विभिन्न रोगों की गुणकारी वनौषधि : “गुग्गुल”

May 13, 2026
बनोषधि
विभिन्न रोगों की गुणकारी वनौषधि : “गुग्गुल”

शीत ऋतु और वर्षा ऋतु में संधियों में दर्द, सूजन और अकड़न की समस्या तेजी से बढ़ जाती है। विशेषकर प्रौढ़ स्त्री-पुरुष संधिशोथ (Joint Inflammation) और वात विकारों से अत्यधिक पीड़ित रहते हैं। कई बार दर्द इतना अधिक होता है कि चलना-फिरना और रात में आराम से सोना भी कठिन हो जाता है। ऐसे समय में आयुर्वेद में वर्णित “गुग्गुल” एक अत्यंत प्रभावशाली और गुणकारी वनौषधि मानी जाती है।

आयुर्वेद चिकित्सा में गुग्गुल का उपयोग विशेष रूप से वात रोग, सूजन, कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण, मोटापा, जोड़ों के दर्द और शरीर की शुद्धि के लिए किया जाता है। महर्षि सुश्रुत ने भी गुग्गुल को अत्यंत उपयोगी औषधियों में स्थान दिया है।


गुग्गुल क्या है?

गुग्गुल एक प्राकृतिक गोंद (Resin) है जो वृक्ष से प्राप्त होता है। वनस्पति विज्ञान के अनुसार यह Burseraceae कुल की औषधि है और इसका वैज्ञानिक नाम Commiphora Wightii है।

गुग्गुल का वृक्ष लगभग 4 से 12 फुट ऊंचा होता है। इसकी शाखाएं कांटेदार होती हैं तथा पत्ते छोटे, चिकने और चमकीले दिखाई देते हैं। इसके फूल लाल रंग के और छोटे आकार के होते हैं। वृक्ष पर बेर जैसे लाल फल लगते हैं।

वृक्ष के तने पर चीरा लगाने से जो गोंद जैसा पदार्थ निकलता है, वही शुद्ध गुग्गुल कहलाता है।


गुग्गुल कैसे प्राप्त किया जाता है?

शीत ऋतु में वृक्ष के तने पर हल्का चीरा लगाया जाता है। कुछ समय बाद उसमें से दूध जैसी बूंदें निकलती हैं और 4-5 सप्ताह में जमकर गोंद का रूप ले लेती हैं। इसी जमे हुए पदार्थ को एकत्र कर लिया जाता है।

वृक्ष पर जमा हुआ गुग्गुल शुद्ध माना जाता है, जबकि जमीन पर गिरा हुआ गुग्गुल रेत और कंकड़ से अशुद्ध हो सकता है।

आयुर्वेद में गिलोय के रस के साथ गुग्गुल को शुद्ध करने की प्रक्रिया भी बताई गई है।


गुग्गुल के आयुर्वेदिक गुण

आयुर्वेद के अनुसार गुग्गुल में अनेक औषधीय गुण पाए जाते हैं—

  • उष्ण वीर्य
  • मधुर रस
  • पिच्छिल गुण
  • वातनाशक प्रभाव
  • सूजन कम करने की क्षमता
  • स्थूलता कम करने में सहायक
  • शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने में उपयोगी

इसी कारण गुग्गुल को वात रोगों और शोथ (सूजन) में अत्यंत लाभकारी माना गया है।


गुग्गुल सेवन करते समय सावधानियां

गुग्गुल का सेवन करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए—

  • अत्यधिक अम्लीय भोजन से बचें
  • तीक्ष्ण एवं भारी भोजन न करें
  • अजीर्ण होने पर सेवन न करें
  • अत्यधिक क्रोध और श्रम से बचें
  • मैथुन और अधिक व्यायाम से परहेज करें

अधिक मात्रा में या लंबे समय तक बिना चिकित्सकीय सलाह के सेवन करने से यकृत (Liver) और फेफड़ों पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए चिकित्सक की सलाह आवश्यक है।


गुग्गुल के गुणकारी औषधीय उपयोग

1. संधिवात में लाभकारी

शुद्ध गुग्गुल और सौंठ को घी में मिलाकर सेवन करने से संधिवात में लाभ मिलता है और जोड़ों का दर्द कम होता है।

