खाँसी (कास) क्या है? कारण, लक्षण, प्रकार और आयुर्वेदिक उपचार

Jun 19, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
खाँसी (कास) क्या है? कारण, लक्षण, प्रकार और आयुर्वेदिक उपचार

परिचय

शरीर के सारे क्रिया-कलाप जब सामान्य और स्वाभाविक रूप में चलते रहते हैं तब शरीर स्वस्थ माना जाता है, लेकिन ज्यों ही इनमें कोई छोटा-बड़ा विकार आ जाता है, तब रोगकारक स्थिति बन जाती है। रोग की यह स्थिति कभी-कभी बहुत मामूली होने से बिना विशेष उपायों के स्वयं ही दूर हो जाती है, लेकिन गंभीर होने पर बहुत प्रयत्न करने पर भी दूर नहीं होती।

शरीर में पनपने वाले कई रोग अपनी उपस्थिति का अहसास कुछ खास तरह के लक्षणों से कराते रहते हैं। खाँसी ऐसा विकार है जो स्वतन्त्र रोग के अलावा किसी अन्य बीमारी के लक्षण रूप में पनप सकता है। बचपन से बुढ़ापे तक खाँसी का रोग प्रायः हर स्त्री-पुरुष को कभी न कभी हो ही जाता है, फिर चाहे वह मामूली रूप में हो या कष्टकारी बीमारी के लक्षण रूप में।


क्यों होती है खाँसी?

जब मुंह से कांसे के फूटे हुए बर्तन जैसी आवाज निकलती है, वह धों-थों या खों-खों की आवाजें मुंह से निकालता है, उस रोग को 'खाँसी' कहा जाता है।

खाँसी को आयुर्वेद में 'कास' कहा गया है। मुंह में कुशब्द निकलने की वजह से इसे 'कास' कहा गया है। फेफड़ों में भरी हुई हवा, श्वासनली या मुंह के द्वारा बाहर फेंकने की क्रिया से एक तरह की आवाज होती है, इसे ही 'खाँसी' कहा जाता है।

आमतौर पर खाँसी अनैच्छिक होती है, लेकिन कभी-कभी अपनी इच्छा से भी लोग खाँसने लगते हैं। अंग्रेजी में इसे Cough कहा जाता है।


मनुष्य किस तरह खाँसता है?

शरीर में श्वसन संस्थान के नाक, गला, स्वरयंत्र, श्वासनलिका और फेफड़े मुख्य भाग हैं। इन भागों से निर्मित खाँसी का संवेदना संदेश कुछ विशेष प्रकार के मज्जातन्तुओं के द्वारा दिमाग में स्थित खाँसी केन्द्रों को पहुंचाया जाता है।

खाँसी की संवेदना श्वसन संस्थान के जिस हिस्से में पैदा होती है उसे कफ रिसेप्टर (Cough Receptor) कहते हैं। यह पूरे श्वसन संस्थान में जालीनुमा फैली होती है।

इन संवेदनाओं की दिमाग में छंटनी होकर खाँसी पैदा करने के संदेश पुनः मज्जातन्तुओं के द्वारा श्वसन संस्थान की ओर पहुंचाए जाते हैं। इन संदेशों के पहुंचते ही पहले एक लंबी सांस ली जाती है, जिससे श्वासनलिका का ऊपरी हिस्सा स्वरपटल द्वारा बंद हो जाता है।

इसके बाद पेट और सीने के स्नायुओं के साथ श्वासनलिका का संकुचन हो जाता है, जिसकी वजह से फेफड़ों में हवा का दबाव काफी बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए दबाव से स्वरपटल फिर से खुल जाता है और श्वसन संस्थान में स्थित धूल तथा अन्य चीजों के छोटे-छोटे कण हवा के साथ बाहर फेंक दिए जाते हैं।

इस क्रिया में एक आवाज पैदा होती है, जिसे खाँसी कहते हैं।

श्वसन संस्थान के कफ रिसेप्टर इतने संवेदनशील होते हैं कि धूल के कण, वातावरण के सूक्ष्म कण, द्रव पदार्थ, रक्त, उभर आई गाँठ, जलन, धुआं अथवा तीक्ष्ण गैस आदि के स्पर्श से उत्तेजित होकर तुरंत अपनी संवेदनाएं मज्जातन्तुओं के माध्यम से दिमाग को भेज देते हैं।


खाँसी का उद्देश्य

खाँसी को हम एक विकार मानते हैं, लेकिन वास्तव में कई मायनों में यह एक ऐसी क्रिया है जो श्वसन संस्थान में प्रवेश कर गए विजातीय, निरुपयोगी और नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों को बाहर निकालने में मददगार बनती है।

