भैंसिया दाद, जिसे जनेऊ या अंग्रेज़ी में Herpes Zoster (Shingles) कहा जाता है, एक खतरनाक वायरल रोग है। यह Herpes Zoster Virus की वजह से होता है, जो त्वचा पर दर्दयुक्त, जलन भरे फफोले पैदा करता है। आमतौर पर यह बीमारी 40 वर्ष की आयु के बाद होने की संभावना अधिक रखती है।
हमारी किडनी (Kidney) शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है जो खून को फिल्टर, टॉक्सिन्स को बाहर निकालने और शरीर में द्रव (Fluid) का संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है। आज के समय में प्रदूषण, केमिकल युक्त भोजन, अनियमित दिनचर्या और खराब आदतों के कारण किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसलिए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किडनी की स्वच्छता (Kidney Detox) करना आवश्यक है। आयुर्वेद में कई ऐसे प्राकृतिक उपाय बताए गए हैं जिनसे आप घर पर ही किडनी को शुद्ध और स्वस्थ रख सकते हैं।
अर्श या बवासीर यह एक अत्यंत कष्टप्रद रोग है। जिंदगी को दूभर कर देने वाले इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के कष्ट का वर्णन करना कठिन कार्य है। मलद्वार के अंदर तीन वलि (आवर्त) होते हैं इनकी शिराएं जो श्लेष्मकला के भीतर रहती हैं विछिप्त हो जाने से यह रोग होता है ।पतली शिराओं का एक जाल मलाशय को भीतर चारों ओर से घेरे रहता है इन्हीं शिराओ में रक्त का संचय होकर फूलने से यह मस्से का रूप ले लेता है।
पक्षाघात शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। आंख का पक्षाघात, उंगलियों का पक्षाघात, जीभ का पक्षाघात, सीधे हाथ एवं पैर का पक्षाघात, वाम भाग का पक्षाघात, निम्नांग ( अर्धांग्न) का पक्षाघात, (इसमें कमर से नीचे के अंग रह जाते हैं) पक्षाघात में शरीर के अंग मुड़ जाते हैं ।अनेक बार मुड़ते नहीं हैं परंतु उनकी क्रियाशीलता नष्ट हो जाती है। अंगों में रक्त का संचार तो रहता है
कव्ज के सम्बन्ध में जनमानस की यह धारणा है कि यदि नित्य नियमित रूप से दो या तीन बार मल का त्याग न होगा तो उन्हें अनेक कष्ट होंगे, भोजन में अरुचि होगी, शरीर सुस्त रहेगा, पेट भारी रहेगा आदि-आदि। कभी -कभी तो मनुष्य में यह विचार भी उठने लगते हैं कि नियमित शौच न होने के कारण ही उन्हें अमुक रोग सता रहा है और शौच हो जाने से उनका रोग ठीक हो जायगा, यद्यपि यह बात कुछ अंश में
शरीर में अचानक ही विभिन्न स्थानों पर धीरे-धीरे सफेद चिन्ह निकलते निकलते पूरी तरह से फैलने लगते हैं यदि प्रारंभ में ही उपयुक्त उपचार नहीं किया जाता है तो यह रोग शरीर के समस्त चर्म को श्वेत चिन्हों के रूप में परिवर्तित कर देता है यह बहुत बड़ा रोग है और जड़ पकड़ने पर इसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता है इसका उपचार सरल नहीं है बल्कि दीर्घगामी है।
पायरिया रोग से ग्रस्त होने पर दांत ढीले होकर हिलने लग जाते हैं मसूड़े से मवाद और रक्त निकलने लगता है दांतों पर कड़ी पापड़ियां जम जाती है मुँह से दुर्गन्ध आने लगती है। उचित चिकित्सा न करने पर दाँत कमजोर होकर गिरने लगते हैं।
संपूर्ण उदर रोग यतः त्रिदोषज होते हैं अतः सर्वत्र वात आदि तीनों दोषों को शांत करने वाली क्रियाएं करनी चाहिए। उदर के दोष पूर्ण होने पर अग्निमांद्य हो जाता है अतः इस रोग में अग्नि प्रदीपक और लघु भोजन करना चाहिए। जौं, मूंग ,दूध ,आसव, अरिष्ट ,मधु आदि का इस रोग में उपयोग करना उत्तम है दोषोंके अति संचय से तथा स्रोतों के बंद हो जाने से उदर रोग पैदा होते हैं। अतः उदर रोगी को नित्य विरेचन देना चाहिये। विरेचन में गोमूत्र का अथवा दूध के साथ अरण्ड तेल का पान करना चाहिये।
उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर के ऊतक कमजोर पड़ने लगते हैं शरीर के विभिन्न जोड़ घिसने लगते हैं ऐसी स्थिति में जोड़ों में दर्द रहने लगता है भोजन के प्रति अरुचि होती है प्यास अधिक लगती है हाथ, पैर, जंघा, एड़ी तथा कमर आदि के जोड़ों में दर्द होने लगता है घुटनों में शोथ (सूजन) भी हो जाता है रोग बढ़ जाने पर चलने फिरते समय भयंकर कष्ट होता है बढ़ती उम्र के साथ जो गठिया होता है उसे आस्टियो आर्थराइटिस कहते हैं जोड़ों में सूजन या प्रदाह के कारण उत्पन्न गठिया को रियूमेटाइड आर्थराइटिस कहते
उच्च रक्तचाप का आयुर्वेदिक नाम शिरागत वात है| रक्त वाहनियों तथा धमनियों पर रक्त का अधिक दवाव पड़ना और उनका कठोर हो जाना शिरागत वात है | सामान्यतः रक्तचाप 120/80 मि.मी.पारा होता है इसमें 10मि.मी. पारे की घटत बढ़त भी सामान्य ही समझना चाहिए| यह 2 प्रकार का होता है - (1) उच्च रक्त चाप ( HIGH B.P.) (2) न्यून रक्त चाप ( LOW B.P.)
मानव शरीर में पेट जैसे मह्त्बपूर्ण अंग जिसका सम्बन्ध प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में अधिकांश रोगों से होता है ,की देखरेख अतिआवश्यक है | अगर पेट रोग से आप पीड़ित हैं तो न तो आप खाने का आनन्द ले सकते हैं और न ही सही जीवन जीने का | क्योकि सम्पूर्ण धातुओं का निर्माण एवं पोषण -पाचन अग्नि पर निर्भर होता है और अगर शरीर में खानपान के दुष्प्रभाव स्वरुप अग्नियां प्रभावित होती हैं तो सामान्य से गंभीर पेट के विकार हो सकते हैं |
हमारे शरीर में स्थित मुट्ठी के आकार का ह्रदय एक मिनट में 70 बार धड़कता है और एक घंटे में ३०० लीटर रक्त शरीर के अंग प्रत्यंग में प्रसारित करता है | ह्रदय का मुख्य कार्य रक्त को शुद्ध कर के शरीर के प्रत्येक हिस्से में रक्त की आपूर्ति करना है | जब रक्तप्रवाह में रुकावट आती है तो ह्रदय को अपना कार्य करने में कठिनाई होती है। रक्तप्रवाह में अवरोध आने के कारण कुछ मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं,जिससे तीव्र वेदना होती है और अन्य लक्षण उत्पन्न होते हैं|स्वयं ह्रदय को दो छोटी-छोटी धमनियों से थोड़ा रक्त मिलता है |
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