भूख शरीर की प्राकृतिक पुकार है। जब भूख लगती है और भोजन नहीं किया जाता, तो जठराग्नि को आहार नहीं मिलता।
ऐसी स्थिति में अग्नि पहले दोषों (वात-पित्त-कफ) को जलाती है, फिर धातुओं को और अंत में प्राणशक्ति को नष्ट करने लगती है।
इससे शरीर में टूटन, अरुचि, आलस्य, आँखों की कमजोरी और बल-क्षय होता है।
निष्कर्ष:
भूख लगने पर भोजन करना ही स्वास्थ्य का पहला नियम है।
नियत समय पर भोजन करने से शरीर की अग्नि एक अनुशासित लय में कार्य करती है।
पहले भोजन को पचाने के बाद अग्नि स्वयं अगले भोजन के लिए तैयार हो जाती है।
अनियमित भोजन से अग्नि भ्रमित हो जाती है।
समय का पालन = अच्छी पाचन शक्ति
यदि बिना भूख के भोजन किया जाए, तो अग्नि कमजोर रहती है।
ऐसा भोजन अधपचा रहकर—
• सिरदर्द
• अजीर्ण
• दस्त
• उल्टी
• विशूचिका जैसे रोग उत्पन्न करता है
भूख के बिना भोजन = रोगों का आमंत्रण
भूख लगने के बाद भोजन देर से करने पर वायु दोष बढ़ जाता है।
वायु अग्नि को नष्ट कर देती है, जिससे बाद में खाया गया भोजन कठिनता से पचता है।
ऐसे व्यक्ति को अगली बार भूख भी ठीक से नहीं लगती।
भूख को टालना उतना ही हानिकारक है जितना बिना भूख के खाना
भोजन पचने के लक्षण—
• शरीर हल्का लगे
• उत्साह बना रहे
• शुद्ध डकार आए
• भूख-प्यास स्पष्ट हो
• मल-मूत्र ठीक से हो
जब ये लक्षण हों और भोजन का समय भी हो, तो अवश्य भोजन करना चाहिए।
आयुर्वेद कहता है—
• 2 भाग ठोस अन्न
• 1 भाग जल
• 1 भाग वायु के लिए खाली
यदि पेट पूरा भर दिया जाए तो—
• गैस
• भारीपन
• अपचन
• आलस्य
थोड़ा कम खाना = दीर्घ जीवन
• बहुत गर्म भोजन → बल नाश
• बहुत ठंडा भोजन → कफ वृद्धि
• सूखा भोजन → कठिन पाचन
• बासी/दूषित भोजन → विष समान
ताजा, गुनगुना और स्वच्छ भोजन ही श्रेष्ठ है
• कम भोजन → कमजोरी, कुपोषण
• अधिक भोजन → पेट फूलना, सुस्ती, नींद
मध्यम मात्रा ही स्वास्थ्य का आधार है
हर व्यक्ति की—
• प्रकृति
• पाचन शक्ति
• ऋतु
• स्थान
अलग होती है।
जो भोजन किसी को लाभ दे, वही दूसरे को हानि पहुँचा सकता है।
सबके लिए एक ही भोजन नियम नहीं होता
जल्दी खाने से—
• दाँत का काम आँतों को करना पड़ता है
• भोजन देर से पचता है
अच्छी तरह चबाया भोजन—
• शीघ्र पचता है
• अधिक पोषण देता है
पाचन मुख से शुरू होता है
आयुर्वेद में—
• सुबह
• शाम
दो समय भोजन उत्तम बताया गया है।
रात में देर से भोजन करने से अजीर्ण होता है।
लेकिन—
• भारी श्रम करने वाले
• तेज अग्नि वाले
बीच में हल्का पौष्टिक भोजन ले सकते हैं।
प्यास लगने पर जल न पीने से—
• गला सूखता है
• कान बंद होते हैं
• हृदय में पीड़ा होती है
प्यास शरीर का चेतावनी संकेत है
• प्यास में बिना जल भोजन → गुल्म रोग
• भूख में बिना भोजन जल → जलोदर
भूख और प्यास दोनों का अलग-अलग सम्मान करें
• पहले जल → अग्नि मंद
• बाद में जल → कफ वृद्धि
• बीच-बीच थोड़ा जल → अग्नि दीपक
