कैसे जीतें आंव की बीमारी से

Jan 08, 2026
घरेलू नुस्खे
कैसे जीतें आंव की बीमारी से

भूमिका : आंव – एक छोटी दिखने वाली, पर गंभीर बीमारी

विकासशील देशों में आज भी कई ऐसी बीमारियाँ हैं जो आधुनिक चिकित्सा की उपलब्धता के बावजूद जनसामान्य को प्रभावित कर रही हैं। आंव की बीमारी उन्हीं में से एक है। यह बीमारी देखने में सामान्य दस्त जैसी लग सकती है, किंतु यदि समय रहते इसका सही उपचार न किया जाए तो यह शरीर को अंदर से खोखला कर देती है।

आंव केवल पेट की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पाचन तंत्र की गहरी कमजोरी, आंतों की क्षति, रक्त व पोषक तत्वों की हानि और रोग प्रतिरोधक शक्ति के क्षय का संकेत देती है।

आयुर्वेद में कहा गया है—

“रोगाः सर्वे अपि मंदेऽग्नौ”
अर्थात् सभी रोगों की जड़ मंद अग्नि (कमजोर पाचन) है।


आंव की बीमारी क्या है?

आंव की बीमारी में मल के साथ चिपचिपा, स्रावी पदार्थ (आंव) निकलता है। कभी यह सफेद या पीला होता है, तो कभी इसमें खून भी मिला हो सकता है। रोगी को बार-बार शौच की इच्छा होती है, परंतु मल बहुत थोड़ी मात्रा में निकलता है और शौच के बाद भी संतुष्टि नहीं मिलती।

आयुर्वेदिक नाम

  • आमातिसार

  • प्रवाहिका

आधुनिक नाम

  • Amoebic Dysentery

  • Amoebiasis


आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से आंव की उत्पत्ति

आयुर्वेद के अनुसार आंव की उत्पत्ति का मूल कारण है अग्निमांद्य

अग्निमांद्य क्या है?

जब हमारी पाचक अग्नि (Digestive Fire) कमजोर हो जाती है, तब खाया हुआ भोजन पूरी तरह नहीं पच पाता। यह अधपचा भोजन आम कहलाता है।

यही आम आगे चलकर—

  • आंतों में सड़ता है

  • श्लेष्मा बनाता है

  • मल को चिपचिपा करता है

  • और आंव के रूप में बाहर निकलता है


आधुनिक चिकित्सा के अनुसार कारण

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, आंव का प्रमुख कारण है—

  • दूषित पानी

  • गंदा भोजन

  • अस्वच्छ हाथ

  • खुले में शौच

इन कारणों से Entamoeba histolytica नामक परजीवी आंतों में प्रवेश करता है। यह परजीवी आंतों की भीतरी परत को नुकसान पहुँचाता है, जिससे—

  • श्लेष्मा निकलता है

  • खून आता है

  • मरोड़ और दर्द होता है


प्रवाहिका (पेचिस) क्या है?

जब आंव के साथ-साथ—

  • बार-बार मल आए

  • मल थोड़ी मात्रा में हो

  • शौच के बाद भी अधूरापन रहे

तो इस स्थिति को प्रवाहिका कहते हैं।


प्रवाहिका के विस्तृत लक्षण

प्रारंभिक लक्षण

  • पेट में भारीपन

  • भूख न लगना

  • जीभ पर मैल

  • हल्की मरोड़

मध्यम अवस्था

  • बार-बार शौच

  • मल में आंव

  • शौच के समय जोर लगाना

  • पेट में ऐंठन

गंभीर अवस्था

  • खून मिश्रित मल

  • तेज कमजोरी

  • शरीर में पानी की कमी

  • चक्कर आना

  • बच्चों में गुदभ्रंश


बच्चों में आंव – एक गंभीर समस्या

बच्चों में आंव बहुत तेजी से शरीर को कमजोर कर देती है क्योंकि—

  • उनका शरीर छोटा होता है

  • पानी की कमी जल्दी हो जाती है

  • पोषण की हानि अधिक होती है

लंबे समय तक आंव रहने पर बच्चों में—

  • कुपोषण

  • एनीमिया

  • विकास रुक जाना

  • गुदभ्रंश

जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।


आंव की पहचान कैसे करें? (Self-Check)

