रोग-निवारण के आयुर्वेदिक सिद्ध प्रयोग

Dec 05, 2025
घरेलू नुस्खे
रोग-निवारण के आयुर्वेदिक सिद्ध प्रयोग

आयुर्वेद में अनेक ऐसे अनुभूत सिद्ध प्रयोग हैं जिन्हें वर्षों के अनुभव, अनुसंधान और चिकित्सीय परीक्षाओं के बाद परम प्रभावशाली माना गया है। ये उपचार न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि कई पुरानी और जटिल व्याधियों से स्थायी राहत भी प्रदान करते हैं।
नीचे जुकाम, उच्च रक्तचाप, पेट के रोग, शय्यामूत्र, मूत्र अवरोध और दाँत दर्द के लिए आयुर्वेदिक सिद्ध प्रयोग दिए गए हैं।


(1) जुकाम का आयुर्वेदिक सिद्ध उपचार

जुकाम बार-बार क्यों होता है?

आयुर्वेद के अनुसार, जुकाम का प्रमुख कारण है —

  • पाचन तंत्र में दोष

  • खट्टे, अम्लीय, तैलीय व मीठे खाद्यों का अत्यधिक सेवन

  • तेज मसाले, नमक, मिठाइयाँ, फास्ट फूड

  • दूषित रसधातु → एलर्जी, अस्थमा, ब्रॉन्कियल समस्याएँ

एलोपैथी में जुकाम से स्थायी राहत संभव नहीं, जबकि नीचे दिया गया आयुर्वेदिक योग अत्यंत प्रभावकारी है।


जुकाम हेतु सिद्ध आयुर्वेदिक योग

सभी औषधियों को बराबर मिलाकर 40 पुड़िया बना लें:

  • रस माणिक्य— 20 ग्राम

  • महालक्ष्मी विलास — 5 ग्राम

  • अभ्रक भस्म (सहस्रपुटित) — 2 ग्राम

  • लघु वसंतमालती — 5 ग्राम

  • वृहत श्रृंगाराभ्रक रस — 10 ग्राम

  • प्रवाल पिष्टि — 10 ग्राम

  • तालीसादि चूर्ण — 50 ग्राम

  • पुष्करमूल चूर्ण — 50 ग्राम

 1-1 पुड़िया सुबह-शाम मधु के साथ लें।


सहायक उपचार

  • 1️⃣ दशमूलारिष्ट और द्राक्षारिष्ट

    • दोनों के 2–2 चम्मच लें।

    • बराबर मात्रा में दुगुना जल मिलाएँ।

    • भोजन के बाद सेवन करें।


    2️⃣ अगस्त्य हरितकी

    • 1 चम्मच रात को लें।

    • इसके साथ 1 गिलास उष्ण जल (गुनगुना पानी) पिएँ।


    3️⃣ दूध + पीपली (Pippali) उपचार

    • अगस्त्य हरितकी के बाद
      ¼ पाव (लगभग 125ml) गर्म गोदुग्ध (गाय का दूध) पिएँ।

    • दूध में 2 बड़ी पीपलियाँ उबालकर पिएँ।

    पित्त प्रकृति वाले व्यक्तियों को

    • 2 की जगह 1 छोटी पीपली उबालकर लें।


(2) उच्च रक्तचाप (High BP) का सिद्ध प्रयोग

लंबे समय से BP की दवाएँ ले रहे मरीजों के लिए यह अत्यंत लाभकारी उपाय है।

जटामांसी प्रयोग

  • जटामांसी — 300 ग्राम
    → 30 भाग कर लें।

सेवन विधि

  • 10 ग्राम जटामांसी रात को 100 ग्राम पानी में भिगो दें

  • सुबह मसलकर छानें

  • 2 चम्मच मधु मिलाकर पिएँ

 60 दिनों में BP सामान्य होने लगता है।
 लंबे समय के लिए स्थायी लाभ।


(3) पेट के रोगों के लिए सिद्ध आयुर्वेदिक योग

(क) जीर्ण प्रवाहिका / Chronic Amebic Dysentery

  • सत ईसबगोल — 3 ग्राम

  • जीरा — 1 ग्राम

  • इलायची खुर्द — ½ ग्राम

  • इंद्रजो कड़वा — 2 रत्ती

  • कुड़ासक — 1 ग्राम

 सुबह-शाम पानी से लें
 गैस अधिक हो तो मस्तगी मिलाएँ


(ख) गैस, जलन एवं अपच

  • सूखा चूना

  • ग्वारपाठा (एलोवेरा) रस

 दोनों को घोंटकर 2-2 रत्ती की गोलियाँ बनाएँ
 2–3 बार सेवन करें

 पेट से संबंधित अनेक समस्याओं में तुरंत लाभ देता है।


(4) शय्यामूत्र (Bed Wetting) का उपचार

बच्चों व बड़ों दोनों में प्रभावकारी।

उपाय

  • उड़द की खड़ी दाल — 1 मुट्ठी

  • रात को भिगो दें

  • सुबह पानी निकालकर चीनी मिलाएँ

  • चबा-चबा कर सेवन करें

 1 महीने में आदत समाप्त होने लगती है।


(5) पेशाब रुक जाना (Urinary Retention)

