आयुर्वेद के अनुसार, कैंसर (अर्बुद) केवल एक शारीरिक विकृति नहीं, बल्कि शरीर के सूक्ष्म स्रोतों, धातुओं और अग्नि के असंतुलन की चरम परिणति है। आधुनिक विज्ञान जहाँ इसे कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि मानता है, वहीं आयुर्वेद इसे 'त्रिदोषात्मक विष' मानता है, जो शरीर में संचित 'मल' और 'विष' (Toxins) के कारण उत्पन्न होता है।
आयुर्वेद के अनुसार रोगों की जड़ें हमारी जीवनशैली और आहार में होती हैं। कैंसर के मुख्य कारणों को तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
तम्बाकू आयुर्वेद की दृष्टि से एक तीक्ष्ण और विषैला द्रव्य है।
चबाना: जो लोग तम्बाकू चबाते हैं, उनके ओष्ठ (होठ), जिह्वा और कंठ के कोमल ऊतक लगातार प्रदाह (Inflammation) का शिकार होते हैं, जो कालांतर में कैंसर का रूप ले लेता है।
धूम्रपान: धुंआ सीधे फेफड़ों (फुफ्फुस) की प्राणवह स्रोतस को दूषित करता है।
धुंआ निगलना: यह आमाशय की श्लेष्मिक कला को नष्ट कर जठराग्नि को विकृत करता है, जिससे पेट का कैंसर होता है।
परिश्रम के अभाव में शरीर की चयापचय प्रक्रिया (Metabolism) सुस्त पड़ जाती है।
कफ वृद्धि और मंदाग्नि: शारीरिक श्रम न करने से कफ दोष बढ़ता है, जो जठराग्नि को मंद कर देता है।
मेद धातु का संचय: पसीना न आना इस बात का संकेत है कि मेद (Fat) का मल शरीर से बाहर नहीं निकल रहा है। यह अपक्व मेद (Saturated Fat/Cholesterol) रक्त वाहिनियों और अंगों में जमा होकर 'मार्ग-अवरोध' पैदा करता है।
अग्नि की न्यूनता का प्रभाव:
रक्ताग्नि मंदता: कुष्ठ, प्रदर और कामला जैसे रोग।
मांसाग्नि मंदता: अर्बुद (Tumors), गलगंड और ग्रंथियों की उत्पत्ति।
आधुनिक रासायनिक औषधियों का अंधाधुंध प्रयोग शरीर के रक्षा तंत्र को कमजोर कर देता है। जैसा कि कहा गया है, यदि आधुनिक औषधियां समुद्र में फेंक दी जाएं, तो मनुष्य बच सकते हैं लेकिन समुद्री जीव नष्ट हो जाएंगे। यह हमारे शरीर के भीतर के सूक्ष्म पारिस्थितिक तंत्र (Microbiome) पर रसायनों के घातक प्रहार को दर्शाता है।
आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है— "सर्वे रोगाः मंदाग्नौ" (सभी रोगों की जड़ मंद अग्नि है)।
जब हम दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या का पालन नहीं करते, तो शरीर में 'आम' (undigested toxins) जमा होने लगता है।
यह मल जब शरीर से बाहर नहीं निकल पाता, तो वह विषैला होकर कोशिकाओं के डीएनए (DNA) और उनकी प्रकृति को बदलने लगता है, जिसे कैंसर कहा जाता है।
कैंसर की चिकित्सा में आयुर्वेद केवल गांठ को नहीं काटता, बल्कि शरीर के आंतरिक वातावरण को शुद्ध करता है।
चिकित्सा का प्रथम चरण पंचकर्म है। शरीर में संचित वर्षों पुराने विषैले मलों को वमन, विरेचन, बस्ती आदि के माध्यम से बाहर निकालना अनिवार्य है।
आहार ही औषधि है। कैंसर की स्थिति में आहार पर कड़ा नियंत्रण आवश्यक है:
पूर्ण निषेध: नमक का पूर्णतः त्याग करें (नमक कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि में सहायक माना जाता है)।
मधु (Honey): शहद का प्रयोग करें, यह योगवाही है और औषधियों को सूक्ष्म स्तर तक पहुँचाता है।