यदि नीचे दिए गए 5 में से 3 लक्षण हों, तो आंव की संभावना है—

  1. दिन में 5–10 बार शौच

  2. मल में चिपचिपा पदार्थ

  3. शौच के बाद भी असंतोष

  4. पेट में मरोड़

  5. कमजोरी व प्यास


आयुर्वेदिक चिकित्सा का मूल सिद्धांत

आयुर्वेद में प्रवाहिका की चिकित्सा तीन चरणों में की जाती है—

चरण 1: आमपाचन

  • कच्चे आम को पचाना

  • अग्नि को प्रज्वलित करना

चरण 2: दोष शमन

  • विशेष रूप से वात व कफ का शमन

चरण 3: ग्राही चिकित्सा

  • जब आम समाप्त हो जाए

  • तब मल को बांधने वाली औषधियाँ

⚠️ महत्वपूर्ण नियम:
आम रहते हुए ग्राही औषधि देना रोग को और बिगाड़ सकता है।


आंव की बीमारी का आयुर्वेदिक उपचार (विस्तृत)

1️⃣ सोंठ (सुष्ठी) और छाछ

  • सोंठ को घी में भूनें

  • छाछ के साथ लें

लाभ:

  • आमपाचन

  • मरोड़ में राहत

  • पाचन शक्ति बढ़ती है


2️⃣ सौंफ-सोंठ-मिश्री चूर्ण

विधि:

  • आधी सौंफ कच्ची

  • आधी सौंफ भुनी

  • सोंठ चूर्ण

  • मिश्री पाउडर

गर्म पानी से सेवन करें।

लाभ:

  • आंव नाशक

  • गैस व ऐंठन में राहत


3️⃣ ईसबगोल की भूसी

  • दही या दूध के साथ

लाभ:

  • आंतों को शांति

  • मल को सही आकार


4️⃣ कुटज, बिल्व, सौंफ, जीरक चूर्ण

  • समान मात्रा

  • चावल के मांड के साथ

लाभ:

  • प्रवाहिका का श्रेष्ठ उपचार


5️⃣ पंचामृत पर्पटी योग

  • पंचामृत पर्पटी – 250 mg

  • आमपाचक रस – 500 mg

  • प्रवाल पंचामृत – 250 mg

  • बिल्व चूर्ण – 6 ग्राम

  • शहद के साथ

लाभ:

  • पुरानी प्रवाहिका

  • कमजोर आंतों में विशेष उपयोगी


6️⃣ रक्त मिश्रित मल में

  • नागकेशर

  • लोध्र

  • स्फटिक भस्म

या

  • रक्तपित्तकुलकण्डन रस


7️⃣ अत्यधिक प्यास में

  • सौंफ उबालकर पानी


8️⃣ अत्यधिक दस्त (विशेष अवस्था)

  • पके केले में अल्प मात्रा में अफीम
    ⚠️ केवल वैद्य की देखरेख में


9️⃣ आयुर्वेदिक वटी

  • कुटजादि वटी

  • कुटजघन वटी

  • जातिफलादि वटी

  • आमपाचक वटी


? आम की गुठली का अनुभूत प्रयोग

  • आम की गुठली – 3 भाग

  • सोंठ – 1 भाग

  • जीरा – 1 भाग

  • काला नमक – 1 भाग

  • छाछ/दही के साथ

यह प्रयोग वर्षों से सिद्ध है।


आहार-विहार (Pathya-Apathya)

क्या खाएं?

  • छाछ

  • मूंग दाल

  • चावल का मांड

  • अनार

  • सेब

  • पतली खिचड़ी

क्या न खाएं?

  • तला-भुना

  • मसालेदार

  • बासी भोजन

  • मिठाइयाँ

  • कोल्ड ड्रिंक


आंव से बचाव के उपाय

  • उबला या फ़िल्टर पानी

  • हाथ धोने की आदत

  • स्वच्छ भोजन

  • खुले में शौच से बचाव

  • पाचन मजबूत रखें


निष्कर्ष: आंव से जीत निश्चित है

आंव कोई साधारण रोग नहीं, बल्कि अग्नि की चेतावनी है। यदि समय रहते सही आयुर्वेदिक चिकित्सा, संतुलित आहार, और स्वच्छ जीवनशैली अपनाई जाए, तो यह रोग जड़ से समाप्त हो सकता है।

आयुर्वेद कहता है — रोग को दबाओ नहीं, जड़ से निकालो।

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