकारी दी जा रही है जिन्हें आप उचित विधि-विधान के अनुसार, सावधानी के साथ, नुस्खा तैयार कर पथ्य-अपथ्य का पालन करते हुए उपयोग कर लाभ उठा सकते हैं।
गुल्म को अंग्रेजी में ट्यूमर (Tumour) कहते हैं, जो सामान्य और घातक दो प्रकार का होता है। मिथ्या और दूषित आहार-विहार करने से वात, पित्त आदि दोषों के प्रकोप से गुल्म होता है। शरीर के मध्य भाग में गोली के आकार का गुल्म कहीं भी हो सकता है और आकार में घटता-बढ़ता रहता है।
आयुर्वेद के अनुसार इसका मुख्य आधार और कारण वात प्रकोप माना गया है। डकार आना, भूख न लगना, पेट में हल्की-हल्की मरोड़ के साथ दर्द होना, कब्ज़ बना रहना, पेशाब में रुकावट होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
गुल्म दूर करने वाले कुछ घरेलू उपाय प्रस्तुत किए जा रहे हैं—
हींग को तवे पर गर्म करके सेंक लें। आधा चम्मच पिसी अजवायन के साथ यह हींग, चावल बराबर मात्रा में मिला लें। इसे गर्म पानी के साथ निगल जाएँ। यह प्रयोग गुल्म नाशक है।
चावल बराबर भुनी हींग, सज्जीखार आधा ग्राम, यवक्षार आधा ग्राम—तीनों मिला कर गर्म पानी से लेने पर तुरंत लाभ होता है।
बंग भस्म, अभ्रक भस्म, लोह भस्म और नाग भस्म सब 5-5 ग्राम तथा ताम्र भस्म 20 ग्राम लें। सबको नींबू के रस में तीन दिन तक घुटाई करके 1-1 रत्ती (एक ग्राम में 8 रत्ती होती है) की गोलियाँ बना लें।
सुबह-शाम 1-1 गोली शहद या अदरक के रस के साथ, अनार के रस या आँवले के मुरब्बे के साथ सेवन करें।
यह योग सब प्रकार के गुल्मों को ठीक करने के अलावा आम विकार, अम्लपित्त, हृदयशूल, पार्श्वशूल आदि को भी दूर करता है।
सुपाच्य, हल्का और ताज़ा आहार लेना चाहिए तथा वात प्रकोप वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
खाया हुआ आहार पेट में पहुँचकर जब तक पच नहीं जाता, तब तक उसे आम कहा जाता है। बोलचाल की भाषा में इसे आँव भी कहते हैं।
जब वात कुपित होकर आम से मिल जाता है तब इसे आमवात कहते हैं। यह गठिया अर्थात संधिवात की प्रारंभिक स्थिति होती है। यदि आमवात होते ही उचित चिकित्सा और पथ्य-अपथ्य का पालन कर लिया जाए तो शरीर स्वस्थ हो जाता है, अन्यथा रोगी संधिवात और अन्य व्याधियों के जाल में फँस जाता है।
इसकी घरेलू चिकित्सा निम्न प्रकार है।
वरुण (बरना) की छाल, गोखरू, नागरमोथा और सोंठ—सब 50-50 ग्राम लेकर कूट-पीस कर बारीक चूर्ण बना लें।
इस चूर्ण को सुबह-शाम 1-1 चम्मच मात्रा में पानी के साथ लेना चाहिए।
अजमोद, वायविडंग, सेंधा नमक, देवदारु, चित्रक मूल, पीपला मूल, सौंफ, पीपल और काली मिर्च—सब 10-10 ग्राम लें।
हरड़ 50 ग्राम तथा विधारा और सोंठ 100-100 ग्राम लें।
सभी को कूट-पीस कर महीन कपड़छन चूर्ण बना लें और तीन बार छानकर शीशी में भर लें।
सुबह-शाम 1-1 चम्मच चूर्ण कुनकुने गर्म पानी से लेना चाहिए।
आमवात दूर करने वाला यह उत्तम गुणकारी नुस्खा है। इसके सेवन से आमवात की वेदना, शोथ, संधियों (जोड़ों) की पीड़ा, कमर दर्द, गृध्रसी, उदर वायु का प्रकोप (गैस ट्रैवल) आदि व्याधियाँ दूर होती हैं।
यह नुस्खा अजमोदादि चूर्ण के नाम से बाज़ार में बना-बनाया भी मिलता है।
सोंठ, एरण्ड की जिह्वा रहित गिरी, सनाय और असगंध—सब 50-50 ग्राम लेकर खूब कूट-पीस कर महीन चूर्ण कर लें।
मुनक्का 100 ग्राम लेकर उसके बीज निकाल दें और इसके साथ सब चूर्णों को मिला कर खरल में घोंट कर एकजान कर लें।
