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मूत्राशय की पथरी : सफल चिकित्सा

May 25, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
मूत्राशय की पथरी : सफल चिकित्सा

अश्मरी रोग को आम बोलचाल की भाषा में पथरी रोग कहा जाता है और आधुनिक चिकित्सा में इसे Calculus कहते हैं। यह मुख्यतः चार प्रकार का होता है।

(1) वृक्काश्मरी (Renal Calculus)

यह वृक्क अर्थात गुर्दे (Kidney) में उत्पन्न होती है। वृक्क में बनने के कारण ही इसे वृक्काश्मरी कहा जाता है। गुर्दों में बनने वाली यह पथरी धीरे-धीरे आकार बढ़ाती है तथा समय पर उपचार न होने पर मूत्र मार्ग में रुकावट उत्पन्न कर सकती है।

(2) वस्त्यश्मरी (Vesical Calculus / Stone in Urinary Bladder)

यह वस्ति अर्थात मूत्राशय (Urinary Bladder) में उत्पन्न होती है। इसलिए इसे मूत्राश्मरी या मूत्राशय की पथरी कहा जाता है। यह मूत्राशय में जमा होने वाली तलछट, मूत्र को लंबे समय तक रोककर रखने तथा शरीर में जल की कमी के कारण अधिक उत्पन्न होती है।

(3) पित्ताश्मरी (Gall Bladder Calculus)

यह पित्ताशय (Gall Bladder) में उत्पन्न होती है। इसी कारण इसका नाम पित्ताश्मरी या गॉलब्लैडर की पथरी पड़ा है। यह पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक देखी जाती है। तैलीय एवं भारी भोजन, मोटापा तथा पित्त विकार इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।

(4) गवीन्यश्मरी (Ureter Calculus)

यह गवीनी अर्थात मूत्र नलिका (Ureter) में उत्पन्न होती है। इसलिए इसे गवीन्यश्मरी कहा जाता है। इस प्रकार की पथरी अत्यंत पीड़ादायक होती है क्योंकि यह मूत्र प्रवाह को बाधित करती है।


आयुर्वेद के अनुसार पथरी रोग की उत्पत्ति

आयुर्वेद के अनुसार जब वायु वस्ति के मुख को रोककर पित्त, कफ अथवा शुक्र से युक्त मूत्र को सुखाती है, तब क्रमशः घोर अश्मरी रोग की उत्पत्ति होती है। जैसे गाय के पित्त के सूख जाने से गोरोचन बनता है, उसी प्रकार मूत्र की तलछट सूखकर पथरी का रूप धारण कर लेती है।

आयुर्वेद में इस रोग को अत्यंत कष्टदायक माना गया है। यदि समय रहते इसका उपचार न किया जाए तो रोगी को असहनीय पीड़ा, मूत्र रुकावट तथा अन्य गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।


पथरी रोग के पूर्वरूप (प्रारंभिक लक्षण)

जब किसी व्यक्ति में पथरी बनने लगती है तब उसके शरीर में कुछ संकेत पहले से दिखाई देने लगते हैं। आयुर्वेद में इन्हें पूर्वरूप कहा गया है।

प्रमुख पूर्व लक्षण

1. वस्ति का फूला रहना

मूत्राशय में भारीपन एवं सूजन जैसा अनुभव होना।

2. वस्ति प्रदेश में पीड़ा

मूत्राशय तथा उसके आसपास दर्द रहना।

3. मूत्र में दुर्गंध

मूत्र में बकरे के मूत्र जैसी तीव्र गंध आना।

4. मूत्र त्याग में कठिनाई

पेशाब करते समय रुकावट, जलन या दर्द होना।

5. ज्वर एवं अरुचि

हल्का बुखार तथा भोजन में अरुचि होना।

अनुभवी वैद्य इन लक्षणों को देखकर समझ जाते हैं कि शरीर में पथरी बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।


मूत्राश्मरी के लक्षण

जब पथरी पूर्ण रूप से विकसित हो जाती है तब निम्न लक्षण दिखाई देते हैं—

  • नाभि, सेवनी तथा वस्तिसिर में तीव्र पीड़ा होना।
  • मूत्र की धारा रुक-रुक कर आना।
  • मूत्र कई धाराओं में निकलना।
  • मूत्र साफ न आना।
  • मूत्र त्याग में अत्यधिक दर्द होना।
  • मूत्र में रक्त आना।
  • पथरी हिलने-डुलने पर मूत्राशय में घाव हो जाना।
  • बार-बार पेशाब लगना।
  • पीठ एवं कमर में दर्द।
  • बुखार एवं उल्टी।
  • भूख कम लगना।

