सिर दर्द एक आम बीमारी है जो शारीरिक कारणों से भी होती है और मानसिक कारणों से भी। ऐसा भाग्यशाली कोई विरला ही व्यक्ति होगा जिसको कभी सिर दर्द न हुआ हो। यहां सिर दर्द होने के कारणों और उनके निवारण के उपायों की जानकारी प्रस्तुत की जा रही है।
सिर दर्द के कारणों में कुछ कारण निज होते हैं और कुछ कारण आगन्तुक होते हैं।
निज कारण शारीरिक होते हैं—
अपच से कब्ज होती है और कब्ज बनी रहे तो मल के सड़ने से गैस बनती है। इस गैस अर्थात कुपित वायु का प्रभाव और दबाव सिर की कोमल एवं महीन स्नायुओं पर पड़ता है और सिर में दर्द होने लगता है। इस कारण को दूर करने के उचित उपाय करने से सिर दर्द होना बंद हो जाता है।
नज़र कमजोर होने से पढ़ते-लिखते समय आंखों पर दबाव पड़ता है और इसका असर दिमाग पर पड़ता है। इससे सिर में पहले भारीपन आता है, फिर दर्द होने लगता है। आंखों की जांच करवा कर चश्मा लगा लेने से यह सिर दर्द बंद हो सकता है।
उच्च रक्तचाप होने पर इसका दबाव सिर पर पड़ता है और सिर दर्द करने लगता है। रक्तचाप सामान्य करने के उपाय करने से यह सिर दर्द बंद हो जाता है।
पित्त का प्रकोप होने से कुपित वात को और वात के कुपित होने से पित्त को बल मिलता है। जैसे कहीं आग लग जाए और उस समय तेज हवा चलने लगे तो आग और अधिक फैल जाती है, उसी प्रकार शरीर में पित्त और वात दोनों के कुपित होने पर सिर पर दबाव और तनाव बढ़ जाता है।
अग्नि का स्वभाव ऊपर उठना होता है और अग्नि के संसर्ग से गर्म हुई वायु भी ऊपर की ओर उठती है। हमारे शरीर में सिर सबसे ऊंचा भाग होता है, इसलिए वात और पित्त का प्रभाव सिर की ओर बढ़ सकता है।
यदि इनका दबाव हृदय पर पड़े तो हृदय संबंधी परेशानी, फेफड़ों पर पड़े तो श्वास कष्ट और यदि सिर की ओर पहुंचे तो सिर दर्द होने लगता है।
यदि वात के साथ पित्त का प्रकोप भी हो तो रोगी को सिर दर्द के साथ उल्टी होने जैसी अनुभूति होती है अथवा उल्टी हो जाती है। उल्टी होने पर पित्त बाहर निकल जाता है और सिर दर्द में राहत मिलती है। इस प्रकार के सिर दर्द को माइग्रेन कहा जाता है। यह दर्द 2 दिन से लेकर 4-5 दिन तक रह सकता है।
कफ का प्रकोप होने से सर्दी-जुकाम हो जाता है, जिससे सिर में पहले भारीपन होता है और बाद में सिर दर्द शुरू हो जाता है। यदि स्थिति जल्दी नियंत्रित न की जाए तो तीनों दोष कुपित हो सकते हैं और त्रिदोषज शिरशूल उत्पन्न हो सकता है।
देर रात तक जागने से शरीर एवं दिमाग को पूरा विश्राम नहीं मिल पाता। इससे तनाव और दबाव बढ़ता है तथा सिर दर्द होने लगता है।
तनाव, चिंता और मानसिक दबाव का सीधा प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ता है, जिसके कारण सिर दर्द होने लगता है।
अधिक शोक करना और देर तक लगातार रोते रहना दिमाग पर दबाव और तनाव बढ़ा देता है, जिससे सिर दर्द हो सकता है।
तेज धूप, गर्मी या लू के प्रभाव से शरीर में अतिरिक्त गर्मी बढ़ जाती है। इससे बेचैनी और व्याकुलता उत्पन्न होती है तथा लंबे समय तक यह स्थिति रहने पर सिर दर्द शुरू हो सकता है।
अत्यधिक शारीरिक अथवा मानसिक परिश्रम से थकावट और कमजोरी बढ़ जाती है, जो सिर दर्द का कारण बन सकती है।
इन कारणों में से कुछ कारण ऐसे भी हैं जो हृदय से मस्तिष्क की ओर जाने वाली रक्त आपूर्ति में बाधा उत्पन्न करते हैं। इससे मस्तिष्क को मिलने वाला पोषण प्रभावित होता है और सिर दर्द पैदा हो सकता है।
आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ के प्रकोप से होने वाले शिरशूल का विस्तृत वर्णन मिलता है।
वात कुपित होने पर वायु के दबाव से सिर दर्द होने लगता है। आयुर्वेद शरीर में अधिकांश दर्दों का कारण वात को मानता है। यह दर्द रात में बढ़ता है। सिर पर पट्टी बांधने, गर्म पेय पदार्थ लेने तथा उष्ण आहार-विहार से आराम मिलता है।
पित्त कुपित होने पर आंख, नाक और सिर में गर्मी तथा तपन का अनुभव होता है। उल्टी करने की इच्छा होती है। रात में थोड़ी राहत मिलती है और उल्टी हो जाने पर दर्द कम हो जाता है। ठंडे आहार-विहार से आराम मिलता है।