खाँसी से निकली फेफड़ों की हवा इन तत्वों को बाहर निकालकर श्वसन संस्थान को साफ कर देती है और इस तरह श्वसन संस्थान की रक्षा में सहायक बनती है।

लेकिन खाँसी जब ज्यादा जोर पकड़ने लगती है तब दुखदायी बन जाती है। ऐसे में सीने और गले में दर्द होने लगता है, सांस फूलती है और बेचैनी होने लगती है।

हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि लगातार और प्रायः खाँसी क्यों बनी रहती है, क्योंकि लंबे समय तक बनी रहने वाली खाँसी शरीर के अन्दरूनी किसी हिस्से में विकार का लक्षण हो सकती है।


खाँसी के कारण

बीड़ी-सिगरेट पी रहे व्यक्ति के पास बैठे अन्य व्यक्ति को खाँसी आने लगती है। दरअसल बीड़ी-सिगरेट का अप्रिय धुआं उड़कर पास वाले आदमी की सांस से जब अंदर पहुंचता है तो उसका श्वसन संस्थान इस अप्रिय धुएँ को बर्दाश्त नहीं करता और वह धुएँ को खाँसी के द्वारा बाहर करने की कोशिश करता है।

इस तरह खाँसी के द्वारा श्वसन संस्थान की हिफाजत हो जाती है। लेकिन कई बार खाँसी आने की वजह कोई अन्य बीमारी भी होती है।

गले के विकार

  • गले की जलन

  • टॉन्सिल की जलन

  • गले का कैंसर

नाक के विकार

साइनोसाइटिस बीमारी में रात के समय खाँसी की शिकायत देखी जाती है।

श्वासनलिका के विकार

  • डेंगू, वायरस या अन्य बैक्टीरिया की वजह से पैदा हुई खाँसी

  • ब्रोंकाइटिस

  • ब्रोंकिएक्टेसिस

  • दमा

  • दूषित एवं विषाक्त वायु

  • धूल कण

  • श्वासनलिका का कैंसर

स्वरयंत्र के विकार

  • सिफलिस

  • स्वरयंत्र की जलन

  • क्षयरोग

  • कैंसर

फेफड़ों के विकार

  • क्षयरोग

  • न्यूमोनिया

  • फेफड़ों में मवाद

  • कैंसर

  • न्यूमोकोनियोसिस

  • सिस्टिक फाइब्रोसिस

फेफड़ों के आवरण के विकार

  • आवरण में जलन (प्लुरिसी)

  • अटकी हुई हवा

  • मवाद

सीने के विकार

गांठें बन जाना, लिम्फनोड कमजोर पड़ जाना तथा धमनियों की फूली हुई सतहें आदि कारणों से खाँसी मूल रोग रहने तक बनी रह सकती है।

इसके अलावा—

  • हृदय विकार

  • लिवर के विकार

  • सीने और पेट के अन्दरूनी परदों के विकार

  • मानसिक विकार

भी खाँसी का कारण बन सकते हैं।


कफ वाली खाँसी के कारण

इसे गीली खाँसी भी कहते हैं। खाँसी के साथ कफ आना इसका प्रमुख लक्षण है।

कई मामलों में कफ की मात्रा कम रहती है, यानी कफ बनता भी कम है और इसलिए खाँसी के साथ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बाहर निकलता है। श्वसन संस्थान के कई रोगों में इस प्रकार के लक्षण मिलते हैं।

लेकिन कई मामलों में कफ खाँसी के साथ 18-20 बार तक निकलता है, अर्थात कफ बनता भी ज्यादा है और निकलता भी ज्यादा है।

यह स्थिति निम्न रोगों में प्रायः बनती है—

  • फेफड़ों में मवाद बनना

  • ब्रोंकाइटिस

  • हृदय का ठीक प्रकार से कार्य न करना

  • इन्फारक्शन नामक फेफड़ों का विकार


खाँसी में निकलने वाले कफ की रंगत से रोग की पहचान

कफ की रंगत चिकित्सक को वास्तविक रोग की पहचान कराने में सहायक रहती है।

पीला और बदबूदार कफ

यह संभावना बनती है कि फेफड़ों में मवाद बन रहा है या व्यक्ति ब्रोंकिएक्टेसिस रोग से पीड़ित है।

हल्का हरा कफ

यह गले या स्वरयंत्र के विकारों को दर्शाता है तथा संभावना होती है कि व्यक्ति एक्यूट ब्रोंकाइटिस या दमा से पीड़ित है।

हल्का लाल या झागदार कफ

यदि कफ का रंग हल्का लाल हो और उसमें झाग हो अथवा कफ के साथ खून मिला हुआ हो तो हृदय विकार जैसे लेफ्ट साइडेड हार्ट फेल्योर की संभावना बनती है।

