किडनी की कार्यक्षमता में कमी (जीर्ण वृक्क पात) जैसी समस्याओं में बचाव ही सबसे बेहतर विकल्प होता है। यह व्याधि न केवल कष्टप्रद और जानलेवा है, बल्कि इसे नियंत्रित करना बहुत कठिन होता है और इसकी चिकित्सा में धन भी अधिक खर्च होता है।
गुर्दों की कार्यक्षमता का धीरे-धीरे कम होते जाना ही जीर्ण वृक्क पात कहलाता है। रक्त को छानने और शुद्ध करने वाले इस प्रकृति प्रदत्त अंग की एक बड़ी विशेषता यह है कि लगभग 90% क्षतिग्रस्त होने तक यह अपने कार्यों को सुचारू रूप से चलाता रहता है, यानी तब तक शरीर में कोई बाहरी समस्या उत्पन्न नहीं होती।
प्रकृति ने हमें यह अंग 'जोड़ी' (दो किडनी) के रूप में दिया है, शायद इसलिए कि मनुष्य अपने गलत आहार-विहार और आचार-विचार से होने वाली विकृति को सह सके।
शरीर के कटि प्रदेश (Lumbar region) में पीछे की तरफ मेरुदंड के दोनों ओर बैंगनी-भूरे रंग के उत्सर्जी अंग होते हैं जिन्हें गुर्दे या वृक्क (Kidneys) कहते हैं।
नेफ्रॉन्स (Nephrons): प्रत्येक किडनी में लगभग 10 लाख रचनात्मक इकाइयां होती हैं, जो रक्त को छानने और शुद्ध करने के यंत्र की तरह कार्य करती हैं।
विषाक्त तत्वों की सफाई: किडनी यूरिया, यूरिक एसिड और क्रिएटिनिन जैसे विषाक्त तत्वों और अतिरिक्त जल को रक्त से अलग कर शरीर से बाहर निकालती है।
इलेक्ट्रोलाइट संतुलन: सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम और फास्फोरस को संतुलित रखने का कार्य गुर्दों का ही है।
हार्मोंस का स्राव: गुर्दे विटामिन डी का सक्रिय प्रकार स्रावित करते हैं, जो कैल्शियम के संतुलन के लिए आवश्यक है।
तीव्र वृक्क पात (Acute Renal Failure): इसमें दिनों या हफ्तों में ही किडनी की क्षमता कम हो जाती है। इसके मुख्य कारण तीव्र उल्टी, दस्त, तेज बुखार या गुर्दों में विष फैल जाने से होने वाला शोथ (स्वेलिंग) है।
जीर्ण वृक्क पात (Chronic Renal Failure): यह धीरे-धीरे बढ़ने वाली समस्या है जिसका मुख्य कारण अनियंत्रित मधुमेह (Diabetes) और रक्तचाप (BP) होता है।
शुरुआत में कोई लक्षण नहीं दिखते, लेकिन धीरे-धीरे ये समस्याएं पैदा होती हैं:
मानसिक प्रभाव: यूरिया बढ़ने से सिरदर्द, नींद न आना और स्मरण शक्ति में कमी होने लगती है।
त्वचा और मांसपेशियां: कैल्शियम की कमी से मांसपेशियों में कमजोरी और फास्फोरस की कमी से त्वचा में कालापन और खुजली होती है।
हृदय गति: पोटेशियम के बढ़े हुए स्तर से हृदय गति अनियमित होने लगती है।
आपातकालीन लक्षण: अत्यधिक नींद आना, बेहोशी, छाती में दर्द, विश्राम की अवस्था में भी तीव्र श्वास चलना या तीव्र रक्तस्राव होना। ऐसी स्थिति में रोगी को तुरंत अस्पताल भर्ती करना चाहिए।
चूंकि शुरुआत में लक्षण नहीं होते, इसलिए जांच बहुत महत्वपूर्ण है:
पेशाब की जांच: पेशाब में 'एलब्युमिन' प्रोटीन की उपस्थिति किडनी क्षति का पहला इशारा है।
रक्त की जांच: क्रिएटिनिन और यूरिया के बढ़ते स्तर से कार्यक्षमता में कमी का पता चलता है। साथ ही हीमोग्लोबिन और लाल रक्त कोशिकाओं में कमी पाई जाती है।
अल्ट्रासोनोग्राफी (USG): इससे गुर्दों के आकार और पथरी का पता चलता है। जीर्ण वृक्क पात में गुर्दों का आकार कम होने लगता है।
यदि आप मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग या दर्द निवारक दवाओं (Painkillers) का नियमित सेवन करते हैं, तो आपको जोखिम अधिक है।
नियमित जांच: मधुमेह के रोगियों को यदि आंखों में समस्या हो, तो तुरंत गुर्दों की जांच करानी चाहिए।
त्वरित उपचार: उल्टी-दस्त या बुखार होने पर तुरंत नियंत्रण करें ताकि शरीर में जलीयांश की कमी न हो, जो गुर्दों को और क्षति पहुंचाती है।
आहार नियंत्रण: क्षतिग्रस्त गुर्दों पर बोझ न पड़े, इसके लिए विशेषज्ञ की सलाह पर आहार लें।
आयुर्वेदिक चिकित्सा बची हुई कार्यक्षमता को बचाए रखने में अत्यंत सहयोगी है:
वृक्क दोषान्तक वटी और सर्पोनिल वटी: 2-2 गोली सुबह-शाम पानी से लें।
वरुणादि क्वाथ और वृक्क दोषान्तक सिरप: भोजन के बाद 4-4 चम्मच एक कप पानी में मिलाकर लें।
चन्द्रप्रभा वटी (विशेष नं 1): इसकी 2-2 गोली सुबह-शाम लेने से विशेष लाभ होता है। जो लोग जोखिम में हैं, वे भी इसका नियमित सेवन कर बचाव कर सकते हैं।
निष्कर्ष: जीर्ण वृक्क पात का पूर्णतः ठीक होना कठिन है, इसलिए चिकित्सा का लक्ष्य रोग की गति को धीमा करना और उपद्रवों को नियंत्रित करना होता है। मधुमेह और उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण ही किडनी की सुरक्षा की सबसे बड़ी चाबी है।
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