2. कटिशूल (कमर दर्द)

गुग्गुल को जल में पकाकर कमर पर लेप करने से कटिशूल में आराम मिलता है।

3. शिरःशूल (सिर दर्द)

गुग्गुल को पान के साथ पीसकर मस्तक पर लेप करने से सिरदर्द में लाभ होता है।

4. शोथ (सूजन)

देवदारु, सौंठ और पुनर्नवा के क्वाथ के साथ गुग्गुल का सेवन सूजन कम करने में उपयोगी माना जाता है।

5. ऊरुस्तम्भ

गोमूत्र के साथ गुग्गुल का सेवन ऊरुस्तम्भ में लाभकारी बताया गया है।

6. उच्च रक्तचाप

गुग्गुल और सर्पगंधा घनसत्व का सेवन उच्च रक्तचाप में लाभदायक माना जाता है।

7. वातरक्त

अमृता और त्रिफला क्वाथ के साथ गुग्गुल सेवन करने से वातरक्त विकार में लाभ होता है।

8. गण्डमाला

2 ग्राम गुग्गुल और 2 ग्राम त्रिफला चूर्ण को कांचनार छाल के क्वाथ के साथ लेने से गण्डमाला में लाभ बताया गया है।

9. नेत्र रोग

त्रिफला क्वाथ के साथ गुग्गुल सेवन करने से वात-कफ जनित नेत्र रोगों में लाभ मिलता है।

10. अर्दित (मुंह का पक्षाघात)

सौंठ, रास्ना, अजमोद, जीरा, पिप्पली और सेंधा नमक के साथ गुग्गुल मिलाकर अदरक रस के साथ सेवन करने से अर्दित में लाभ बताया गया है।

11. रक्ताल्पता

लौह भस्म के साथ गुग्गुल का सेवन रक्ताल्पता में उपयोगी माना जाता है।

12. जलोदर

गोमूत्र के साथ गुग्गुल सेवन जलोदर रोग में लाभकारी माना गया है।

13. जीर्ण कास (पुरानी खांसी)

पिप्पली, वासा और गुग्गुल को मधु के साथ सेवन करने से पुरानी खांसी में लाभ मिलता है।

14. कब्ज (कोष्ठबद्धता)

त्रिफला चूर्ण और गुग्गुल को हल्के गर्म जल के साथ लेने से कब्ज में राहत मिलती है।

15. स्थूलता (मोटापा)

त्रिफला, मरिच, त्रिकुट और गुग्गुल को एरण्ड तेल में मिलाकर सेवन करने से मोटापा कम करने में सहायता मिलती है।

16. शीतपित्त

गुग्गुल और पिप्पली चूर्ण को त्रिफला क्वाथ के साथ सेवन करने से शीतपित्त में लाभ बताया गया है।

17. पाचन शक्ति की कमजोरी

इंद्रजौ, एलुआ और गुग्गुल को गुड़ के साथ सेवन करने से पाचन शक्ति मजबूत होती है।

18. कंठमाला

गुग्गुल को जल में उबालकर कंठमाला पर लेप करने से लाभ मिलता है।

19. पक्षाघात

एरण्ड तैल में गुग्गुल मिलाकर प्रभावित अंग पर लेप करने से लाभ बताया गया है।

20. अर्श रोग

गुग्गुल को जल में पीसकर अर्श के मस्सों पर लगाने से लाभ मिलता है।

21. गृध्रसी (सायटिका)

रास्ना चूर्ण और गुग्गुल को घी के साथ सेवन करने से गृध्रसी में लाभकारी माना गया है।


निष्कर्ष

गुग्गुल आयुर्वेद की अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुगुणी वनौषधियों में से एक है। यह विशेष रूप से वात रोग, जोड़ों का दर्द, सूजन, मोटापा और शरीर की शुद्धि में उपयोगी मानी जाती है।

हालांकि, किसी भी आयुर्वेदिक औषधि का सेवन विशेषज्ञ वैद्य की सलाह से ही करना चाहिए। उचित मात्रा और सही विधि से उपयोग करने पर गुग्गुल अनेक रोगों में लाभ पहुंचा सकता है।

Author – Ayurvediya Upchar Team

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