रतौंधी आंख का एक ऐसा रोग है जिसमें रात को दिखाई नहीं पड़ता। यह रोग उन बच्चों में विशेष रूप से होता है जिन्हें विटामिन ए की कमी होती है। इसका उचित उपचार शीघ्र करना चाहिए अन्यथा रोग पुराना हो जाने पर नेत्र रोग कड़े हो जाते हैं तथा पलक की जड़ में पिड़िकाएं व सूजन आ जाती है।
आंखों में होने वाले रोगों में से एक रोग है रतौंधी। इस रोग में दिन में तो साफ-साफ दिखाई देता है लेकिन रात को रोगी देखने में असमर्थ होता है। यह कफ दोष के प्रकोप से होता है। कफ दोष से विकृत आंखों वाला रोगी सभी दृश्य पदार्थों को सफेद देखता है। जब कफ दोष आंख के तीनों पटलों में व्याप्त हो जाता है तब नक्तान्ध्य या रतौंधी रोग उत्पन्न हो जाता है।
रतौंधी का रोगी दिन में सूर्य की किरणों या तेज के कारण कफ की कमी हो जाने से दृश्य पदार्थों को देख सकता है, लेकिन रात को तापमान में कमी आ जाने से कफ पुनः नेत्र पटल पर छा जाता है जिससे रात को दिखाई नहीं पड़ता।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार रतौंधी कोई स्वतंत्र रोग नहीं है। यह अन्य रोगों का एक लक्षण मात्र है। अनेक रोगों में यह लक्षण मिलता है। रोगों के अतिरिक्त दृष्टि वितान (Retina) की संज्ञा हीनता, पोषक पदार्थों तथा विटामिन्स ‘ए’, ‘बी’, ‘आई’, ‘डी’ की कमी, रक्ताल्पता और पाण्डुरोग में भी यह लक्षण मिलता है।
रेटिना के रोगों में चार रोग मुख्य माने गए हैं—
(Retinitis Pigmentosa)
(Retinitis Punctate Albescens)
(Amaurotic Family Idiocy)
(Retinal Degeneration)
इन चारों अवस्थाओं में पहली और दूसरी अवस्था में रतौंधी एक प्रधान लक्षण है। प्रथम अवस्था एक पारिवारिक रोग है जिसमें रतौंधी परिवार के एकाध व्यक्ति को होता है। यह रोग प्रायः छोटी आयु से शुरू होता है। आयु के बढ़ने के साथ-साथ दृष्टि कम होती जाती है तथा रोग बढ़ता जाता है।
धुंधले प्रकाश में या संध्या के बाद देखने में साधारण बाधा पहुंचने लगती है। जब रोग बढ़ जाता है तो रात में बिल्कुल नहीं दिखाई देता है। प्रायः पैंतीस वर्ष की आयु में रोग इतना बढ़ जाता है कि रोगी रात के समय घर से बाहर भी नहीं निकल सकता।
रतौंधी का यथार्थ कारण अभी तक पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं हुआ है। आधुनिक वैज्ञानिक इसे वंशज या पारिवारिक विकार मानते हैं। उनके अनुसार माता-पिता के रज-वीर्य के दोष ही इसके कारण हो सकते हैं।
परंतु आचार्य वाग्भट का मत है कि गर्मी से व्याकुल या बेचैन व्यक्ति यदि तुरंत ठंडे जल में डुबकी लगाकर स्नान करता है तो उस समय शरीर की गर्मी सिर में जाकर रतौंधी रोग उत्पन्न करती है।
रतौंधी का दूसरा मुख्य कारण है कुपोषण। रतौंधी में जब कुपोषणजन्य कारण होता है तब रसधातु का क्षय हो जाता है अर्थात् पोषक आहार तत्वों एवं विटामिन्स, विशेषकर विटामिन ‘ए’ की कमी से शरीर का विकास नहीं होता।
कुपोषण के कारण यह रोग बच्चों में अधिकतर उत्पन्न होता है। बच्चों में विटामिन ‘ए’ की कमी की वजह से उनकी आंखों में रूखापन तथा कॉर्निया पर छोटे-छोटे घाव होने लगते हैं। धीरे-धीरे इस विटामिन का लोप होने पर रतौंधी होने लगती है, जिसे डॉक्टर ‘निक्टोलोपिया’ या ‘नाइट ब्लाइंडनेस’ कहते हैं।
