मनुष्य के शरीर का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील अवयव हृदय ही है। यह केवल एक अंग नहीं, बल्कि एक अद्भुत यंत्र है जो जन्म से मृत्यु तक बिना रुके संपूर्ण शरीर में रक्त का परिचालन करता है। आयुर्वेद में इसे 'चेतना का स्थान' माना गया है।
हृदय की शारीरिक संरचना (Anatomy): यह एक पोला (Hollow) अंग है जो अनैच्छिक पेशियों (Involuntary Muscles) से बना हुआ है। इसकी स्थिति वक्ष भित्ति (Thorax Wall) के अंदर, दोनों फेफड़ों (Lungs) के मध्य में होती है।
आयाम: एक स्वस्थ वयस्क का हृदय लगभग 5.5 इंच लंबा, 3.5 इंच चौड़ा और 2.5 इंच मोटा होता है।
भार: इसका वजन लगभग 291.5 ग्राम (5 छटाक) होता है। महिलाओं में इसका आकार और भार पुरुषों की अपेक्षा थोड़ा कम पाया जाता है।
स्थिति: हृदय का अधिकांश भाग वक्ष के बाईं (Left) ओर स्थित होता है।
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों मानते हैं कि हृदय रोगों का सीधा संबंध हमारे मानसिक स्वास्थ्य से है। हृदय के कार्य पर ईर्ष्या, द्वेष, भय, क्रोध और शोक जैसे नकारात्मक मनोभावों का गहरा प्रभाव पड़ता है।
जब ये नकारात्मक भाव बार-बार मन में आते हैं, तो हृदय की सामान्य क्रिया प्रभावित होती है और वह विकारग्रस्त हो जाता है।
इसके विपरीत, संयम, धैर्य और सहिष्णुता जैसे उत्कृष्ट भाव हृदय को बल प्रदान करते हैं। प्राचीन काल में लोग हृदय रोगों से मुक्त थे क्योंकि वे मानसिक रूप से अधिक शांत और धैर्यवान हुआ करते थे।
हृदय प्रदेश में होने वाले किसी भी प्रकार के तीव्र शूल को 'हृदय शूल' कहते हैं। यह दर्द अक्सर हृदय से शुरू होकर वाम बाहु (बाएं हाथ) की तरफ फैलता है।
मुख्य कारण:
ऑक्सीजन की कमी: हृदय की मांसपेशियों (Myocardium) को जब रक्त के माध्यम से पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तब यह शूल उत्पन्न होता है।
धमनी रोग: हृदय धमनियों में रुकावट या कठोरता (Coronary Thrombosis)।
अनियमित जीवनशैली: अत्यधिक शारीरिक श्रम करना या बिल्कुल भी शारीरिक गतिविधि न करना।
आहार दोष: अत्यधिक मात्रा में भोजन करना, मिर्च-मसालेदार, बहुत उष्ण (गर्म), गरिष्ठ (भारी) और तले हुए पदार्थों का निरंतर सेवन।
रोगजन्य कारण: शरीर में चर्बी (Cholesterol) का बढ़ना, मधुमेह (Diabetes) और आक्षेपक जैसे विकार।
मानसिक आघात: अत्यधिक काम-वासना, क्रोध, भय और गहरा मानसिक शोक।
हृदय शूल के प्रकार:
श्रमजन्य हृदयशूल (Angina of Effort): जो शारीरिक मेहनत या दौड़ने-भागने पर उत्पन्न होता है।
आमदोषज हृदयशूल (Spasmodic Angina): जो पेट की खराबी या मांसपेशियों में ऐंठन के कारण होता है।
भ्रमजन्य हृदयशूल (Angina Innocence): जो मानसिक भ्रम या घबराहट के कारण महसूस होता है।
इस व्याधि में पीड़ा इतनी तीव्र होती है कि रोगी मरणासन्न अवस्था (मौत के करीब) महसूस करता है।
दौरे की प्रकृति: यह रोग अचानक वेगपूर्वक आवेग के रूप में आता है। यदि पहले दौरे के बाद रोगी बच जाता है, तो दूसरा या तीसरा दौरा अधिक तीव्र और जल्दी आने की आशंका रहती है।