सही समय पर जल अमृत है
न अधिक जल, न बिल्कुल न पीना—
दोनों ही अपचन का कारण बनते हैं।
संतुलन ही स्वास्थ्य है
भोजन ऐसी जगह करना चाहिए जहाँ—
• शोर-शराबा न हो
• भीड़-भाड़ न हो
• मन शांत रहे
आयुर्वेद में कहा गया है कि भोजन, निद्रा और मैथुन जैसे कर्म एकांत में करने से शरीर उन्हें पूर्ण रूप से ग्रहण करता है।
एकांत में किया गया भोजन शीघ्र पचता है
भोजन करते समय—
• मोबाइल
• झगड़ा
• चिंता
• क्रोध
• ईर्ष्या
इन सबसे दूर रहना चाहिए।
मानसिक अशांति से जठराग्नि मंद हो जाती है और भोजन ठीक से नहीं पचता।
शांत मन = उत्तम पाचन
सदैव एक ही रस का अधिक सेवन रोग उत्पन्न करता है—
• अधिक मीठा → मोटापा, प्रमेह
• अधिक खट्टा → खुजली, पीलिया
• अधिक नमकीन → बाल झड़ना, नेत्र रोग
• अधिक तीखा → जलन, मूर्छा
• अधिक कड़वा/कसैला → दुर्बलता
सभी रस संतुलन में हों
भोजन से पहले थोड़ा सा अदरक + सेंधा नमक—
• जठराग्नि को प्रज्वलित करता है
• जीभ और कंठ की शुद्धि करता है
• भोजन में रुचि बढ़ाता है
यह एक श्रेष्ठ आयुर्वेदिक दीपक उपाय है
अच्छी तरह पके फल—
• हल्के
• शीघ्र पचने वाले
• पौष्टिक
होते हैं, इसलिए भोजन के साथ लिए जा सकते हैं।
कच्चे या अधिक पके फल अपचन करते हैं।
फल की अवस्था बहुत महत्वपूर्ण है
मसाले—
• पाचन को सुधारते हैं
• स्वाद बढ़ाते हैं
लेकिन अधिक मसाले—
• आंतों को क्षति
• जलन
• अम्लता
पैदा करते हैं।
मसाला औषधि है, अति विष है
आयुर्वेदिक भोजन क्रम—
1️⃣ पहले मीठा
2️⃣ बीच में खट्टा व नमकीन
3️⃣ अंत में तीखा, कड़वा या कसैला
इस क्रम से—
• सभी रस सही से पचते हैं
• दोष संतुलित रहते हैं
अधिकतर भोजन—
• खट्टा
• नमकीन
• तीखा
होता है, जिससे पित्त बढ़ता है।
भोजन के अंत में दूध लेने से—
• पित्त शांत होता है
• जलन नहीं होती
विशेषकर गर्म प्रकृति वालों के लिए उपयोगी
भोजन का सही क्रम—
• पहले रोटी, साग (कठोर)
• फिर दाल, भात (नरम)
• अंत में दूध/छाछ (तरल)
क्योंकि—
कठोर पहले, तरल अंत में पाचन को सरल बनाता है
• मूंग जैसे पदार्थ हल्के होते हैं
• पर अधिक मात्रा में भारी बन जाते हैं
उड़द, पिसे अन्न, पकौड़े—
• स्वभाव से भारी होते हैं
कम भूख वालों को ऐसे पदार्थों से बचना चाहिए।
रूखा-सूखा भोजन—
• अग्नि को कमजोर करता है
• कब्ज उत्पन्न करता है
यदि साथ में—
• दूध
• छाछ
• मठा
लिया जाए तो पाचन सुधरता है।
दोपहर मठा, शाम दूध श्रेष्ठ
दाँतों में अन्न अटकने से—
• बदबू
• कीड़े
• मसूड़ों की बीमारी
होती है।
इसलिए सुबह-शाम भोजन के बाद मंजन आवश्यक है।
भोजन के बाद—
• दुखद बातें
• अत्यधिक हँसी
• चिंता
से बचना चाहिए।
मन की अवस्था सीधे पाचन को प्रभावित करती है।
यदि व्यक्ति—
• पेशाब
• शौच
• पवन
के वेग रोकता है,
अधिक जल पीता है,
रात को जागता है—
तो हल्का भोजन भी नहीं पचता।
भोजन के तुरंत बाद सोने से—
• कफ बढ़ता है