इसमें बच्चे को दिन में ठीक दिखाई देता है परंतु रात में बिल्कुल दिखाई नहीं देता।
विटामिन ‘ए’ ऑक्सीकृत होने पर रेटिनेंस नामक रसायन में बदल जाता है जो नेत्र के दृष्टिपटल (रेटिना) में जाकर वहां उपस्थित प्रोटीन से मिलकर ‘रेडॉप्सिन’ नामक विशेष रसायन में बदल जाता है। इसे ही दृष्टिदायक (Visual Purple) कहते हैं।
दृष्टिपटल प्रकाश के प्रति संवेदित होकर हमें आकृति बोध कराता है। लेकिन जब विटामिन ‘ए’ की शरीर में कमी हो जाती है तो रतौंधी होने की संभावना बढ़ जाती है।
रतौंधी में आंखों की जांच करने पर आंखों का सफेद भाग सूखा-सा दिखाई पड़ता है तथा श्वेतपटल छिपा हुआ प्रतीत होता है।
रतौंधी के शुरुआत में आंखें सामान्य ही दिखाई देती हैं, केवल रात में धुंधला दिखाई देता है। इसके बाद आंखें सूखी और मटमैली रहने लगती हैं। इस अवस्था में कॉर्निया की प्राकृतिक चमक समाप्त हो जाती है।
कॉर्निया के बगल में तथा नेत्र के सफेद भाग में तिकोने भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं।
जैसे-जैसे रोग बढ़ता जाता है कॉर्निया धूमिल होने लगती है और रुई या किसी बाहरी पदार्थ के स्पर्श से भी उसमें कोई प्रतिक्रिया नहीं होती अर्थात उसकी संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है।
धीरे-धीरे कॉर्निया किनारों तथा मध्य भाग में नष्ट होने लगती है, वह सूजकर सिकुड़ने लगती है। यद्यपि इस समय आंखों में लालिमा नहीं होती लेकिन कोशिकाओं का नष्ट होना जारी रहता है।
अगर इस अवस्था में भी रतौंधी का उपचार नहीं किया जाता है तो आंख का भूरा भाग टूटकर घाव बन जाता है। इस समय किसी जीवाणु या रोगाणु का संक्रमण हो जाए तो आंखें लाल हो जाती हैं तथा आंखों से पानी आने लगता है।
रोगी व्यक्ति आंखें बंद रखता है। प्रकाश उसे असह्य हो जाता है। यह आंखों में घाव होने का सूचक है। घाव बड़े होकर एक-दूसरे से सटकर धीरे-धीरे पूरे कॉर्निया को नष्ट कर देते हैं और रोगी में अंधापन आ जाता है।
ये सब विकार रतौंधी रोग की अंतिम अवस्था में ही होते हैं। प्रथम एवं द्वितीय अवस्था में रोगी दिन में देखने में सक्षम होता है, परंतु रात को नहीं। अतः इसी अवस्था में ही रोग का सुचारु रूप में उपचार कराना चाहिए अन्यथा रोग पुराना होकर भयंकर रूप धारण कर लेता है।
रतौंधी एक कफ प्रधान नेत्र रोग है। अतः इस रोग में रोगी को कम से कम 4 दिन तक लंघन कराना चाहिए अथवा उसे 5-6 दिन तक मीठे, खट्टे एवं नमकीन रस वाले आहार का त्याग कर रूक्ष, उष्ण एवं लघु गुणवाले आहार का सेवन करना चाहिए।
फलरस, मूंग, मोथ, मसूर आदि के यूष कम से कम नमक डालकर सेवन करना लाभकारी माना गया है। चाय आदि का सेवन किया जा सकता है।
2–6 ग्राम त्रिफलाचूर्ण या क्वाथ को मधु के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से रतौंधी रोग का शमन होता है।
वासा, मोथा, नीम की छाल, पटोल, कटुकी, गिलोय, कुटज की छाल, लाल चंदन, इंद्रजौं, दारुहल्दी, चिरायता, त्रिफला, चित्रमूल, सोंठ और जौ—सभी को समभाग में लेकर मोटा चूर्ण बनाएं।