कई बार रोगी को इतना अधिक दर्द होता है कि आंखों से आंसू निकल आते हैं। यह रोग अत्यंत पीड़ादायक माना जाता है।


मूत्राश्मरी के कारण

आधुनिक चिकित्सा के अनुसार पथरी मुख्यतः कैल्शियम, फॉस्फेट एवं ऑक्सलेट के जमाव से बनती है। आयुर्वेद इसे आहार-विहार जन्य रोग मानता है।

प्रमुख कारण

1. मूत्र वेग को रोकना

पेशाब को लंबे समय तक रोककर रखने से उसकी तलछट मूत्राशय में जमने लगती है जो बाद में पथरी का रूप ले लेती है।

2. पानी कम पीना

कम पानी पीने से शरीर के विषैले तत्व बाहर नहीं निकलते और मूत्र गाढ़ा होकर पथरी बनाता है।

3. गलत खान-पान

अत्यधिक मिर्च-मसाले, तले-भुने पदार्थ, बासी भोजन एवं गरिष्ठ आहार पाचन को बिगाड़ते हैं जिससे पथरी बनने लगती है।

4. मद्यपान

अत्यधिक शराब सेवन शरीर में जल की कमी उत्पन्न करता है।

5. विटामिन ‘A’ एवं ‘C’ की कमी

कुछ चिकित्सकों के अनुसार इन विटामिनों की कमी भी पथरी निर्माण में सहायक होती है।

6. आनुवंशिकता

कुछ परिवारों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी देखने को मिलता है।

7. पौरुष ग्रंथि की सूजन

प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि मूत्र प्रवाह में बाधा उत्पन्न करती है।

8. अत्यधिक मानसिक एवं शारीरिक श्रम

अत्यधिक परिश्रम से शरीर में कैल्शियम एवं फॉस्फोरस का असंतुलन हो सकता है।

9. पैराथायराइड ग्रंथि की अधिक सक्रियता

इससे शरीर में कैल्शियम की मात्रा बढ़ जाती है जो मूत्र के माध्यम से निकलकर पथरी बनाती है।

10. लंबे समय तक बिस्तर पर रहना

चलने-फिरने में असमर्थ रोगियों में हड्डियों का कैल्शियम मूत्र में मिलकर पथरी बना सकता है।

11. आरामतलब जीवनशैली

जो लोग बहुत कम शारीरिक श्रम करते हैं उनमें यह रोग अधिक पाया जाता है।

12. गठिया, यकृत विकार एवं ल्यूकेमिया

इन रोगों में भी पथरी बनने की संभावना बढ़ जाती है।


पानी कम पीना क्यों हानिकारक है?

जो लोग कम पानी पीते हैं उनके गुर्दे यूरिक अम्ल एवं अन्य विषैले पदार्थों को ठीक प्रकार बाहर नहीं निकाल पाते। यही पदार्थ धीरे-धीरे सूखकर पथरी का रूप धारण कर लेते हैं।

रोज कम से कम 8–10 गिलास पानी पीना चाहिए। एक बार में अधिक पानी पीने की बजाय दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीना अधिक लाभकारी माना गया है।


रोग का निदान

हालांकि अनुभवी चिकित्सक लक्षणों के आधार पर रोग पहचान लेते हैं, फिर भी वैज्ञानिक पुष्टि के लिए निम्न जांचें आवश्यक मानी जाती हैं—

1. मूत्र जांच

इससे पता चलता है कि मूत्र में कौन-कौन से तत्व अधिक मात्रा में निकल रहे हैं।

2. एक्स-रे

पथरी की स्थिति एवं आकार जानने में सहायक।

3. सोनोग्राफी

पथरी की संख्या, आकार तथा स्थान की सटीक जानकारी देती है।


चिकित्सा सूत्र

अधिक पानी पिएं

रोगी को प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए।

कुलथी का सेवन करें

कुलथी का पानी, सूप एवं दाल पथरी गलाने में उपयोगी माने जाते हैं।

नारियल पानी

कच्चे नारियल का पानी अत्यंत लाभकारी है।

नियमित टहलना

सुबह-शाम सैर करना चाहिए।

वेग न रोकें

मल-मूत्र आदि प्राकृतिक वेगों को नहीं रोकना चाहिए।

हल्का एवं सुपाच्य भोजन

शाकाहारी एवं सुपाच्य भोजन लेना चाहिए।


पथ्य आहार

  • पुराना चावल
  • जौ
  • गेहूं
  • कुलथी
  • मूंग
  • चौलाई
  • लौकी
  • पेठा
  • खीरा
  • ककड़ी
  • खरबूजा
  • पपीता
  • नींबू
  • आंवला
  • नारियल पानी
  • मट्ठा
  • मूली
  • सहजन

