पक्षाघात (लकवा): कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक इलाज

Jul 26, 2025
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
पक्षाघात (लकवा): कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक इलाज

मानव शरीर की संरचना अत्यंत जटिल है, और इसमें होने वाला प्रत्येक विकार शरीर की सामान्य क्रियाओं को प्रभावित करता है। इन्हीं गंभीर विकारों में से एक है पक्षाघात (Paralysis), जिसे आम बोलचाल में लकवा कहा जाता है। यह वह स्थिति है जब शरीर का कोई हिस्सा अचानक सुन्न हो जाता है और अपनी शक्ति या क्रियाशीलता खो देता है। रोगी का आत्मविश्वास टूट जाता है, वह स्वयं को दूसरों पर निर्भर महसूस करने लगता है।

लेकिन यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि—
पक्षाघात सर्वथा असाध्य नहीं है, बल्कि उचित उपचार, नियमित मालिश, औषधि, व्यायाम और मानसिक संतुलन से 99% तक ठीक किया जा सकता है।

इस विस्तृत ब्लॉग में हम जानेंगे—
✔ पक्षाघात क्या है
✔ इसके प्रकार
✔ रोग के प्रमुख कारण
✔ आयुर्वेदिक चिकित्सा
✔ घरेलू उपचार
✔ शीशम तेल और अन्य औषधीय तेलों का प्रयोग
✔ ध्यान, प्राणायाम, और योग
✔ आहार–विहार
✔ रोगी के मानसिक और भावनात्मक उपचार
✔ रोगी की देखभाल कैसे करें


1. पक्षाघात (Paralysis) क्या है?

पक्षाघात वह अवस्था है जब शरीर का कोई अंग या हिस्सा तंत्रिका तंत्र की कमजोरी या अवरुद्ध विद्युत संकेतों के कारण चलना बंद कर देता है। इसमें मांसपेशियां शक्ति खो देती हैं, अंग मुड़ सकते हैं या बिल्कुल स्थिर हो जाते हैं।

आयुर्वेद में इसे वात विकार माना जाता है।
वात दोष के अत्यधिक बढ़ जाने पर शरीर के किसी भाग में "वातगति रुक जाती है", जिससे अंग काम करना बंद कर देता है।


2. पक्षाघात के प्रकार

पक्षाघात किसी भी अंग में हो सकता है। इसके प्रमुख प्रकार—

(1) आंख का पक्षाघात

जिसमें पलक झपकना रुक जाता है या आंख तिरछी हो जाती है।

(2) उंगलियों का पक्षाघात

उंगलियां मुड़ जाती हैं या स्थिर हो जाती हैं।

(3) जीभ का पक्षाघात

बोलने में दिक्कत, जीभ टेढ़ी होना, शब्द अस्पष्ट होना।

(4) दाहिने हाथ–पैर का पक्षाघात

(5) बाएं भाग का पक्षाघात (Left Hemiplegia)

(6) अर्धांग घात (Paraplegia)

कमर से नीचे के अंग निष्क्रिय हो जाते हैं।

(7) सम्पूर्ण पक्षाघात (Quadriplegia)

पूरे शरीर पर प्रभाव।

(8) अंगों का मुड़ जाना या अकड़ जाना

कुछ रोगियों में अंग घूमने लगते हैं, जबकि कुछ में बिल्कुल स्थिर रह जाते हैं।

इन सभी में एक समान तथ्य है—
? रक्त संचार रहता है पर उसकी गति अत्यंत मंद हो जाती है।


3. पक्षाघात के प्रमुख कारण

आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों मानती हैं कि यह रोग अचानक उत्पन्न होता है, लेकिन इसके पीछे कई गहरे कारण होते हैं।


1. विद्युत्-करेंट लगना

कभी-कभी बिजली लगने से मृत्यु न होकर शरीर का कोई हिस्सा सुन्न हो जाता है।
मानव शरीर में सामान्यतः लगभग 12 वोल्ट की जैव–विद्युत होती है।
करेन्ट का तीव्र झटका इस संतुलन को बिगाड़ देता है, जिससे पक्षाघात संभव है।