सल्फर युक्त कफ

यदि कफ सल्फर के कणों से युक्त हो तो एक्टिनोमायकोसिस रोग की संभावना हो सकती है।

हल्का लाल या हल्का पीला कफ

न्यूमोनिया का संकेत हो सकता है।

मोटा हरा-पीला कफ

सिस्टिक फाइब्रोसिस रोग की संभावना होती है।

भूरे रंग का कफ

न्यूमोकोनियोसिस रोग की संभावना हो सकती है।

इस प्रकार कफ की रंगत रोग की पहचान में सहायक होती है।


दमा और खाँसी

दमा बहुत कष्टकारी रोग है। इसका पहला लक्षण सांस फूलना और दूसरा प्रमुख लक्षण खाँसी आना होता है।

इस रोग में सूखी खाँसी आती है, जिसमें कफ नहीं आता, अथवा कभी-कभी हल्के हरे रंग का थोड़ा कफ निकलता है।

दमा रोगी को सर्दी के दिनों में या मौसम बदलने पर खाँसी अधिक परेशान करती है।

कुछ विशेष चीजों से कुछ लोगों को एलर्जी होती है। ऐसे में इन वस्तुओं के सम्पर्क से व्यक्ति दमा का शिकार हो जाता है। ये चीजें फूलों के परागकण, धूल आदि हो सकती हैं।

इससे रोगी को खाँसी आती है, जी घबराने लगता है और सांस लेने में परेशानी हो सकती है। दमा की खाँसी कुछ दिनों बाद स्वयं शांत भी हो सकती है।


खाँसी और आयुर्वेद

आयुर्वेद में खाँसी को 'कास' कहकर इसके पाँच भेद किए गए हैं—

  1. वातज कास

  2. पित्तज कास

  3. कफज कास

  4. क्षतज कास

  5. क्षयज कास

यदि ऊपरी तौर पर देखा जाए तो सूखी और गीली अर्थात कफ वाली दो प्रकार की खाँसी प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं। कभी-कभी खाँसी में खून भी आ जाता है, तब इसे रक्तयुक्त या खूनी खाँसी कहा जाता है।

आयुर्वेद में इन विभिन्न अवस्थाओं को वातिक, कफज और क्षयज कास के अंतर्गत माना गया है।

यदि रोग की अवधि के अनुसार देखा जाए तो खाँसी दो प्रकार की होती है—

  • तीव्र या नवीन कास

  • चिरकालीन कास

नवीन कास में वातिक, श्लेष्मिक और क्षतज कास को माना जाता है जबकि दीर्घकालीन कास में क्षयज कास को माना गया है।

इसके अलावा जरा कास अर्थात बुढ़ापे में फुफ्फुसों के कमजोर पड़ जाने तथा फाइब्रोसिस की वजह से होने वाली खाँसी को भी क्षयज कास में शामिल किया गया है।

भेदानुसार कारण और लक्षण

वातज कास के कारण

  • रुखी, कसैली और ठण्डी चीजों का ज्यादा सेवन।

  • भोजन नहीं करना या बहुत कम करना।

  • सहवास ज्यादा करना।

  • अधारणीय वेगों को रोकना, जैसे आती हुई छींक को रोक लेना या मल-मूत्र की हाजत को टाल देना आदि।

वातज कास को सामान्य जन 'सूखी खाँसी' कहते हैं। इसकी खास पहचान निम्न हैं—

वातज कास के लक्षण

  • सूखी खाँसी बार-बार आती है और लगातार खाँसने के बाद थोड़ा सा कफ निकलता है, इसके बाद खाँसी का वेग धीमा हो जाता है।

  • छाती और कनपटी पर दर्द होता है।

  • रोगी की कोशिश रहती है कि खाँसने से कफ निकले ताकि उसे राहत मिल जाये। इसी क्रम में वह खांसते-खांसते हांफने लगता है और पसीने से तरबतर हो जाता है।

  • कभी-कभी खांसते-खांसते रोगी को उल्टी आ जाती है।

  • उसका स्वर भंग हो जाता है, गला बैठ जाता है तथा गले से धीमी आवाज निकलती है।

  • रोगी के सीने, गले और मुख में खुश्की रहती है।

  • मुंह में सूखा कफ लिसा-लिसा सा रहता है।

  • हृदय, कनपटी, पसली, पेट, छाती और सिर में दर्द होता है।

  • रोएं खड़े हो जाते हैं।

  • ग्लानि होती है।

  • मोह होता है।

  • मुंह की रौनक बिगड़ जाती है।

  • खट्टे, नमकीन, चिकने तथा गरम पदार्थ खाते ही खाँसी दब जाती है और भोजन पच जाने के बाद पुनः उभर आती है।