• अग्नि नष्ट होती है
ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर यह वर्जित है।
पहले पाचन, फिर निद्रा
भोजन के तुरंत बाद—
• भारी परिश्रम
• दौड़ना
• व्यायाम
हानिकारक है।
लेकिन धीरे-धीरे लगभग 100 कदम टहलना—
• पाचन सुधारता है
• पेट में गैस नहीं बनने देता
• गर्दन, घुटनों और कमर को सुख देता है
मंद गति = श्रेष्ठ पाचन
आयुर्वेद के अनुसार जठराग्नि नाभि के ऊपर बाईं ओर स्थित मानी गई है।
इसलिए भोजन के बाद बाईं करवट लेटना—
• पाचन में सहायक
• अग्नि को बल देता है
यही कारण है कि बाईं करवट सोना श्रेष्ठ बताया गया है।
भोजन के बाद—
• केवल बैठे रहना → आलस्य
• दौड़ना → हानि
• धीरे चलना → दीर्घायु
भोजन के बाद धीमी चाल अमृत समान है
भोजन के बाद—
• मधुर वार्ता
• मनोहर संगीत
• सुगंधित पुष्प
• इत्र आदि
का सेवन करने से मन प्रसन्न रहता है और
प्रसन्न मन में पाचन तेज होता है।
भोजन के बाद कम से कम 1 घंटे तक—
❌ मैथुन
❌ धूप में घूमना
❌ आग तापना
❌ अधिक बोलना
❌ झगड़ा
❌ कसरत
❌ अधिक जल पीना
इनसे बचना चाहिए।
पाचन को एकाग्रता चाहिए
यदि कोई व्यक्ति—
• परिश्रम
• यात्रा
• भारी काम
के तुरंत बाद भोजन या जल पी लेता है,
तो—
• बुखार
• उल्टी
• आम दोष
उत्पन्न हो सकता है।
पहले शरीर को शांत करें, फिर भोजन करें।
भोजन के बाद तुरंत—
• व्यायाम
• मैथुन
से शरीर की ऊर्जा पाचन से हट जाती है,
जिससे—
• अपचन
• कमजोरी
• रोग
उत्पन्न होते हैं।
अत्यधिक—
• ठंडा भोजन → कफ, गैस
• गर्म भोजन → दस्त, जलन
उत्पन्न करता है।
मध्यम तापमान का भोजन सर्वोत्तम है।
कसरत या भारी श्रम से थका व्यक्ति यदि तुरंत भोजन करता है,
तो शरीर उसे पचा नहीं पाता।
पहले विश्राम, फिर भोजन।
भोजन करते समय—
• टेढ़ा बैठना
• बार-बार उठना-बैठना
से पाचन बाधित होता है।
स्थिर और सम आसन में भोजन करें
भोजन के बाद—
• सीधे लेटना → शक्ति
• बाईं करवट → दीर्घायु
• दौड़ना → हानि
बताया गया है।
थोड़ी देर विश्राम पाचन में सहायक है।
भोजन के बाद कम से कम 1 घंटा—
❌ व्यायाम
❌ मैथुन
❌ दौड़
❌ पढ़ना-लिखना
❌ अधिक जल सेवन
न करें।
यह समय केवल पाचन के लिए है।
• कुछ ऋतुओं में दही वर्जित है
• रात में दही नहीं खाना चाहिए
यदि लेना ही हो तो—
• नमक
• जल
मिलाकर लें।
दही लाभकारी—
• हिचकी
• श्वास
• बवासीर
• अतिसार
दही हानिकारक—
• ज्वर
• रक्तपित्त
• कुष्ठ
• पीलिया
• मिर्गी
रोग के अनुसार दही सेवन करें।
• क्षीण ज्वर, अतिसार → गाय के दूध का झाग
• संग्रहणी → पका आम + गाय की छाछ
ये पाचन को स्थिर करते हैं।
• दूध के बाद पान → हानिकारक
• अन्य भोजनों के बाद पान → लाभकारी
भोजन के अंत में दूध पीना स्वास्थ्यवर्धक है।
इन 46 आयुर्वेदिक भोजन सूत्रों का पालन करने से—
✔ जठराग्नि सुदृढ़
✔ दोष संतुलन
✔ रोगों से रक्षा
✔ दीर्घ और स्वस्थ जीवन
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