वर्तमान समय में जब हमारी जीवनशैली तेज़, असंतुलित और तनावपूर्ण होती जा रही है, तब सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग हमारा पेट है। अनियमित भोजन, जंक फूड, देर रात तक जागना और शारीरिक श्रम की कमी—ये सभी कारण हमारे पाचन तंत्र को कमजोर करते हैं। परिणामस्वरूप गैस, एसिडिटी, पेट फूलना, कब्ज, आलस्य, त्वचा की समस्याएँ और यहाँ तक कि मानसिक तनाव भी जन्म लेने लगता है।
आयुर्वेद में कहा गया है —
“रोगाः सर्वे अपि मन्देऽग्नौ”
अर्थात् सभी रोगों की जड़ पाचन शक्ति की कमजोरी (मन्दाग्नि) है।
यही कारण है कि यदि आपकी अग्नि (digestive fire) ठीक है, तो आपका शरीर स्वस्थ रहेगा और रोग अपने-आप दूर रहेंगे।
आयुर्वेद के अनुसार शरीर की सारी गतिविधियों का मूल स्रोत अग्नि है। अग्नि केवल भोजन को पचाने तक सीमित नहीं, बल्कि यह शरीर में हर कोशिका के चयापचय (metabolism) को नियंत्रित करती है।
आचार्य चरक के अनुसार शरीर में 13 प्रकार की अग्नियाँ होती हैं —
एक जठराग्नि (मुख्य पाचन अग्नि)
पाँच भूताग्नियाँ
सात धात्वाग्नियाँ
इन सभी का संतुलन ही स्वास्थ्य का आधार है। जब जठराग्नि कमजोर हो जाती है, तो आम (अवांछित विषाक्त पदार्थ) बनता है, जो रोगों की जड़ है।
जब हमारा भोजन ठीक से पच नहीं पाता, तो अधपचा हिस्सा शरीर में जमा होकर “आम” बनाता है।
यह आम शरीर की नाड़ियों को बंद कर देता है और धीरे-धीरे रोग उत्पन्न करता है।
आम के लक्षण –
जीभ पर सफेद परत
शरीर में भारीपन
आलस्य और थकान
भूख न लगना
मुंह का स्वाद खराब रहना
पेट फूलना या गैस बनना
आयुर्वेद में कहा गया है –
“आमं विषं समाचक्षते” — अर्थात् आम विष के समान है।
इसलिए आम को नष्ट करना और अग्नि को प्रज्वलित रखना ही उपचार का मूल सिद्धांत है।
आधुनिक जीवनशैली में पाचन संबंधी विकार बहुत आम हो चुके हैं। कुछ प्रमुख समस्याएँ —
गैस और पेट फूलना (Aadhman)
कब्ज (Vibandh)
एसिडिटी या अम्लपित्त (Amlapitta)
भूख न लगना (Arochaka)
अपचन (Ajirna)
इन सभी के पीछे मूल कारण — मन्दाग्नि, गलत आहार, मानसिक तनाव, और दिनचर्या का अभाव।
आयुर्वेद पाचन सुधारने के लिए तीन मूल सिद्धांत बताता है —
अग्नि को प्रज्वलित करना — यानी पाचन शक्ति बढ़ाना।
आम को दूर करना — यानी शरीर से विषाक्त पदार्थों की सफाई।
सात्त्विक आहार और दिनचर्या अपनाना — यानी स्वस्थ जीवनशैली।
हरड़, बहेड़ा और आंवला — इन तीनों का सम्मिश्रण “त्रिफला” कहलाता है।
रात में सोने से पहले 1 चम्मच गुनगुने पानी के साथ लें।
यह कब्ज दूर करता है और पेट की सफाई में मदद करता है।
तीनों को समान मात्रा में भूनकर पाउडर बना लें।
खाने के बाद आधा चम्मच पानी के साथ लें।
गैस और भारीपन से तुरंत राहत देता है।
भोजन से पहले अदरक का छोटा टुकड़ा और नींबू का रस, थोड़ा नमक डालकर खाएँ।
यह अग्नि को उत्तेजित करता है और भूख बढ़ाता है।
रात को गुनगुने पानी के साथ 1 चम्मच लेने से पाचन सुधरता है, कब्ज कम होता है।
आंवला विटामिन-C का सबसे अच्छा स्रोत है।
यह अग्नि को संतुलित रखता है और आमाशय को शुद्ध करता है।
भोजन के बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में गुनगुना पानी पीने से भोजन अच्छे से पचता है और आम नहीं बनता।
नियमित समय पर भोजन करें।
अधिक तला-भुना, भारी या ठंडा भोजन न करें।
भोजन के बीच में पानी न पिएँ, केवल आवश्यकता अनुसार ही।
भोजन में मौसमी फल और सब्जियाँ शामिल करें।
सुबह खाली पेट गर्म पानी या नींबू पानी पिएँ।
रात में हल्का भोजन करें और सोने से 2 घंटे पहले।
तनाव को कम करें — क्योंकि मानसिक अशांति भी पाचन को प्रभावित करती है।
योग शरीर और मन दोनों को संतुलित करता है।
पाचन सुधारने वाले प्रमुख आसन:
पवनमुक्तासन
भुजंगासन
वज्रासन (भोजन के बाद 5–10 मिनट बैठना अत्यंत लाभकारी है)
अर्धमत्स्येन्द्रासन
प्राणायाम में —
अनुलोम-विलोम
कपालभाति
भ्रामरी
इनका नियमित अभ्यास पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है।
आज की आधुनिक चिकित्सा भी मानती है कि Gut ही हमारा दूसरा मस्तिष्क (Second Brain) है।
यदि आपका पाचन ठीक है, तो मानसिक स्थिति भी संतुलित रहती है।
आयुर्वेद इसे हजारों वर्ष पहले ही समझ चुका था।
“अग्नि” का संतुलन शरीर के हर तंत्र पर असर डालता है —
त्वचा की चमक
मानसिक स्पष्टता
ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक शक्ति
इसलिए आयुर्वेद के अनुसार “सर्वे रोगाः मन्देऽग्नौ” — हर रोग की जड़ कमजोर अग्नि है।
यदि आपको लम्बे समय तक निम्न समस्याएँ बनी रहती हैं —
लगातार कब्ज या गैस
पेट दर्द
अत्यधिक एसिडिटी
उल्टी या भूख न लगना
तो तुरंत किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लें।
स्वयं दवा न लें, क्योंकि हर व्यक्ति की प्रकृति (वात-पित्त-कफ) अलग होती है। सही निदान के अनुसार ही औषधि दी जानी चाहिए।
स्वस्थ पाचन शक्ति ही दीर्घायु और सुखद जीवन की कुंजी है।
आयुर्वेद हमें यह सिखाता है कि बीमारी से बचाव ही सबसे बड़ा उपचार है।
यदि आप नियमित रूप से अपने भोजन, दिनचर्या और मानसिक स्थिति पर ध्यान दें,
तो शरीर में अग्नि सुदृढ़ रहेगी और सभी रोग स्वतः दूर रहेंगे।
“पथ्यं सत्यम् हितं च यत् — वही आयुर्वेद का सार है।”
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