2. अत्यधिक भावनात्मक उतार-चढ़ाव

अत्यधिक प्रसन्नता, तनाव, रोष या दुख से हृदय रक्त प्रवाह तेज करता है।
इससे शरीर के किसी हिस्से में विद्युत घर्षण बढ़ जाता है और तंत्रिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं।
इसलिए—
? “समभाव से जीवन जीना" सबसे बड़ी औषधि है।


3. दुर्घटना या चोट (Trauma)

सिर, रीढ़ की हड्डी या नसों में चोट लगने से अंग निष्क्रिय हो सकता है।
ऐसी स्थिति में देरी करना रोग को स्थायी बना सकता है।


4. अत्यधिक ठंड लगना

जो लोग बहुत ठंडे इलाकों में काम करते हैं या बुजुर्ग जिनका शरीर तापमान बनाए नहीं रख पाता—
उनमें सुन्नता और पक्षाघात की संभावना बढ़ जाती है।


5. मानसिक तनाव (Stress)

लंबे समय तक तनाव तंत्रिका तंत्र को कमजोर करता है।
यह पक्षाघात के प्रमुख कारणों में से एक है।


6. यौन-असंतुष्टि

आयुर्वेद के अनुसार यह वात वृद्धि का कारण बनता है, जिससे तंत्रिका क्रियाएं बाधित हो जाती हैं।


7. भोजन में वात-वर्धक और वात-शामक का असंतुलन

जिन लोगों के भोजन में हींग, लहसुन जैसी वात-शामक वस्तुएं नहीं होतीं, उनमें यह रोग होने की संभावना अधिक रहती है।

? प्रतिदिन 50 mg भुनी हींग + सेंधा नमक
खाली पेट लेने से जीवन भर पक्षाघात की संभावना कम होती है।


4. पक्षाघात की अनुभूत आयुर्वेदिक चिकित्सा

आयुर्वेद में पक्षाघात का प्रमुख कारण वात दोष है।
इसलिए उपचार में मुख्य लक्ष्य है—

✔ वात शांत करना
✔ नसों को पुनः सक्रिय करना
✔ रक्त संचार बढ़ाना
✔ मांसपेशियों की जड़ता समाप्त करना
✔ मानसिक शक्ति बढ़ाना


5. आयुर्वेदिक मालिश (Massage Therapy)

यह पक्षाघात का सबसे प्रभावी और सिद्ध उपचार है।

(A) विशेष औषधीय तेल (मूलीनस्य तेल)

तेल बनाने की विधि

✔ 1 किलो – सरसों का शुद्ध तेल
✔ 100 ग्राम – लहसुन की मींगी (गूदा)
✔ 25 ग्राम – अजवाइन
✔ 10 – लौंग

इन्हें एक साफ लोहे की कड़ाही में डालकर धीमी आंच पर उबालें।
जब लहसुन एकदम काला हो जाए, तेल तैयार है।

इस तेल की मालिश रात में करें।
 जिस अंग में रोग है, उसके विपरीत अंग में भी मालिश अनिवार्य है।
निरंतर 90 दिनों तक मालिश से रोग में अद्भुत सुधार होता है।


(B) शीशम (Sheesham) के तेल की मालिश — अत्यंत प्रभावी जोड़

शीशम तेल क्यों लाभकारी है?

✔ वात दोष शांत करता है
✔ नसों में गर्मी और शक्ति लाता है
✔ लकवे से मुड़े हुए अंगों को सीधा करने में सहायक
✔ दर्द, सुन्नता, झनझनाहट कम करता है
✔ तंत्रिकाएँ सक्रिय करता है

कैसे उपयोग करें?

✔ सुबह–शाम हल्का गुनगुना कर के मालिश करें
✔ जहाँ लकवा है, वहाँ धीरे–धीरे ऊपर से नीचे स्ट्रोक दें
✔ 20 मिनट मालिश के बाद गर्म सेक देना अत्यंत लाभकारी
✔ सरसों–लहसुन तेल के साथ बारी-बारी प्रयोग कर सकते हैं
✔ अत्यधिक ठंड या AC में तुरंत न रहें

शीशम तेल + सरसों-लहसुन तेल का संयुक्त प्रयोग 45 दिनों में अद्भुत परिणाम देता है।


(C) गोबर–गोमूत्र चिकित्सा (प्राचीन सिद्ध उपचार)