  • खाँसी की आवाज में तेजी होती है।

विशेष

दवाओं के मेल से पकाये हुए तेल, घी या अवलेह के सेवन से सूखी खाँसी में जल्दी फायदा हो जाता है।


पित्तज कास के कारण

  • कड़वी, खट्टी और गरम चीजों का ज्यादा सेवन।

  • तन और मन की जलन होने से, अर्थात गुस्सा ज्यादा आने, आग के पास अधिक देर रहने या धूप में अधिक समय तक रहने से पित्त कुपित हो जाता है और परिणामस्वरूप पित्तज खाँसी हो जाती है।

पित्तज खाँसी को सामान्य जन 'गरमी की खाँसी' कहते हैं।

पित्तज कास के लक्षण

  • सीने में जलन तथा धुआं सा उठता महसूस होता है।

  • बुखार आता है।

  • प्यास अधिक लगती है।

  • मुख में जलन रहती है।

  • अरुचि रहती है।

  • भ्रम सा प्रतीत होता है।

  • मुख में तीखापन बना रहता है।

  • आंखों में पीलापन रहता है।

  • थूकने पर पीले रंग का कफ निकलता है।

  • कभी-कभी पीले रंग की उल्टी भी हो जाती है।

  • खाँसी अधिक दिनों तक बनी रहने पर त्वचा भी पीली दिखाई देने लगती है।

  • खाँसी का जोर कुछ दिनों तक बना रहता है।

  • मुंह और गले का अन्दरूनी भाग लाल हो जाता है।

  • गल ग्रन्थियों में सूजन आ जाती है।

  • शरीर में अधिक गर्मी महसूस होती है।

  • खाँसी के वेग के निरन्तर रहने से आंखों के सामने तारे चमकते हुए दिखाई देते हैं।

  • आवाज बिगड़ जाती है।

  • नशे जैसा अनुभव होता है।


कफज कास के कारण

  • देर से पचने वाली वस्तुओं का सेवन।

  • मीठी वस्तुओं का अधिक सेवन।

  • चिकनाई युक्त भोजन का सेवन।

  • दिन में सोना।

  • मेहनत न करना तथा आरामतलब जीवन बिताना।

कफज खाँसी को सामान्य जन कफ की खाँसी, तर खाँसी अथवा गीली खाँसी कहते हैं।

कफज कास के लक्षण

  • खाँसी का आवेश बार-बार आता है।

  • खाँसी के साथ मधुर, गाढ़ा और चिकना कफ गिरता है।

  • गले में सुरसुराहट या खुजली सी चलती रहती है।

  • शरीर में भारीपन महसूस होता है।

  • बेचैनी बनी रहती है।

  • मुख में मीठापन सा अनुभव होता है।

  • खाँसी में विशेष पीड़ा नहीं होती।

  • रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसके सीने में कफ भरा हुआ है।

  • अग्नि मंद हो जाती है।

  • खाने की इच्छा नहीं रहती।

  • वमन या उल्टी हो सकती है।

  • हृदय में वेदना होती है अथवा हृदय ऐंठता है।

  • सिर दर्द बना रहता है।

  • गले या शरीर में खुजली सी होती है।

  • बहुत खाँसने पर गाढ़ा कफ निकलता है।

  • नींद अधिक आती है।

  • चक्कर आते हैं।


क्षतज कास के कारण

  • अधिक सहवास करना।

  • अधिक व्यायाम करना।

  • अधिक बोझ ढोना।

  • छाती पर चोट लगना।

  • अधिक पैदल चलना।

  • फुफ्फुस अथवा फुफ्फुस की झिल्ली में चोट लग जाना।

ऊपर लिखे कारणों से जब छाती या फेफड़ों में सदमा पहुंचता है अथवा चोट लगती है, तब वहां घाव बन जाते हैं। उस समय मनुष्य को खाँसी आने पर खून मिला कफ विशेष रूप से आता है।

यह भी कहा जा सकता है कि उपरोक्त कारणों से वायु कुपित होकर छाती और फेफड़ों को सख्त बनाती है तथा घाव उत्पन्न करके खाँसी पैदा कर देती है।

जब तक छाती या फेफड़ों में घाव नहीं होते तब तक केवल सख्ती और सूजन रहती है तथा सूखी खाँसी आती है, लेकिन घाव हो जाने पर कफ के साथ खून भी आने लगता है।