कब्ज होने पर क्या करें?

यदि कब्ज रहता हो तो उसे दूर करना अत्यंत आवश्यक है।

उपयोगी औषधियां

  • त्रिफला चूर्ण
  • पंचसकार चूर्ण
  • दीनदयाल चूर्ण
  • एरण्ड भृष्ट हरीतकी चूर्ण
  • मृदुविरेचक चूर्ण

आयुर्वेदिक औषधियां

निम्न औषधियां मूत्राश्मरी में उपयोगी मानी गई हैं—

  • हजरूलयहुद भस्म
  • यवक्षार
  • गोक्षुरादि गुग्गुलु
  • त्रिविक्रम रस
  • वरुणादि लौह
  • क्षार पर्पटी
  • तृणपंचमूल क्वाथ
  • अश्मरीहर क्वाथ
  • वरुणादि क्वाथ
  • कुलत्थ क्वाथ
  • गोखरू क्वाथ
  • श्वेत पर्पटी
  • पाषाण वज्र रस
  • चन्द्रप्रभा वटी
  • चन्दनासव

यदि मूत्र में पस सेल्स आते हों तो—

  • गंधक रसायन
  • तारकेश्वर रस
  • वसंत कुसुमाकर रस
  • स्वर्ण वसन्तमालती रस
  • बंगशील
  • मूत्रदोषाम्लक वटी

आदि औषधियां वैद्यकीय परामर्श से उपयोग की जा सकती हैं।


योग एवं दिनचर्या

मयूरासन इस रोग में अत्यंत लाभकारी माना गया है। यह पाचन सुधारता है तथा मूत्र संस्थान को बल प्रदान करता है।


चिकित्सा व्यवस्था पत्र

प्रथम योग

  • हजरूलयहुद भस्म — 125 मि.ग्रा.
  • त्रिविक्रम रस — 125 मि.ग्रा.
  • श्वेत पर्पटी — 50 मि.ग्रा.
  • बंग भस्म — 50 मि.ग्रा.
  • रसायन चूर्ण — 2 ग्राम

इनकी एक-एक मात्रा दिन में 3 बार पानी के साथ लें।


द्वितीय योग

  • चन्द्रप्रभा वटी — 2 गोली
  • गोक्षुरादि गुग्गुलु — 2 गोली

दिन में 3 बार चबाकर पानी के साथ लें।


तृतीय योग

  • चन्दनासव — 2 चम्मच
  • वरुणादि क्वाथ — 2 चम्मच
  • जल — 4 चम्मच

भोजन के बाद दिन में दो बार लें।


चतुर्थ योग

  • एरण्ड भृष्ट हरीतकी चूर्ण — 1 चम्मच

रात्रि में सोते समय गुनगुने जल के साथ लें।


पंचम योग

  • कुलत्थ क्वाथ — 1 कप प्रातःकाल।

अन्य उपयोगी योग

  • गोक्षुरादि गुग्गुलु — 2-2 गोली दिन में 3 बार।
  • मृदुविरेचक चूर्ण — 1 चम्मच रात्रि में।
  • कुलत्थ सूप — 1 कप प्रतिदिन।
  • रसायन चूर्ण — 1-1 चम्मच दिन में 3 बार।

निष्कर्ष

पथरी का रोग कष्टदायक अवश्य है, लेकिन धैर्य एवं उचित चिकित्सा से इसमें लाभ संभव है। रोगी को घबराना नहीं चाहिए तथा किसी अनुभवी एवं योग्य वैद्य के निर्देशन में नियमित उपचार करना चाहिए। उचित आहार-विहार, पर्याप्त जल सेवन, नियमित व्यायाम तथा औषधि सेवन से पथरी धीरे-धीरे गलकर बाहर निकल सकती है।

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