इसकी 1-1 ग्राम की गोलियाँ बना लें।
सुबह-शाम 2-2 गोली कुनकुने गर्म पानी के साथ लेना चाहिए।
यह नुस्खा भयंकर आमवात और आम ज्वर को दूर करने के लिए अत्यंत गुणकारी है। यह नुस्खा प्रवाहिका (डीसेन्ट्री) और आमातिसार में भी लाभ करता है।
यह नुस्खा आमवातारि वटी के नाम से बाज़ार में बना-बनाया मिलता है।
आमवात के रोगी को सादा, सुपाच्य और ताज़ा भोजन करना चाहिए। चिकनाईयुक्त एवं भारी पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
बेसन के बने, तले हुए तथा मिर्च-मसालेदार पदार्थों का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
यह रोग आम तौर पर बच्चों को होता है। यह एक प्रकार की हठीली खांसी होती है जिसमें बच्चा लगातार खांसता चला जाता है। खांसने में खों-खों या घुर-घुर की आवाज होती है। बच्चा खांसते-खांसते उल्टी भी कर देता है। आवाज के साथ खांसी चलने की वजह से इसे हिन्दी में कुकर (कुत्ता) खांसी और अंग्रेज़ी में हूपिंग कफ (Whooping Cough) कहते हैं।
इस कठिन-साध्य रोग की घरेलू चिकित्सा यहां पर प्रस्तुत की जा रही है।
काले तिल और मिश्री या शक्कर 20-20 ग्राम एक गिलास पानी में डालकर उबालें। आधा घंटा उबालकर छान लें और पानी शीशी में भर लें।
इस पानी को 1-1 चम्मच मात्रा में 3-3 घंटे के अंतराल से पिलाएं।
अडूसा के पत्तों का रस एक चम्मच लेकर थोड़े से गर्म पानी में डालकर दिन में तीन बार पिलाएं।
यह नुस्खा कुकर खांसी के लिए बहुत ही असरकारी माना गया है।
काली तम्बाकू के पत्तों के सूखे डंठल 20 ग्राम लेकर साफ कर लें। यदि शाखा का कोई हिस्सा हो तो अलग कर दें, केवल डंठल भाग ही लें।
डंठलों के 1-1 इंच के बराबर टुकड़े कर लें और मिट्टी के बर्तन में रखकर जला दें। जब धुआं समाप्त हो जाए तब ऊपर से ढक्कन लगा दें ताकि डंठल जलकर कोयला हो जाएं।
इन जले टुकड़ों को राख न होने दें। इनको 20 ग्राम सेंधा नमक के साथ कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें और शीशी में भरकर मजबूत एयरटाइट ढक्कन लगा दें ताकि नम हवा न लगे।
वर्षा ऋतु में यह नुस्खा बनाना कठिन होता है और पूरी प्रक्रिया एक ही समय में करनी पड़ती है जब मौसम खुला हो और हवा में नमी न हो, अन्यथा नम हवा लगने पर चूर्ण गुणहीन हो जाता है।
एक पका पान और छिलके सहित 2 इलायची पानी डालकर पीस लें और छानकर पानी को थोड़ा गर्म कर लें। इस पानी में आधा चम्मच चूर्ण डालकर घोल लें।
इस पानी को 1-1 चम्मच दिन में तीन बार पिलाएं।
यह चूर्ण कुकर खांसी की उत्तम दवा तो है ही, इसे 3 ग्राम अर्थात आधा चम्मच मात्रा में थोड़े से शहद में मिलाकर दिन में तीन बार चटाने से साधारण खांसी, श्वास कष्ट तथा हरे-पीले दस्त होना आदि व्याधियां भी ठीक होती हैं।
वर्षा में भीग जाने पर सर्दी लग जाने से छींक आना, सिर में भारीपन, शरीर में जकड़न एवं पीड़ा होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं। ये प्रतिश्याय होने के पूर्व लक्षण होते हैं।
वर्षा काल में भीगने से बचने की सलाह इसीलिए दी जाती है क्योंकि बारिश में भीगने से अक्सर सर्दी-जुकाम हो जाता है। आयुर्वेद में इसे प्रतिश्याय कहा जाता है।
इसकी घरेलू चिकित्सा प्रस्तुत है।
तुलसी के 8-10 पत्ते तथा दो काली मिर्च पीसकर चाय में डालकर पीने से जुकाम ठीक होता है।