प्रारंभिक संकेत: दौरे से पहले रोगी को बेचैनी होती है और हृदय स्थान पर गुरुता (बोझ) महसूस होती है।
शारीरिक स्थिति: रोगी पसीने से लथपथ हो जाता है। चेहरा पीला पड़ जाता है और शरीर ठंडा होने लगता है।
सांस की तकलीफ: श्वास लेने में अत्यंत कष्ट (Dyspnea) होता है। कभी-कभी श्वास अवरोध के कारण मृत्यु की आशंका भी बनी रहती है।
अन्य लक्षण: आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, नाड़ी (Pulse) का सूक्ष्म या अत्यंत धीमा हो जाना और हृदय की धड़कन का अनियंत्रित होना।
हृदय शूल की चिकित्सा में धैर्य और शुद्ध औषधियों का मिश्रण अनिवार्य है।
तत्काल प्रबंधन (Emergency Management):
रोगी को पूर्णतः बिस्तर पर लिटा दें। मानसिक और शारीरिक हलचल बंद कर दें।
तीक्ष्ण सिरका सुंघाना: यह चेतना लौटाने में सहायक होता है।
बाह्य लेप: मृग (हिरण) के सींग को जल में घिसकर, उसमें नारायण तेल मिलाकर गर्म करें और हृदय स्थान पर लेप करें। इससे दर्द में तुरंत राहत मिलती है।
शास्त्रोक्त औषधियाँ:
श्रृंग भस्म प्रयोग: 125 मि.ग्राम भस्म को 6 ग्राम गाय के घी में मिलाकर धीरे-धीरे चटाएं।
बीजपूर रस योग: विजौरे नींबू का रस (5 ग्राम), यवक्षार (5 ग्राम) और शहद (5 ग्राम) मिलाकर चटाने से शमन होता है।
दशमूल प्रयोग: दशमूल के काढ़े में यवक्षार और सेंधा नमक मिलाकर सेवन करना हृदय के अवरोध को खोलता है।
हृदयार्णव रस: यह हृदय रोगों की सर्वोत्तम औषधि है। इसे त्रिफला (60 ग्राम) और मकोय (15 ग्राम) के क्वाथ (काढ़े) के साथ 125 मिलीग्राम की मात्रा में लें।
चिन्तामणि रस: 125 मि.ग्राम की एक मात्रा सुबह-शाम शहद के साथ लें और ऊपर से बला (बरियारा) की जड़ का काढ़ा पिएं।
यदि आप नियमित उपचार चाहते हैं, तो निम्नलिखित संयोजन अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है:
हृदय शक्ति कैप्सूल (1) + सूतशेखर रस (2 गोली) + विमटोन टैबलेट (2): इन तीनों को मिलाकर सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करें।
लिवो सिरप: पाचन को सुधारने के लिए 2-2 चम्मच भोजन के उपरांत लें।
आरोग्यवर्धिनी गुटिका: 2-2 गोली रात को सोते समय गुनगुने जल या दूध से लें (यह कोलेस्ट्रॉल और गैस को कम करती है)।
पथ्य (क्या खाएं - अमृत के समान):
अनाज: जौ या बाजरे की रोटी, पुराना चावल।
दालें: मूंग, मसूर या कुलथी की दाल।
सब्जियां: परवल, करेला, कच्चे पपीते की सब्जी।
फल: अंगूर, पका आम, पका पपीता, खिरनी, खजूर और नींबू।
अपथ्य (क्या न करें - विष के समान):
भोजन: भारी, चिकनाई युक्त (Oily), अम्लीय (खट्टा), नमकीन और मिर्च-मसालेदार भोजन।
विहार: अत्यधिक शारीरिक श्रम, व्यायाम, धूप में घूमना और अत्यधिक मैथुन।
मानसिक: चिंता और तनाव से पूर्णतः दूर रहें।
हृदय शरीर का सबसे कोमल और महत्वपूर्ण अंग है। किसी भी हृदय रोग में पूर्ण विश्राम और लघु (सुपाच्य) भोजन ही सबसे बड़ी दवा है। हृदय को शक्ति देने वाली औषधियों का प्रयोग चिकित्सक की देखरेख में निरंतर करना चाहिए।
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