प्रमेह और धातुस्राव: कारण, 20 प्रकार, लक्षण और आयुर्वेदिक उपचार

Feb 14, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
प्रमेह और धातुस्राव: कारण, 20 प्रकार, लक्षण और आयुर्वेदिक उपचार

प्रस्तावना

आयुर्वेद में वर्णित ‘प्रमेह’ केवल बार-बार पेशाब आने की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के गहरे मेटाबॉलिक असंतुलन का संकेत है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ जैसे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इसे “महारोग” कहा गया है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान प्रायः इसे Diabetes (मधुमेह) से जोड़कर देखता है, परंतु आयुर्वेद के अनुसार प्रमेह केवल शर्करा की वृद्धि नहीं, बल्कि कफ, पित्त और वात दोष के असंतुलन तथा धातुओं के क्षय से जुड़ा व्यापक विकार है।

यदि समय रहते इसे पहचाना और नियंत्रित न किया जाए, तो यह शरीर की शक्ति (ओज) को क्षीण कर सकता है।


प्रमेह (धातुस्राव) का अर्थ

‘प्र’ का अर्थ है अधिक और ‘मेह’ का अर्थ है मूत्र त्याग।
अर्थात जब व्यक्ति बार-बार, अधिक मात्रा में, असामान्य रंग, गंध या चिपचिपाहट वाला मूत्र त्याग करता है, तो उसे प्रमेह कहा जाता है।

पुरुषों में जब मूत्र के साथ वीर्य या ओज का क्षय होने लगता है, तो इसे सामान्य भाषा में धातुस्राव कहा जाता है।


प्रमेह के मुख्य कारण (Etiology)

आयुर्वेद के अनुसार प्रमेह का मूल कारण कफ दोष की वृद्धि और मेद (वसा) का दूषण है।

1️⃣ जीवनशैली संबंधी कारण

  • लंबे समय तक बैठे रहना

  • शारीरिक श्रम का अभाव

  • दिन में सोना

  • मोटापा

  • मानसिक तनाव

2️⃣ आहार संबंधी कारण

  • अधिक मिठाई, शक्कर और गुड़

  • मैदा और तले हुए पदार्थ

  • नया चावल और नया गेहूँ

  • दही का अत्यधिक सेवन

  • भारी, तैलीय भोजन

इन कारणों से शरीर में “क्लेद” (अधिक नमी) बढ़ती है, जिससे मूत्र विकार उत्पन्न होते हैं।


प्रमेह के 20 प्रकार (दोषों के आधार पर)

आयुर्वेद ने प्रमेह को 3 दोषों के आधार पर 20 प्रकारों में विभाजित किया है।


 कफज प्रमेह (10 प्रकार – साध्य)

ये प्रारंभिक अवस्था में पूरी तरह ठीक हो सकते हैं।

  1. उदकमेह – जल जैसा साफ मूत्र

  2. इक्षुमेह – गन्ने के रस जैसा मीठा

  3. सान्द्रमेह – गाढ़ा मूत्र

  4. सुरामेह – शराब जैसा विभाजित

  5. पिष्टमेह – आटे जैसा

  6. शुक्रमेह – वीर्य मिश्रित

  7. सिकतामेह – रेत जैसे कण

  8. शीतमेह – ठंडा मूत्र

  9. शनैर्मेह – रुक-रुक कर मूत्र

  10. लालमेह – लार जैसा चिपचिपा


 पित्तज प्रमेह (6 प्रकार – याप्य)

ये नियंत्रित किए जा सकते हैं।

  1. क्षारमेह

  2. कालमेह

  3. नीलमेह

  4. लोहितमेह

  5. मंजिष्ठामेह

  6. हारिद्रमेह


 वातज प्रमेह (4 प्रकार – कठिन/असाध्य)

  1. वसामेह

  2. मज्जामेह

  3. हस्तीमेह

  4. मधुमेह

मधुमेह आधुनिक Diabetes से संबंधित माना जाता है।


प्रमेह के प्रमुख लक्षण

  • बार-बार पेशाब

  • पेशाब में चींटियाँ लगना

  • अत्यधिक प्यास

  • शरीर में भारीपन

  • हाथ-पैरों में जलन

  • स्वप्नदोष

  • शीघ्रपतन

  • मानसिक कमजोरी


संभावित जटिलताएँ

यदि रोग को अनदेखा किया जाए तो:

  • किडनी विकार

  • नसों की कमजोरी

  • त्वचा रोग

  • हृदय रोग

  • यौन दुर्बलता


आयुर्वेदिक उपचार

⚠️ किसी भी औषधि का सेवन चिकित्सकीय सलाह से करें।

प्रमुख औषधियाँ:

  • चंद्रप्रभावटी

  • वसंत कुसुमाकर रस

  • प्रमेहान्तक वटी

  • शुक्रशोधन वटी

सामान्यतः 1–2 गोली दिन में दो बार भोजन के बाद दी जाती है (चिकित्सक की सलाह अनुसार)।


पथ्य और अपथ्य

क्या खाएँ

  • जौ

  • बाजरा

  • मूंग दाल

  • करेला

  • मेथी

  • जामुन

  • आंवला

क्या न खाएँ

  • मैदा

  • नया चावल

  • मिठाइयाँ

  • केला, आम

  • तले हुए पदार्थ


योग और जीवनशैली सुधार

  • प्रतिदिन 4–5 किमी पैदल चलना

  • मंडूकासन

  • पश्चिमोत्तानासन

  • कपालभाति

  • ध्यान


साध्यासाध्यता

  • कफज प्रमेह – साध्य

  • पित्तज प्रमेह – याप्य

  • वातज प्रमेह – कठिन


निष्कर्ष

प्रमेह या धातुस्राव केवल मूत्र रोग नहीं, बल्कि जीवनशैली और मेटाबॉलिक असंतुलन का परिणाम है।

यदि प्रारंभिक अवस्था में पहचान कर ली जाए, तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और आयुर्वेदिक चिकित्सा से रोग की प्रगति को रोका जा सकता है।

“परहेज ही सर्वोत्तम उपचार है।”

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