शीघ्र प्रभाव वाला लेप

  • शीशम की पत्ती — 50 ग्राम

  • सांभर नमक — 10 ग्राम
    → पेडू पर लेप लगाएँ

 10–20 मिनट में पेशाब खुल जाता है।


(6) दाँत दर्द का आयुर्वेदिक घरेलू नुस्खा

  • खड़ी सोंठ को शिला पर घिसकर लेप बनाएँ

  • गुनगुना करके गाल पर बाहर से लगाएँ

  • 4–5 घंटे तक रहने दें

 तेज दाँत दर्द में तुरंत आराम
⚠ मुँह के अंदर न लगाएँ।

(7) आधाशीशी (Migraine / आधे सिर का दर्द)

उपाय:

  • टंकण (फुला सुहागा) — 3 ग्राम

  • घी + शक्कर के साथ

  • सुबह 5 बजे एक खुराक चाटें

  • 3 दिनों तक प्रतिदिन प्रातः सेवन करें

इससे आधाशीशी का दर्द पूर्णत: शांत हो जाता है।


(8) कान का दर्द (Ear Pain – बिना फोड़े-फुंसी)

उपाय:

  • ऑक (आकड़ा) के पके पत्ते लें

  • एक ओर थोड़ा-सा घी लगाएँ

  • हल्का गरम करें (शरीर के तापमान अनुसार)

  • उसका रस निकालकर कान में डालें

 दर्द तुरंत शांत हो जाता है।


(9) दाँतों में पानी लगना / ठंडा लगना

उपाय:

  • पलास (खोकड़ा) की कोमल टहनी की दातौन करें

  • दाँत के पास इसका रस पहुँचाएँ

 1–2 बार के प्रयोग से टीस समाप्त।


(10) रक्तप्रदर (White Discharge with Blood)

उपाय:

  • पुराने कम्बल की ऊन की भस्म — 3–4 रत्ती

  • शहद के साथ दिन में तीन बार चाटें

 एक ही दिन में स्पष्ट लाभ।


(11) रक्तार्श (Bleeding Piles)

(क) नीम के बीज (निबोली) प्रयोग

  • नीम की 10–15 निबोली की गिरी

  • पीसकर गोली बनाएँ

  • दूध के साथ दिन में एक बार, 5–7 दिन

 हल्का सुपाच्य भोजन करें।
 रक्तार्श में उत्तम लाभ।

(ख) रसौत + दही प्रयोग

  • रसौत चूर्ण — 3 ग्राम

  • ताज़ा दही — 50 ग्राम

  • 3–5 दिन, भोजन से पहले, दिन में एक बार

 रक्तार्श में स्थायी लाभ।
 सुपाच्य भोजन लेना आवश्यक।


(12) यकृत् रोग (Enlarged Liver – विशेषकर बच्चों में)

उपाय:

  • नागफनी / थूहर का कच्चा गूदा — 1 तोला (लगभग 10 ग्राम)

  • 3–5 दिन प्रतिदिन प्रातः खिलाएँ

 बच्चों का बढ़ा हुआ लीवर 7–8 दिनों में ठीक होने लगता है।
 खटाई और भारी भोजन बिल्कुल न दें।


(13) आँव के दस्त (Mucus Diarrhea)

उपाय:

  • ठंडे फीके दूध में ½ नींबू का रस मिलाकर पिएँ

 1–2 बार के सेवन से दस्त बंद हो जाते हैं।
 मीठी चीज़ें न दें।


(14) दाँत का दर्द (Dental Pain)

उपाय:

  • काले मरवे के पत्ते चबाएँ

 दाँत-दाढ़ का दर्द शांत।


(15) मुँह के छाले (Mouth Ulcers)

(अ) चमेली के पत्ते

  • पत्ते चबाने से छाले ठीक हो जाते हैं।

(ब) बकरी के दूध की सीड़

  • मुँह के छालों पर लगाने से तुरंत आराम।


CONCLUSION – आयुर्वेदिक सिद्ध प्रयोग क्यों अपनाएँ?

  • प्राकृतिक

  • सुरक्षित

  • बिना दुष्प्रभाव

  • वर्षों से परीक्षित

  • जड़ों से रोगों का निवारण

इन उपचारों का नियमित, संयमित और सही आहार-विहार के साथ पालन करने पर रोगों से स्थायी मुक्ति संभव है।

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