आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में आंखों की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लगातार मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी स्क्रीन देखने, अनियमित दिनचर्या, मधुमेह तथा बढ़ती उम्र के कारण आंखों के कई गंभीर रोग सामने आ रहे हैं। इन्हीं में से एक है — ग्लूकोमा (Glaucoma)।
यह आंखों का ऐसा खतरनाक रोग है जो धीरे-धीरे आंखों की रोशनी को खत्म कर देता है और समय पर इलाज न मिलने पर व्यक्ति पूरी तरह अंधा भी हो सकता है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ग्लूकोमा शुरुआती अवस्था में अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ता रहता है। इसलिए इसे “Silent Thief of Sight” यानी “चुपचाप नजर चुराने वाला रोग” भी कहा जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठनों के अनुसार मोतियाबिंद के बाद ग्लूकोमा अंधत्व का दूसरा सबसे बड़ा कारण माना जाता है। भारत में भी लाखों लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण अधिकांश लोगों को इसका पता बहुत देर से चलता है।
ग्लूकोमा आंखों का एक गंभीर रोग है जिसमें आंख के अंदर का दबाव (Intra Ocular Pressure) सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। आंख के अंदर एक विशेष प्रकार का जलीय द्रव (Aqueous Humor) लगातार बनता और निकलता रहता है। जब किसी कारण से इस द्रव का संतुलन बिगड़ जाता है, तब आंखों का दबाव बढ़ने लगता है।
यह बढ़ा हुआ दबाव आंख की सबसे महत्वपूर्ण नस — ऑप्टिक नर्व (Optic Nerve) — को नुकसान पहुंचाने लगता है। यही नस आंखों से मस्तिष्क तक देखने के संकेत पहुंचाती है। जब यह नस खराब होने लगती है, तब व्यक्ति की दृष्टि धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।
यदि समय रहते इसका उपचार न किया जाए तो स्थायी अंधापन तक हो सकता है।
सामान्यतः आंखों का दबाव 14 से 22 मि.मी. पारा (mmHg) तक माना जाता है। इससे अधिक दबाव लंबे समय तक बना रहे तो ग्लूकोमा का खतरा बढ़ जाता है।
कई स्थानों पर इसे “धोबा” या “कालापानी” भी कहा जाता है।
ग्लूकोमा कई प्रकार का हो सकता है, लेकिन मुख्य रूप से इसे निम्न प्रकारों में बांटा जाता है —
यह सबसे सामान्य प्रकार है। इसमें आंखों का दबाव धीरे-धीरे बढ़ता है और रोगी को लंबे समय तक कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। धीरे-धीरे देखने की क्षमता कम होने लगती है।
यह अचानक होने वाला गंभीर ग्लूकोमा है। इसमें आंखों में तेज दर्द, सिर दर्द, उल्टी, धुंधला दिखाई देना और आंखों की लालिमा जैसे लक्षण तेजी से दिखाई देते हैं। यह एक मेडिकल इमरजेंसी होती है।
कुछ बच्चों में जन्म से ही आंखों की संरचना ठीक विकसित नहीं होती, जिसके कारण ग्लूकोमा हो सकता है। ऐसे बच्चों की आंखों से लगातार पानी बहता रहता है और आंखें असामान्य रूप से बड़ी दिखाई दे सकती हैं।
यह किसी अन्य बीमारी, चोट, संक्रमण, मोतियाबिंद या दवाओं के दुष्प्रभाव के कारण होता है।
ग्लूकोमा के कई कारण हो सकते हैं। कुछ मामलों में यह वंशानुगत भी होता है।
कुछ लोगों में आंखों का अग्रिम कक्ष (Anterior Chamber) बहुत संकरा होता है। ऐसे लोगों में अचानक ग्लूकोमा होने की संभावना अधिक रहती है।
शुरुआत में ग्लूकोमा के लक्षण बहुत हल्के हो सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे रोग गंभीर होता जाता है।
ऐसी स्थिति में तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
निम्न लोगों में ग्लूकोमा होने का खतरा अधिक पाया जाता है —
ग्लूकोमा का सही पता केवल आंखों की विशेष जांच द्वारा लगाया जा सकता है।
इस जांच में आंखों का दबाव मापा जाता है। यदि दबाव सामान्य सीमा से अधिक हो तो ग्लूकोमा की संभावना मानी जाती है।
इस जांच में आंख के अंदर रेटिना और ऑप्टिक नर्व की स्थिति देखी जाती है।
इससे यह पता लगाया जाता है कि देखने का क्षेत्र कितना प्रभावित हुआ है।
कॉर्निया की मोटाई और आंखों की संरचना की जांच की जाती है।
आधुनिक मशीन द्वारा ऑप्टिक नर्व की क्षति का पता लगाया जाता है।
ग्लूकोमा का इलाज जितना जल्दी शुरू हो जाए, आंखों की रोशनी बचाने की संभावना उतनी अधिक रहती है।
इनका उद्देश्य आंखों का दबाव कम करना होता है।
लेजर तकनीक द्वारा आंखों में जमे द्रव के निकास को बेहतर बनाया जाता है।
जब दवाओं से लाभ न मिले तब ऑपरेशन किया जाता है।
आजकल माइक्रो सर्जरी और लेजर तकनीक से इलाज काफी सुरक्षित और प्रभावी हो गया है।
ग्लूकोमा में जो दृष्टि क्षति हो चुकी होती है, उसे वापस लाना संभव नहीं होता। इसलिए समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है। उपचार का उद्देश्य आगे होने वाले नुकसान को रोकना होता है।
हालांकि ग्लूकोमा का इलाज डॉक्टर की निगरानी में ही होना चाहिए, लेकिन कुछ अच्छी आदतें आंखों को स्वस्थ रखने में मदद कर सकती हैं —
ग्लूकोमा आंखों की रोशनी को धीरे-धीरे खत्म करने वाला गंभीर रोग है। इसकी सबसे बड़ी समस्या यही है कि शुरुआती अवस्था में यह अक्सर बिना लक्षण के बढ़ता रहता है। इसलिए 40 वर्ष की उम्र के बाद नियमित आंख जांच बेहद जरूरी मानी जाती है।
यदि आंखों में दर्द, धुंधलापन, सिर दर्द, रोशनी के चारों ओर रंगीन घेरे दिखना या नजर कमजोर होने जैसे लक्षण महसूस हों तो लापरवाही न करें और तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से जांच कराएं। समय पर इलाज ही आंखों की रोशनी बचाने का सबसे बड़ा उपाय है।
Author — AyurvediyaUpchar.com Team
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