पथ्य आहार: केवल गेहूं, चना, दूध, दलिया, मूंग, केला, साबूदाना और अनार का सेवन करें। अन्य सभी तामसिक और गरिष्ठ भोजन 'अपथ्य' (वर्जित) हैं।
आयुर्वेद में कैंसर के लिए गोमूत्र और दुर्लभ भस्मों का विशेष महत्व बताया गया है।
ताजा गोमूत्र (विशेषकर बछिया का) कैंसर के विरुद्ध एक महान औषधि है।
विधि: सुबह खाली पेट 100-200 मिलीग्राम (छानकर) लें।
बाह्य प्रयोग: यदि कैंसर बाहरी अंगों पर है, तो दशांग लेप को गोमूत्र में मिलाकर प्रभावित स्थान की सफाई करें।
अमाशय शुद्धि: 250 ग्राम दूध में 1 चम्मच अरंडी का तेल (Castor Oil) और 1 चम्मच 'पंच तिक्त घृत' मिलाकर दें। यह विरेचन का कार्य करता है।
सूजन और दर्द निवारण: पुनर्नवादि क्वाथ में गोघृत (गाय का घी) मिलाकर देने से शोथ (Inflammation) कम होता है।
सदाबहार (Vinca Rosea): इसके पत्तों और जड़ों में 'विनक्रिस्टिन' जैसे तत्व होते हैं जो कैंसर कोशिकाओं को रोकते हैं।
वंशलोचन और गंधक: एक तोला वंशलोचन और एक तोला शुद्ध गंधक को नीम के रस में घोंटकर छोटी गोलियां बनाकर देने से रक्त शुद्धि होती है।
जब व्याधि अत्यंत गंभीर हो, तब आयुर्वेद 'रस शास्त्र' की भस्मों का सहारा लेता है।
यह योग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाकर कैंसर की गांठों को गलाने में सहायक है।
सामग्री: भल्लान्तक चूर्ण (100g), नीम छाल (100g), सदाबहार पत्ता चूर्ण (100g), चिरायता (25g), शरपुंखा मूल (25g), गिलोय सत्व (25g)।
भस्म संयोजन: अभ्रक भस्म (सहस्त्र पुटी - 1g), हीरक भस्म (1g), स्वर्ण भस्म (2g), पन्ना पिष्टी (6g)।
निर्माण: इन सबको मिलाकर नीम के पत्तों के रस की भावना दें और 120 मिलीग्राम की गोलियां बना लें।
सेवन: सुबह, दोपहर, शाम।
सामग्री: हीरक भस्म (1g), अभ्रक भस्म (1000 पुटी - 4g), ताम्र भस्म (3g), गंधक रसायन (6g), चांदी भस्म (6g), मल्ल सिंदूर (3g), फौलाद भस्म (6g)।
सेवन: इसकी 50 पुड़िया बनाएं। प्रतिदिन एक पुड़िया शहद के साथ लें। ऊपर से ताजा कचनार क्वाथ का सेवन करें (कचनार ग्रंथियों को गलाने के लिए सर्वश्रेष्ठ है)।
प्रतिदिन एक गिलास जवारे का रस लें। इसमें मौजूद क्लोरोफिल रक्त को शुद्ध करता है और ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाता है, जिससे कैंसर कोशिकाएं पनप नहीं पातीं।
अंतराल: एक दवा देने के बाद दूसरी दवा देने में कम से कम 1 घंटे का अंतराल रखें।
अनुपान: दवाओं को सही अनुपान (शहद, जल या क्वाथ) के साथ ही लें।
शुद्धता: भस्म और औषधियां पूर्णतः शुद्ध और शास्त्रीय विधि से निर्मित होनी चाहिए।
कैंसर के विरुद्ध युद्ध में आयुर्वेद केवल शरीर का ही नहीं, बल्कि मन और आत्मा का भी उपचार करता है। प्राकृतिक जीवनशैली, शुद्ध आहार और दिव्य औषधियों के मेल से इस भयंकर व्याधि पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
विशेष चेतावनी: यह जानकारी केवल शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। कैंसर एक गंभीर रोग है, अतः किसी भी औषधि का सेवन करने से पहले एक योग्य और अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक (Vaidya) से परामर्श अवश्य लें।
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