क्षतज कास के लक्षण

  • सांस लेने में कष्ट होना।

  • खांसते समय छाती और गले में कष्ट होना।

  • खाँसने के बाद खून अथवा खून मिला कफ निकलना।

  • खांसते समय सीने में सुइयां चुभोने जैसा दर्द होना।

  • प्रभावित स्थान को दबाने पर दर्द बढ़ जाना।

  • सीने में तेज दर्द होना।

  • सीने में ताप का अनुभव होना।

  • बुखार आना।

  • दांतों में दर्द होना।

  • खाँसी का जोर बढ़ जाने पर गले से कबूतर जैसी आवाज निकलना।

  • पसलियों में दर्द होना।

  • कंपकंपी आना।

  • सांस तेज चलना।

  • अधिक प्यास लगना।

  • पसलियों का अधिक चलना।

  • पीठ और कमर में जकड़न होना।

  • जोड़ों में दर्द और फूटन सी होना।


क्षयज कास के कारण

  • विषम भोजन करना।

  • अधिक सहवास करना।

  • मल-मूत्र के वेगों को रोकना।

  • घृणित वस्तुओं का निरन्तर चिन्तन करना।

  • अत्यधिक चिन्ता करना।

इन सभी कारणों से जठराग्नि कुपित होकर देह को कमजोर करने वाली खाँसी उत्पन्न करती है।

ऊपर लिखे कारणों से जठराग्नि बिगड़ जाती है। जठराग्नि की खराबी से वात, पित्त और कफ कुपित होकर क्षयज कास को जन्म देते हैं।

इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि उल्टे-सुल्टे खानपान से जब पाचन क्रिया बिगड़ जाती है, तब रस ठीक प्रकार से नहीं बनता। इस कारण अन्य धातुएं भी पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पातीं, जबकि उनका क्षय लगातार होता रहता है।


आधुनिक नजरिये से क्षयज खाँसी

आधुनिक चिकित्सा में क्षयज खाँसी को फ्थाइसिस पल्मोनेलिस (Phthisis Pulmonalis) कहा गया है।

अधिक मेहनत, सर्दी-जुकाम होने तथा तीव्र गंध वाली वस्तुएं सूंघने के अलावा क्षयज खाँसी की वजह पुश्तैनी भी मानी गयी है।

क्षयज कास के लक्षण

  • खाँसी लगातार बनी रहती है।

  • इसकी शुरुआत बिना सर्दी-बुखार के सूखी खाँसी के रूप में होती है।

  • कफ के साथ धारियों के रूप में खून मिला हुआ अथवा केवल खून ही आता है।

  • आवाज फटी हुई रहती है।

  • गले में खराश रहती है।

  • सिर में दर्द रहता है।

  • हथेलियां गर्म रहती हैं।

  • अंगुलियों के अगले भाग मोटे हो जाते हैं।

  • जीभ पर सफेद लेप दिखाई देता है।

  • बाल गिरते हैं।

  • कभी-कभी बुखार आता है जिसका जोर शाम के समय अधिक रहता है।

  • भूख कम लगती है।

  • जी मिचलाता है।

  • पेट फूलने की शिकायत हो सकती है।

  • शरीर में कमजोरी बनी रहती है।

  • किसी काम में मन नहीं लगता।

  • वजन घटने लगता है।

  • शरीर के ऊपरी आधे भाग में अधिक पसीना आता है।

  • थोड़ी सी मेहनत करते ही हांफनी आती है और खाँसी बढ़ जाती है।

  • फेफड़ों के ऊपर स्टेथॉस्कोप से सुनने पर विशेष प्रकार की आवाज सुनाई देती है।

  • यदि रोगी स्त्री हो तो माहवारी बन्द हो सकती है अथवा बढ़ सकती है।


क्षयज कास के विशेष लक्षण

  1. रोगी दुर्गन्धित पूय (पस) युक्त तथा खून मिला कफ थूकता है।

  2. खांसते समय ऐसा महसूस होता है मानो हृदय अपनी जगह से हट गया हो।

  3. कभी गरम तो कभी ठण्डी वस्तुओं के सेवन से रोगी परेशानी महसूस करने लगता है।

  4. रोगी अधिक भोजन करने के बावजूद कमजोर बना रहता है।

  5. चेहरे की त्वचा चिकनी दिखाई देती है।

  6. हथेली और पादतल की त्वचा चिकनी रहती है।

  7. नेत्रों में विशेष कांति दिखाई देती है।

  8. रोगी को लगातार बुखार बना रहता है।

  9. शरीर में दर्द बना रहता है।

  10. पार्श्वशूल (पसलियों के आसपास दर्द) रहता है।

  11. अरुचि बनी रहती है।

  12. कफ कभी पतला और कभी गाढ़ा निकलता है।

  13. दाह अथवा जलन का अनुभव होता है।

क्या चिकित्सा से खाँसी ठीक हो जाती है?

