स्वास्थ्य केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि शरीर, मन और आत्मा – तीनों का संतुलन ही वास्तविक स्वास्थ्य है। आधुनिक युग में तेज़ रफ्तार जीवन, तनाव, अनियमित खान-पान और प्रकृति के नियमों की अवहेलना ने मनुष्य को समय से पहले बूढ़ा और रोगग्रस्त बना दिया है। आज 35–40 वर्ष की आयु में ही लोग जोड़ों के दर्द, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, त्वचा की झुर्रियाँ और मानसिक थकान से जूझने लगते हैं।
आयुर्वेद इस समस्या का समाधान केवल दवाइयों में नहीं, बल्कि जीवनशैली के सुधार में देखता है। आयुर्वेद कहता है कि यदि मनुष्य ऋतु, प्रकृति और अपनी शारीरिक बनावट के अनुसार जीवन जिए, तो वह सौ वर्ष या उससे अधिक आयु तक भी स्वस्थ, ऊर्जावान और सक्रिय रह सकता है। यह लेख उसी आयुर्वेदिक दृष्टिकोण को व्यवस्थित, वैज्ञानिक और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करता है।
आयुर्वेद के अनुसार बुढ़ापा उम्र से नहीं, बल्कि गलत आदतों से आता है। जो व्यक्ति हर समय तनाव, चिंता और असंतुलित जीवन में रहता है, वह जल्दी बूढ़ा हो जाता है।
आयुर्वेदिक सिद्धांत:
“असमय बूढ़ा वही होता है, जो हर क्षण तनाव में रहता है।”
ऋतु के विपरीत भोजन
अत्यधिक भोजन या बिल्कुल न खाना
बार-बार भोजन करना
बासी, तला-भुना, फास्ट-फूड
पचने से पहले पुनः भोजन
खाली पेट सोना
दिन में अधिक सोना
रात्रि जागरण
व्यायाम का अभाव
अत्यधिक परिश्रम या पूर्ण आलस्य
असंयमित जीवनशैली
तनाव, चिंता, भय
क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या
मानसिक अस्थिरता और नकारात्मक सोच
आयुर्वेद में तीन मानसिक दोषों को शरीर के तीन दोषों से जोड़ा गया है—
काम (असंयम) → वात दोष बढ़ाता है
क्रोध → पित्त दोष को कुपित करता है
लोभ → कफ दोष को विकृत करता है
जब ये तीनों बढ़ते हैं, तो शरीर में रोग और बुढ़ापा तेजी से प्रवेश करता है।
समाधान: संयम, संतोष और मानसिक स्थिरता।
आयुर्वेद के अनुसार शरीर तीन दोषों से संचालित होता है—
वात – गति, श्वसन, स्नायु तंत्र
पित्त – पाचन, ताप, बुद्धि
कफ – बल, स्थिरता, स्नेह
जब वात, पित्त और कफ सम अवस्था में रहते हैं, तब मनुष्य स्वस्थ रहता है।
इनमें से किसी एक के भी असंतुलन से रोग उत्पन्न होता है। इसलिए—
प्रकृति अनुसार भोजन
ऋतु अनुसार दिनचर्या
संयमित जीवन
अत्यंत आवश्यक है।
आयुर्वेद में हरड़ को “अभया” कहा गया है।
एक प्रसिद्ध उक्ति है—
“जिसकी मां नहीं होती, उसकी मां हरड़ होती है।”
पाचन तंत्र को मजबूत करती है
शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालती है
त्रिदोष संतुलित करती है
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है
ग्रीष्म ऋतु – गुड़ के साथ
वर्षा ऋतु – सेंधा नमक के साथ
शरद ऋतु – आंवला चूर्ण के साथ
हेमंत ऋतु – सोंठ के साथ
शिशिर ऋतु – पीपल चूर्ण के साथ
शीत ऋतु – शहद के साथ
? प्रतिदिन सुबह 2 नग छोटी हरड़ का सेवन करने से रोग शरीर के पास नहीं आते और आयु वृद्धि होती है।
आयुर्वेद में दीर्घायु के लिए कुछ सरल लेकिन शक्तिशाली नियम बताए गए हैं—
दिन में केवल दो बार भोजन
बाईं करवट सोना
दिन-रात में 6 बार मूत्र त्याग
2 बार मलत्याग
60 वर्ष के बाद भोजन में 30–50% कटौती
इन नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति दीर्घायु और निरोग रहता है।
योग आयुर्वेद का अभिन्न अंग है।
तनाव और चिंता कम होती है
पाचन और रक्तसंचार सुधरता है
मन स्थिर रहता है
बुढ़ापा धीमा पड़ता है
प्राणायाम
ध्यान
हल्के योगासन
नियमित पैदल चलना
आयुर्वेद में भोजन को छह रसों में बांटा गया है—
मधुर
अम्ल
लवण
कटु
कषाय
तिक्त
सभी रसों का संतुलित सेवन शरीर को पूर्ण पोषण देता है।
विटामिन-C और E
→ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं
→ त्वचा और अंगों को युवा रखते हैं
हृदय और नाड़ियों के लिए श्रेष्ठ
धमनियों की कठोरता रोकता है
विटामिन-C का भंडार
नियमित सेवन से बुढ़ापा धीमा होता है
रक्तवाहिनियों को स्वस्थ रखता है
त्वचा की झुर्रियाँ कम करता है
ग्रीष्म ऋतु छोड़कर सभी ऋतुओं में उपयोगी
गर्मी में नीम की कोपलें
अन्य ऋतुओं में तुलसी की 10 पत्तियाँ
रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है
गाय का दूध + घी
शरीर पुष्ट
आयु और ओज में वृद्धि
बसंत ऋतु में 1 माह सेवन
शहद/घी/दूध के साथ
गंभीर और पुराने रोगों में उपयोगी
गाजर का रस – वृद्धावस्था में भी युवाओं जैसी शक्ति
शहद – बुढ़ापे के कष्ट दूर करता है
दही – जरानाशक, पौरुष शक्ति बनाए रखता है
प्रतिदिन स्नान से पूर्व तेल से मालिश करने से—
त्वचा कांतिमान होती है
शरीर पुष्ट होता है
स्नायु मजबूत होते हैं
बुढ़ापा दूर रहता है
सुबह उठते ही – स्वच्छ जल
भोजन के बाद – मठा
रात को सोने से पहले – दूध
इन नियमों का पालन करने वाले व्यक्ति को वैद्य के पास कम जाना पड़ता है।
गेहूं के जवारे के रस को आयुर्वेद में ग्रीन ब्लड कहा गया है।
घर में गमलों में गेहूं उगाएँ
6 इंच होने पर रस निकालें
सुबह खाली पेट आधा से एक कप पिएँ
रक्त से लगभग 20% समानता
सफेद बाल काले होने में सहायक
झुर्रियाँ कम होती हैं
त्वचा तेजस्वी बनती है
शरीर बलवान और ऊर्जावान होता है
आयुर्वेद केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति है। यदि मनुष्य—
संतुलित आहार
नियमित दिनचर्या
मानसिक स्थिरता
आयुर्वेदिक रसायन
को अपनाता है, तो वह न केवल रोग-मुक्त रहता है, बल्कि बुढ़ापा भी असमय नहीं आता।
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