इसे 8 गुना पानी में पकाएं और आठवां भाग शेष रहने पर छान लें। इसे 25–30 ग्राम की मात्रा में दिन में दो बार सेवन करें।
हरड़, बालवच, सुगंधीकूठ, पीपल, मिर्च, बहेड़ा की भींगी, शंखनाभि तथा मैनशिल सभी को समभाग लेकर गाय के दूध में पीसकर गोली बना लें।
इसे जल या गाय के दूध में घिसकर आंखों में लगाने से लाभ मिलता है। यह अंजन तिमिर, आंखों में खुजली, पटलगत रोग तथा आंखों का फूला आदि रोगों में भी लाभकारी माना गया है।
हल्दी, नीम के पत्ते, पीपल, मिर्च, वायविडंग, नागरमोथा तथा हरड़ को समभाग लेकर बकरी के दूध में पीसकर गोली बनाएं। इसे मधु में घिसकर नेत्रों में लगाने से लाभ मिलता है।
पीपल को बकरे के यकृत में रखकर पुटपाक विधि से पकाएं और फिर यकृत के रस में पीसकर आंखों में लगाने से लाभ बताया गया है।
कालीमिर्च को मधु में बारीक पीसकर लगाने से रतौंधी में लाभ मिलता है।
वासा, त्रिफला, नागरमोथा, नीम की छाल एवं पटोलपत्र को समभाग लेकर क्वाथ बनाकर सेवन करने से लाभ होता है।
नीम के पत्तों का रस निकालकर 15–15 ग्राम सुबह-शाम एक महीने तक सेवन करने से रतौंधी का शमन होता है।
नीम की जड़ तथा बबूल के पत्तों को समभाग में लेकर क्वाथ बनाएं। इसे 25 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन पीने से लाभ होता है।
तगर, पिप्पली, सोंठ, मुलेठी, तालीसपत्र, हल्दी, दारुहल्दी तथा नागरमोथा को समभाग में लेकर चूर्ण बनाएं। इसे बकरी के यकृत के रस में घोंटकर जौ के समान बत्तियां बनाकर सुखा लें।
इस बत्ती का प्रतिदिन अंजन करने से रतौंधी में लाभ होता है तथा आंखों की ज्योति बढ़ती है।
10 ग्राम बेल के ताजे पत्ते तथा 6 दाने काली मिर्च पानी में पीसकर 25 ग्राम शक्कर के साथ शर्बत बनाकर सुबह-शाम पीने से लाभ मिलता है।
एक किलोग्राम कच्ची मूंगफली का मोटा चूर्ण बनाकर उसमें आधा किलोग्राम गुड़ मिलाएं। इसे 75–100 ग्राम की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से लाभ बताया गया है।
जीरे का चूर्ण 1–1 चम्मच मिश्री के साथ सुबह-शाम लेने से रतौंधी में लाभ मिलता है।
ग्वार के मुलायम पत्तों का साग एक महीने तक नियमित खाने से रात में न दिखाई पड़ने की शिकायत दूर होती है।
सुबह-शाम टमाटर के रस का सेवन करने से दृष्टि स्वच्छ होती है और आंखों का तेज बढ़ता है।
गाजर, टमाटर और हरी पत्तेदार सब्जियों का सूप नियमित रूप से पीना लाभकारी माना गया है।
तुलसी के पत्तों का रस निकालकर सुबह-शाम 1–1 बूंद आंखों में डालने से लाभ बताया गया है।
रतौंधी में विटामिन A युक्त आहार अत्यंत लाभकारी माना जाता है—
रतौंधी एक गंभीर नेत्र रोग है जो मुख्य रूप से विटामिन A की कमी, कुपोषण तथा नेत्र विकारों के कारण उत्पन्न होता है। प्रारंभिक अवस्था में इसका उपचार सरल होता है, लेकिन उपेक्षा करने पर यह रोग अंधापन तक पहुंच सकता है।
आयुर्वेद में रतौंधी के लिए अनेक उपयोगी औषधियां, क्वाथ, अंजन एवं घरेलू नुस्खों का वर्णन मिलता है। साथ ही संतुलित एवं पौष्टिक आहार, विशेषकर विटामिन A युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन इस रोग से बचाव और उपचार दोनों में अत्यंत सहायक माना गया है।
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