रात को सोते समय कुनकुने गर्म दूध में आधा चम्मच पिसी हल्दी घोलकर पीने से गले की खराश और पीड़ा दूर होती है तथा सर्दी-जुकाम में लाभ मिलता है।
द्राक्षा, काली मिर्च, अडूसा, दालचीनी और मुलहठी सब 10-10 ग्राम लेकर मोटा-मोटा (जौकुट) कर लें।
एक गिलास पानी में 1-2 चम्मच यह मिश्रण डालकर उबालें। जब यह चौथाई भाग रह जाए तब एक चम्मच शक्कर डालकर उतार लें और कुनकुना गर्म रहने पर छानकर पी लें।
इस प्रकार एक बार सुबह खाली पेट तथा दूसरी बार रात को सोते समय सेवन करें। दो-तीन दिन में जुकाम ठीक हो जाता है।
लक्ष्मी विलास रस अभ्रक युक्त की 2-2 गोली सुबह-शाम दूध के साथ लें तथा अणु तैल की 2-2 बूंद नाक में डालने से जुकाम ठीक हो जाता है।
जैसे पुरुषों के स्वास्थ्य का शत्रु प्रमेह रोग है, वैसे ही स्त्रियों के स्वास्थ्य का शत्रु प्रदर रोग माना गया है।
जो रोग स्वास्थ्य का शत्रु होता है, वह सौन्दर्य का भी शत्रु होता है क्योंकि स्वास्थ्य नष्ट होने पर सौन्दर्य भी नष्ट हो जाता है।
इसलिए प्रदर रोग न केवल स्त्रियों के स्वास्थ्य का बल्कि उनके सौन्दर्य का भी शत्रु माना गया है।
यहां प्रदर की घरेलू चिकित्सा प्रस्तुत है।
प्रदर रोग से ग्रस्त महिला को प्रतिदिन अपनी योनि की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
पांच वृक्षों की छाल मंगवाकर रख लें। ये पांच वृक्ष हैं—
स्नान के समय से एक घंटा पहले इन छालों का एक-एक टुकड़ा लेकर जौकुट कर लें और चार गिलास पानी में डालकर उबलने रखें।
जब पानी एक गिलास रह जाए तब पिसी हुई फिटकरी 5 ग्राम डालकर छान लें।
स्नान करते समय इस पानी से योनि को अंदर तक अच्छी तरह धोएं।
यदि ऐसा न कर सकें तो एक साफ सफेद और मुलायम कपड़ा इस पानी में भिगोकर योनि के अंदर 15-20 मिनट तक रखा करें।
यदि वृक्षों की छाल का प्रबंध न हो सके तो त्रिफला चूर्ण का काढ़ा बनाकर उसमें फिटकरी डालकर ठंडा कर लें तथा मोटे कपड़े से छानकर इसका उपयोग करें।
पठानी लोध का चूर्ण आधा चम्मच मात्रा में रात को सोते समय दूध के साथ दो-तीन माह तक सेवन करने से लाभ होता है।
इसके साथ ऊपर वर्णित स्वच्छता संबंधी प्रयोग भी करना चाहिए।
प्रदर रोग दूर करने के लिए एक अत्यंत गुणकारी आयुर्वेदिक योग प्रस्तुत है।
सोना गेरू को शुद्ध घी में सेककर अनार के रस और आंवले के रस की 7-7 भावना दें।
इसके बाद आधा-आधा ग्राम की गोलियां बनाकर सुखा लें।
सुबह-शाम 2-2 गोली दूध के साथ लें।
यह योग सभी प्रकार के प्रदर रोगों में लाभकारी माना गया है।
जीर्ण प्रदर रोग, जो लंबे समय तक उपचार के बाद भी ठीक न हुआ हो, वह भी इस योग के सेवन से लाभान्वित हो सकता है।
यह नुस्खा "प्रदरान्तक लोह नं. 2" के नाम से बाज़ार में भी उपलब्ध मिलता है।
यह लेख पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथों एवं घरेलू नुस्खों पर आधारित जानकारी प्रदान करता है। किसी भी रोग की गंभीर अवस्था, गर्भावस्था, बच्चों, बुजुर्गों या पुरानी बीमारी की स्थिति में किसी भी औषधि, भस्म या नुस्खे का प्रयोग करने से पहले योग्य आयुर्वेदाचार्य अथवा चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। यह सामग्री केवल शैक्षणिक एवं सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।
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