  1. शुरु-शुरु में हर तरह की खाँसी आसानी से ठीक हो जाती है, लेकिन धीरे-धीरे पुरानी पड़ती खाँसी लंबी चिकित्सा से ही ठीक हो पाती है।

    कभी-कभी तो खाँसी ऐसी सीमा में पहुंच जाती है, जब वह चिकित्सा चलते रहने तक ही ठीक रहती है और ज्यों ही चिकित्सा रोक दी जाती है, खाँसी फिर से उभरने लगती है।

    यह बात ध्यान में रखने की है कि बलवान रोगी तथा उचित चिकित्सा होने पर ही क्षयज और क्षतज कास ठीक हो पाती है। लेकिन ऐसा न होने पर ये दोनों तरह की खाँसी ठीक हो ही नहीं पातीं।

    बुढ़ापे में उठने वाली खाँसी भी दवा की सहायता से दबी रहती है। दवा बन्द करते ही पुनः होने की सम्भावना बन जाती है।

    प्रकुपित दोष को ठीक करने पर ही खाँसी ठीक होती है। क्षतज और क्षयज कास कमजोर रोगी को घातक हो सकती है, जबकि बलवान रोगी भी लंबे इलाज के बाद ही ठीक हो पाता है।

    वातज, पित्तज और कफज खाँसियां उचित इलाज से ठीक हो जाती हैं। बुढ़ापे की खाँसी जिसे 'जरा कास' कहते हैं, मुश्किल से ठीक होती है या कभी-कभी ठीक ही नहीं होती।

    जुकाम की खाँसी, जुकाम ठीक होने पर ही समाप्त होती है।


उचित चिकित्सा के अभाव में खाँसी के उपद्रव

  1. रोग कोई भी हो, उसकी ठीक प्रकार से तथा समय पर चिकित्सा कराना आवश्यक होता है।

    खाँसी भी ऐसा ही रोग है जिस पर ध्यान न देने से यह श्वसन तंत्र से जुड़े अनेक रोग उत्पन्न कर सकती है, जैसे—

    • श्वसनक ज्वर

    • ब्रोंकाइटिस

    • फुफ्फुसक्षय

    • तमक श्वास (दमा)

    आदि उपद्रव उत्पन्न हो सकते हैं।


खाँसी की चिकित्सा का आयुर्वेदीय सिद्धान्त

  1. सूखी खाँसी में चिकनाईयुक्त खानपान पर जोर देना चाहिए, जबकि कफयुक्त खाँसी में रुक्ष अर्थात चिकनाई रहित खानपान रोग को मिटाने में सहायता करता है।


खाँसी की चिकित्सा

  1. खाँसी के इलाज में रोगी के बल, आयु तथा पाचन शक्ति पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

    इसके बाद लक्षणों के आधार पर यह मालूम करना चाहिए कि किस दोष के कुपित होने से रोग उत्पन्न हुआ है। इन सभी बातों पर विचार करके चिकित्सा करनी चाहिए।

    सर्दी की खाँसी में ठंडी और गरमी की खाँसी में गरम दवा नहीं देनी चाहिए, अन्यथा कफ सूखकर छाती में जम सकता है और रोगी की स्थिति खराब हो सकती है।

    दवा ऐसी देनी चाहिए जिससे छाती पर एकत्रित कफ ढीला होकर मुंह अथवा गुदा मार्ग से बाहर निकल जाए।


दोषानुसार खाँसी की चिकित्सा

वातज खाँसी का इलाज

1. केला और पीपर का प्रयोग

  1. पके केले का थोड़ा सा छिलका हटाकर उसमें एक पीपर अथवा पांच काली मिर्च दबाकर रात की ओस में रख दें। सुबह छिलका हटाकर केला खा लें।

    यह वातज और पित्तज दोनों प्रकार की खाँसी में लाभकारी माना गया है।


2. पीपर-जवासा योग

  1. छोटी पीपर, जवासा, नागरमोथा, कचूर, काकड़ासिंगी और भारंगी समान मात्रा में लेकर कूट-पीसकर छान लें। इसमें गुड़ मिलाकर सुरक्षित रखें।

    2 से 3 ग्राम मात्रा को काले तिल के तेल में मिलाकर चटनी जैसा बनाकर चाटें।

    दिन में 2-3 बार सेवन करें।

    जिस खाँसी में कफ बिल्कुल नहीं आता, उसमें यह प्रयोग लाभकारी माना गया है।

    यदि तेल के साथ सेवन न करना चाहें तो शहद के साथ लें, लेकिन शहद के साथ लेते समय गुड़ न मिलाएं।


3. काकड़ासिंगी योग

  1. काकड़ासिंगी, जवासा, सोंठ, कचूर, दाख और मिश्री समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें।

