विकासशील देशों में आज भी कई ऐसी बीमारियाँ हैं जो आधुनिक चिकित्सा की उपलब्धता के बावजूद जनसामान्य को प्रभावित कर रही हैं। आंव की बीमारी उन्हीं में से एक है। यह बीमारी देखने में सामान्य दस्त जैसी लग सकती है, किंतु यदि समय रहते इसका सही उपचार न किया जाए तो यह शरीर को अंदर से कमजोर कर सकती है।
आंव केवल पेट की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पाचन तंत्र की गहरी कमजोरी, आंतों की क्षति, रक्त व पोषक तत्वों की हानि तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति में कमी का संकेत देती है।
आयुर्वेद में कहा गया है—
“रोगाः सर्वे अपि मंदेऽग्नौ”
अर्थात सभी रोगों की जड़ मंद अग्नि (कमजोर पाचन शक्ति) है।
आंव की बीमारी में मल के साथ चिपचिपा, स्रावी पदार्थ (श्लेष्मा या म्यूकस) निकलता है। कभी यह सफेद या पीले रंग का होता है तथा कुछ रोगियों में इसमें रक्त भी मिला हो सकता है।
रोगी को बार-बार शौच की इच्छा होती है, परंतु मल बहुत कम मात्रा में निकलता है और शौच के बाद भी संतुष्टि नहीं मिलती।
आयुर्वेद के अनुसार आंव की उत्पत्ति का मूल कारण अग्निमांद्य है।
जब पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है तो भोजन पूर्ण रूप से नहीं पचता। यह अधपचा भोजन "आम" कहलाता है।
यही आम आगे चलकर—
आंव के प्रमुख कारण हैं—
यह परजीवी आंतों की भीतरी परत को क्षति पहुंचाता है जिससे—
जब आंव के साथ—
तो इस अवस्था को प्रवाहिका कहा जाता है।
| आंव | पेचिश |
|---|---|
| मल में श्लेष्मा | मल में श्लेष्मा और रक्त |
| हल्की मरोड़ | तीव्र मरोड़ |
| कम दर्द | अधिक दर्द |
| प्रारंभिक अवस्था | अपेक्षाकृत गंभीर अवस्था |
बच्चों में आंव तेजी से शरीर को कमजोर कर सकती है क्योंकि—
लंबे समय तक आंव रहने पर—
जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
यदि निम्न में से 3 या अधिक लक्षण हों तो आंव की संभावना हो सकती है—
यह रोग की गंभीरता, आहार और उपचार पर निर्भर करता है।
महत्वपूर्ण: आम रहते हुए ग्राही औषधियों का प्रयोग उचित नहीं माना गया है।
लाभ:
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लाभ:
शहद के साथ सेवन।
योग्य वैद्य की सलाह से।
सौंफ उबालकर बनाया गया जल लाभकारी माना जाता है।
पुरानी आंव में केवल दस्त रोकना पर्याप्त नहीं होता। पाचन शक्ति को मजबूत करना, आम का नाश करना और आंतों को बल देना आवश्यक माना गया है।
पुरानी आंव में कुटज, बिल्व, नागकेशर तथा पंचामृत पर्पटी जैसे योग अनुभवी वैद्य की देखरेख में उपयोग किए जाते हैं।
सफेद आंव सामान्यतः श्लेष्मा की अधिकता का संकेत हो सकती है।
आयुर्वेद में—
जैसी औषधियों का उल्लेख मिलता है।
छाछ या दही के साथ सेवन।
तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लें यदि—
हाँ, दूषित भोजन और पानी से फैल सकती है।
पका हुआ केला सामान्यतः लाभकारी माना जाता है।
अमीबायसिस आंव का एक प्रमुख कारण हो सकता है।
हाँ, यदि कारणों को दूर न किया जाए तो पुनः हो सकती है।
लंबे समय तक रहने पर वजन घट सकता है।
यह लेख केवल शैक्षिक एवं जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी औषधि, रस, भस्म या वटी का सेवन योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से ही करें।
आंव कोई साधारण रोग नहीं है, बल्कि पाचन तंत्र की गहरी समस्या का संकेत हो सकता है। यदि समय पर उचित आयुर्वेदिक चिकित्सा, संतुलित आहार, स्वच्छ जीवनशैली और सही दिनचर्या अपनाई जाए तो इससे राहत प्राप्त की जा सकती है।
आयुर्वेद का सिद्धांत है — रोग को दबाओ नहीं, जड़ से समझो और दूर करो।
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