कफ बढ़ने पर सिर में भारीपन और शरीर में सुस्ती महसूस होती है। सर्दी-जुकाम भी हो सकता है। इस स्थिति में सिर दर्द होने लगता है। शीतलता दूर करने वाले आहार-विहार से राहत मिल सकती है।
सूर्योदय होते ही सिर दर्द शुरू होना, दोपहर तक बढ़ते जाना और इसके बाद धीरे-धीरे कम होना तथा सूर्यास्त होने पर समाप्त हो जाना सूर्यावर्त कहलाता है। इस दर्द की विशेष अनुभूति आंखों के पीछे होती है।
इसे अंग्रेजी में Hemicrania कहा जाता है। यह दर्द सिर के केवल आधे भाग में होता है और अत्यंत कष्टदायक होता है। दर्द वाले भाग में जलन, तपन तथा फटने-कटने जैसी पीड़ा होती है। विशेष रूप से कान के ऊपर, भौंह के पास तथा आधे ललाट में तीव्र दर्द महसूस होता है।
जो ‘निज’ और ‘आगन्तुक’ कारण ऊपर बताए गए हैं, उन्हें दूर करना चिकित्सा का पहला कदम है।
दोनों समय शौच के लिए जाना तथा नियत समय पर भोजन करना चाहिए। भोजन को अच्छी तरह चबा-चबा कर खाने से अपच की स्थिति ठीक होती है और कब्ज दूर होती है।
यदि कब्ज दूर न हो तो कब्जीना चूर्ण का एक चम्मच कुनकुने पानी के साथ रात को सोने से पहले 2-3 दिन तक लिया जा सकता है।
सिर दर्द के समय सहवास करना तथा सिर में तेल मालिश करना वर्जित बताया गया है।
पुष्करमूल को चंदन की तरह घिसकर उसका लेप कपाल पर लगाने से सिर दर्द में लाभ मिलता है।
दालचीनी को पानी के साथ महीन पीसकर ललाट पर पतला लेप लगाएं। लेप सूख जाने पर उसे हटाकर नया लेप पुनः लगाया जा सकता है।
मुलहठी को कूट-पीसकर महीन चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को नसवार की तरह सूंघने का उल्लेख आयुर्वेदिक ग्रंथों में मिलता है।
पीपल, सोंठ, मुलहठी, सौंफ और कूठ – सभी 10-10 ग्राम लेकर महीन चूर्ण बना लें। एक चम्मच चूर्ण में पानी मिलाकर गाढ़ा लेप तैयार करें और इसे ललाट पर लगाएं।
गोदन्ती भस्म तथा प्रवाल भस्म 10-10 ग्राम और छोटी इलायची के दाने 5 ग्राम लेकर महीन चूर्ण बना लें। इसकी 25 पुड़िया बना लें।
रात को दही जमाकर रखें। सुबह सूर्योदय से पहले एक पुड़िया दही और थोड़ा पानी मिलाकर सेवन करें। यह एक पारंपरिक आयुर्वेदिक प्रयोग माना गया है।
शिरशूलादि वज्र रस, सूतशेखर रस, गोदन्ती भस्म, लक्ष्मी विलास रस (अभ्रक युक्त) – प्रत्येक 10-10 ग्राम तथा स्वर्ण माक्षिक भस्म एवं प्रवाल पिष्टी 5-5 ग्राम लें।
सभी द्रव्यों को भलीभांति घोंट-पीसकर मिला लें और 30 पुड़िया बना लें।
सुबह और शाम एक-एक पुड़िया शहद के साथ चाटें। इसके बाद शंखपुष्पी टेबलेट की 2-2 गोलियां ठंडे दूध के साथ लें।
भोजन के बाद आधा कप पानी में पथ्यादि काढ़ा और अमृतारिष्ट 4-4 चम्मच मिलाकर दिन में दो बार सेवन करें।
सिर दर्द के रोगियों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या अधिक पाई जाती है। इनमें भी शारीरिक कारणों की अपेक्षा मानसिक एवं बाहरी कारण अधिक प्रभावी होते हैं।
भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में महिलाएं अपने दुःख की अपेक्षा पति, बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के दुःख-दर्द से अधिक प्रभावित होती हैं। उनका स्वभाव ममतामयी, करुणामयी और संवेदनशील होता है, इसलिए छोटी-छोटी बातें भी उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
अनेक बार परिवार की समस्याएं, चिंता, जिम्मेदारियां और भावनात्मक दबाव सिर दर्द का कारण बन जाते हैं।
महिलाओं में कुछ विशेष शारीरिक कारण भी पाए जाते हैं जैसे—
इन कारणों से भी महिलाओं में सिर दर्द की समस्या अधिक देखी जाती है।
सिर दर्द एक सामान्य लेकिन महत्वपूर्ण समस्या है। इसके पीछे शारीरिक, मानसिक, वात-पित्त-कफ दोषों का असंतुलन, तनाव, कब्ज, उच्च रक्तचाप, आंखों की कमजोरी और अन्य अनेक कारण हो सकते हैं। कारण की पहचान करके उचित आहार-विहार, दिनचर्या और उपचार अपनाने से अधिकांश प्रकार के सिर दर्द से राहत प्राप्त की जा सकती है।
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। किसी भी आयुर्वेदिक औषधि, भस्म, रस औषधि या उपचार को अपनाने से पूर्व योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।
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