    3 ग्राम चूर्ण को काले तिल के तेल में मिलाकर सुबह-शाम चाटें।

    यह पुरानी वातज कास में लाभकारी बताया गया है।


4. मुलहठी क्वाथ

    • छिली हुई मुलहठी – 6 ग्राम

    • हंसराज – 6 ग्राम

    • गुलबनफ्शा – 6 ग्राम

    • अलसी के बीज – 3 ग्राम

    • खतमी के बीज – 3 ग्राम

    • उन्नाव – 6 दाने

    इन सभी को कुचलकर 300 ग्राम पानी में पकाएं। जब पानी लगभग 50 ग्राम रह जाए तब छान लें।

    ठण्डा होने पर 3-3 ग्राम शहद और मिश्री मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें।

    पुरानी वातज खाँसी में लाभकारी माना गया है।


5. तुलसी-अदरक प्रयोग

    • तुलसी के पत्ते – 1 ग्राम

    • अदरक – 1 ग्राम

    • लौंग – 2 ग्राम

    • कपूर – एक चावल के दाने के बराबर

    सबको मिलाकर चबाने से सूखी खाँसी में लाभ बताया गया है।


वातज कास को मिटाने वाला पिप्पलीघृत

  1. छोटी पीपर 250 ग्राम लेकर बकरी के दूध के साथ पीस लें।

    अब—

    • गाय का घी – 2.5 किलो

    • बकरी का दूध – 10 किलो

    इन सबको एक बड़े कलईदार बर्तन में डालकर धीमी आंच पर पकाएं। दूध जल जाने पर शेष घी को छानकर सुरक्षित रख लें।

    इसे पिप्पलीघृत कहा जाता है।

    रोगी की स्थिति के अनुसार 10 ग्राम से 40 ग्राम तक मात्रा दी जा सकती है।

ध्यान रखें

  1. पिप्पलीघृत के सेवन के बाद दो घंटे तक पानी न पिएं और कुल्ला भी न करें।

वातज खाँसी में पथ्य

    • गेहूं

    • चावल

    • जौ

    • चिकनाईयुक्त पदार्थ


पित्तज खाँसी का इलाज

1. दाख-मिश्री-शहद योग

  1. दाख, मिश्री और शहद तीनों की 10-10 ग्राम मात्रा मिलाकर चाटें।

    सुबह-शाम सेवन करने से लाभ बताया गया है।


2. अंजीर-मुलहठी प्रयोग

  1. अंजीर और मुलहठी 10-10 ग्राम लेकर कुचलें।

    100 ग्राम पानी और 100 ग्राम दूध में डालकर केवल दूध बचने तक पकाएं।

    ठण्डा होने पर—

    • मिश्री – 10 ग्राम

    • शहद – 4 ग्राम

    मिलाकर सेवन करें।


3. बड़ी इलायची प्रयोग

  1. भुनी हुई बड़ी इलायची को शहद में मिलाकर चाटें।


4. काली मिर्च-मुलहठी-मिश्री चूर्ण

  1. तीनों की बराबर मात्रा लेकर चूर्ण बना लें।

    3-3 ग्राम मात्रा दिन में 4-5 बार सेवन करें।


कफज खाँसी का इलाज

1. केले के पत्तों की राख

  1. केले के पत्तों को सुखाकर जला लें।

    इसकी राख में थोड़ा नमक मिलाकर दिन में 7-8 बार सेवन करें।


2. काली मिर्च-मुलहठी गोली

  1. काली मिर्च और मुलहठी समान मात्रा में लेकर भूनें और चूर्ण बनाएं।

    बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर चने के बराबर गोलियां बनाएं।

    दिनभर में 8-10 गोलियां चूसें।


3. अमलताश प्रयोग

    • अमलताश का गूदा – 100 ग्राम

    • मिश्री – 200 ग्राम

    मिलाकर रखें।

    10 ग्राम मात्रा पानी के साथ लें।


4. भुना सुहागा

  1. भुने हुए सुहागे की 2 रत्ती मात्रा बंगला पान में रखकर सुबह-शाम सेवन करें।


5. कफज कास विशेष योग

  1. काली मिर्च, सोंठ, पीपर और बायविडंग समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें।