✔ 1 किलो – ताजा गाय का गोबर
✔ 250 ग्राम – ताजा गोमूत्र

दोनों को अच्छी तरह मिलाकर रोगग्रस्त अंग पर प्रत्येक सुबह 20 मिनट तक लगाएं।
यह नसों की जड़ता दूर करता है और अवरुद्ध ऊर्जा को खोलता है।


6. आयुर्वेदिक दवाएं (अंदरूनी उपचार)

नीचे दी गई दवाएं वातशामक, नसबल्य और तंत्रिका-उत्तेजक हैं:

रसराज रस – 1 ग्राम 
वृहद वात चितामणि रस – 1 ग्राम
एकाङ्गवीर रस – 10 ग्राम
आरोग्यवर्धिनी – 20 ग्राम

इन सभी को मिलाकर 30 पुड़िया बनाएं।
 प्रतिदिन 8-8 घंटे बाद
 सुबह–शाम खाली पेट 
 शहद के साथ लें।

 (नोट: इस दवा का उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्श से ही करें।)

 अश्वगंधारिष्ट + दशमूलारिष्ट सेवन विधि

लकवा (पक्षाघात) में लाभ के लिए –
2 तोला अश्वगंधारिष्ट
2 तोला दशमूलारिष्ट
दोनों को मिलाकर दोपहर और रात में भोजन के बाद सेवन करें। यह नसों को शक्ति देता है, वात दोष को शांत करता है और शरीर की सुन्नता कम करता है।


 अलसी का सेवन (सबसे प्रभावी उपाय)

सुबह खाली पेट –
2 चम्मच अलसी
इसे 1 गिलास पानी में उबालें, जब पानी आधा रह जाए तब छानकर खाली पेट पिएँ।
यह तंत्रिकाओं को मजबूत बनाता है और पक्षाघात में आराम देता है।


सन के बीज (Flax Seeds) का प्रयोग

✔ 10 ग्राम पीसकर शहद के साथ
✔ सुबह–शाम खाली पेट लें।

यह तंत्रिका-मांसपेशियों को अत्यधिक शक्ति देता है।


7. योग और व्यायाम

योग से तंत्रिका तंत्र पुनः सक्रिय होता है।

✔ भुजंगासन
✔ ताड़ासन
✔ उष्ट्रासन
✔ सूर्य नमस्कार
✔ प्राणायाम (अनुलोम–विलोम विशेष)
✔ कपालभाति – बहुत हल्के रूप में
✔ ध्यान – 10 मिनट


8. प्राकृतिक और घरेलू उपचार

✔ गरम पानी से सिंकाई
✔ तांबे के पात्र में पानी
✔ रात को तिल का तेल नाभि में
✔ लहसुन–अजवाइन का सूप
✔ गुग्गुल आधारित योग


9. भोजन और आहार-विहार

क्या खाएं?

✔ लहसुन
✔ सोंठ
✔ हींग
✔ तिल
✔ मूंग दाल
✔ देसी घी
✔ गोमूत्र अर्क
✔ काला चना
✔ मेथी
✔ बादाम
✔ दालचीनी

क्या न खाएं?

❌ दही
❌ ठंडा पानी
❌ बहुत अधिक चावल
❌ भारी, तला हुआ, बासी भोजन
❌ शीत पेय
❌ अधिक चाय-कॉफी


10. मानसिक उपचार और रोगी की देखभाल

✔ रोगी को सकारात्मक माहौल दें
✔ ऊर्जावान बातचीत करें
✔ रोगी के सामने कमजोरी की बातें न करें
✔ परिवार का सहभाग रोगी में चमत्कार लाता है
✔ रोगी को "आप ठीक हो रहे हैं" यह बार-बार बताएं

“विश्वास आधी बीमारी को जड़ से खत्म कर देता है।”


11. निष्कर्ष

पक्षाघात गंभीर रोग अवश्य है, परंतु असाध्य कभी नहीं।
यदि—
✔ उचित आयुर्वेदिक चिकित्सा
✔ अनुभूत तेल–मालिश
✔ शीशम तेल का विशेष प्रयोग
✔ योग, प्राणायाम
✔ सही भोजन
✔ मानसिक शक्ति
✔ परिजनों का सहयोग

इनका पालन किया जाए तो रोगी 99% तक पूर्ण स्वस्थ जीवन जी सकता है।

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