    डेढ़ माशा चूर्ण में 1-2 रत्ती अभ्रक भस्म मिलाकर शहद के साथ चाटें।

    यह कफज खाँसी और श्वास रोग में उपयोगी बताया गया है।


मिश्रित दोषों की खाँसी

वात-पित्तज खाँसी

  1. लक्षण—

    • प्यास

    • खुजली

    • कोख में दर्द

    • धसक

    • नींद न आना

    • सूखी खाँसी


पित्त-कफज खाँसी

  1. लक्षण—

    • आंखों में लालिमा

    • धुएं जैसी गंध

    • कफ में रक्त


त्रिदोषज खाँसी

  1. लक्षण—

    • खुजली

    • शोष

    • जलन

    • सिरदर्द

    • सूजन

    • अरुचि

    • वमन

    • बार-बार थूकना


कब्बे की खाँसी

  1. गले में कब्बे के लटकने से खाँसी की शिकायत उत्पन्न हो सकती है।

    यह समस्या विशेष रूप से बच्चों में देखने को मिलती है।

    रोगी को ऐसा लगता है जैसे गले में कुछ अटका हुआ है और वह बार-बार खांसता रहता है।


वात-कफज खाँसी का इलाज

    • तालीसादि चूर्ण

    • लवंगादि गुटिका

    इनका सेवन लाभकारी माना गया है।


पित्त-कफज खाँसी का इलाज

  1. अडूसे (वासा) की पत्तियों का 20 ग्राम रस लेकर उसमें 5 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें।


क्षतज खाँसी का इलाज

1. एलादिवटी

  1. रोगी की स्थिति के अनुसार 1-2 गोली सुबह-शाम लें।

    ऊपर से मिश्री मिला दूध पिएं।


2. लवंगादि एवं जातीफलादि चूर्ण

  1. सुबह लवंगादि चूर्ण शहद के साथ और शाम को जातीफलादि चूर्ण शहद के साथ सेवन करें।

    ऊपर से मिश्री मिला दूध पिएं।


बच्चों की खाँसी का इलाज

प्याज और सरसों का तेल

  1. थोड़ा प्याज का रस और सरसों का तेल मिलाकर पकाएं।

    इस तेल को छाती पर मलें।


अदरक और सरसों का तेल

  1. अदरक के रस को सरसों के तेल में मिलाकर पकाएं।

    इस तेल से छाती पर मालिश करें।


कुकुर खाँसी

  1. अदरक के रस के साथ गाय का घी पकाकर उसकी थोड़ी मात्रा गर्म दूध में मिलाकर दें।


खाँसी मिटाने वाले आसान आयुर्वेदिक योग

    • छोटी पीपल का चूर्ण + सेंधा नमक + गुनगुना पानी।

    • सोंठ और मिश्री का चूर्ण शहद के साथ।

    • सोंठ, काली मिर्च और छोटी पीपल का त्रिकटु चूर्ण शहद के साथ।

    • अडूसा (वासा) का रस शहद के साथ।

    • पीपलामूल, काकड़ासिंगी, सेंधा नमक और बबूल गोंद का चूर्ण।

    • केले के छिलके की राख शहद के साथ।

    • अडूसा भस्म, मुलहठी, काकड़ासिंगी, कुलिंजन और नागरमोथा का मिश्रण।

    • सत मुलहठी, वंशलोचन, इलायची, दालचीनी, गोंद और शहद का योग।

    • अनार का छिलका, काली मिर्च, मुलहठी, बहेड़ा, सुहागा और गुलबनफ्शा की गोलियां।

    • भारंगी, कचूर, काकड़ासिंगी, छोटी पीपल, सोंठ और मुनक्का का योग।

    • मुनक्का, मुलहठी, पिंडखजूर, छोटी पीपल और काली मिर्च का योग।

    • पुष्करमूल, कायफल, भारंगी, छोटी पीपल और सोंठ का क्वाथ।

    • पंचकोल सिद्ध दूध।

    • अदरक का स्वरस और शहद।

    • सूखी मूली, चित्रक मूल और छोटी पीपल का चूर्ण शहद के साथ।


निष्कर्ष

  1. खाँसी (कास) केवल एक साधारण समस्या नहीं है, बल्कि कई रोगों का संकेत भी हो सकती है। आयुर्वेद में वातज, पित्तज, कफज, क्षतज और क्षयज कास का विस्तृत वर्णन मिलता है। उचित निदान, दोषानुसार चिकित्सा, पथ्य-अपथ्य तथा समय पर उपचार द्वारा खाँसी को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है। किसी भी गंभीर या लंबे समय तक रहने वाली खाँसी में योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।

महत्वपूर्ण सूचना (Disclaimer)

यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य एवं शैक्षिक जानकारी के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। खाँसी कई प्रकार की बीमारियों का लक्षण हो सकती है। यदि खाँसी लंबे समय तक बनी रहे, खाँसी के साथ खून आए, सांस लेने में परेशानी हो, तेज बुखार हो या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत योग्य चिकित्सक से संपर्क करें। किसी भी घरेलू या आयुर्वेदिक उपाय को अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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