कोष्ठबद्धता या कब्ज
कव्ज के सम्बन्ध में जनमानस की यह धारणा है कि यदि नित्य नियमित रूप से दो या तीन बार मल का त्याग न होगा तो उन्हें अनेक कष्ट होंगे, भोजन में अरुचि होगी, शरीर सुस्त रहेगा, पेट भारी रहेगा आदि-आदि। कभी -कभी तो मनुष्य में यह विचार भी उठने लगते हैं कि नियमित शौच न होने के कारण ही उन्हें अमुक रोग सता रहा है और शौच हो जाने से उनका रोग ठीक हो जायगा, यद्यपि यह बात कुछ अंश में ठीक है। परंतु आयुर्वेद में एक सूत्र है कि- मल के आश्रित शरीर का बल है और बल के आधार पर जीवन स्थित है। यदि मल (पुरीष, मूत्र, स्वेद) का क्षय होगा तो जीवन (जीवित रहने ) का क्षय होगा। इन मुख्य तीन मलों के धारण से शरीर शक्तिशाली होता है। और यदि इनके धारण की शक्ति का नाश होगा तो जीवन का भी नाश हो जाएगा। आयुर्वेद का दूसरा सूत्र है कि मल के क्षय से बल का क्षय होगा और बल के क्षय से प्राण का अंत होगा।
कारण
कब्ज का कारण पित्त की विकृति है पित्त की उत्पत्ति की मात्रा अल्प होने से भोजन का पाचन नहीं होता और भोजन के न पचने पर भोजन में आमत्व उत्पन्न होता है आमयुक्त भोजन का उत्तम विश्लेषण नहीं होता और अविश्लेषित भोजन आंतों में चिपकता है। ग्रहणी की शक्ति को क्षीण करता है। आंतों की सामान्य गति के अवरुद्ध हो जाने से विबन्ध (कव्ज) उत्पन्न होता है।
पित्त की मात्रा में अल्पता का कारण शरीर में आलस्य या आरामतलबी है। आप जितना शारीरिक परिश्रम करेंगे उसी अनुपात से पित्त की उत्पत्ति होगी। इस हेतु परिश्रम ऐसा होना चाहिए जिसमें भरपूर पसीना आए। श्वास् और प्रश्वास तेज हो ऐसी क्रिया से रक्त कण R. B.C. टूटते हैं और यकृत में छनकर पित्त को बनाते हैं। यकृत में पित्त की मात्रा अधिक होने पर यह स्वाभाविक रूप से यकृत से बाहर आकर भोजन को उत्तम प्रकार से पचाता है। सावुन के रूप में बना यह उत्तम पदार्थ आंतों को इस तरह निर्मल कर देता है जैसे साबुन कपड़े को साफ करता है। अतः आंतों के लिए पित्त ही उत्तम साबुन है बचपन में परिश्रम की क्रिया अधिक होती है अतः बचपन में कब्ज कम होता है। यौवनावस्था में परिश्रम कुछ शिथिल पड़ता है तो कब्ज़ ज्यादा होता है और वृद्धावस्था में परिश्रम अत्यंत शिथिल होता है अतः कब्ज बहुत अधिक होता है जो व्यक्ति इस तथ्य को समझ कर सामर्थानुसार परिश्रम करते हैं उनका जीवन सुखी रहता है।
परिश्रम के अतिरिक्त खट्टे भोज्य पदार्थ, सेंधा नमक, और मिर्चा, काली मिर्च, यदि भोजन के साथ लिया जाए तो परिश्रम के गुण में सोने में सुगंध जैसा लाभदायक होता है । कटु अम्ल और लवण को आग्रेय कहा गया है।
कब्ज के अन्य कारणों में कई रोग भी हैं ज्वर की अवस्था में पाचन क्रिया का ह्रास होता है। अतः आंतों में स्थित भोजन सूख कर कब्ज पैदा करता है। पित्ताशय और पित्त वाहिनी शोध,(Holits Holangitis) पांडू (Analmia) कामला (Jaundice) आदि यकृत के रोगों में उग्र प्रकार का कब्ज होता है। आंत्र कृमि (Worm) और रक्तचाप वृद्धि (High bood presure) आदि में भी कब्ज होता है। पाचन संस्थान में मुख से प्रारंभ होकर क्रमशः पेट, ग्रहणी, छोटी आंत, बड़ी आंत ,मलाशय , या गुदा आदि में विकृति के कारण उन अंगों के स्राव में ह्रास होता है तो भी कब्ज उत्पन्न होता है।
कब्ज के लक्षण
यदि एक दिन रात बीतने पर मल त्याग का वेग न हो तो उसे कब्ज कहा जा सकता है। इसके साथ अन्न में अरुचि, उदर में भारीपन, बार-बार अपान वायु का निकलना, मूत्र त्याग का बार-बार वेग होना इत्यादि कब्ज के लक्षण हैं। कब्ज के कारण मन में मलीनता रहती है ,साहस तथा उत्साह नहीं होता ।आलस्य होता है
निवारण
(1) सर्वप्रथम पाचन संस्थानके प्रत्येक अङ्ग पर ध्यान देना चाहिये। मुख में दाँत स्वस्थ हैं और भोजन की चर्वण क्रिया सामान्य है या नहीं। भोजन के उचित चर्वण से भोजन में लालास्राव का पर्याप्त मिश्रण होता है तो कब्ज नहीं होता। पर्याप्त चर्वण करने से भोजन में लालास्राव की क्षारीयता भोजन
को जलीय घोल में परिणत कर देती है और भोजन फल के रस के समान स्वादिष्ट तथा सुपाच्य हो जाता है। कब्ज दूर करनेके लिये यह अत्यन्त आवश्यक है। पुनः आमाशय पर ध्यान देना चाहिये। भोजन आमाशय में पाँच या छः घंटे में पचता है। इस अवधि में प्यास लगने पर शुद्ध पेय जल को उबालकर गुनगुना पीना चाहिये। इसके अतिरिक्त छै घंटे तक कोई भी वस्तु कदापि नहीं खानी चाहिये। पान, चाय आदि भी कव्ज पैदा करते हैं। उदाहरणार्थ- आपने एक पात्र में दाल पकाने को रखा। दाल पकाने में लगभग 2 घंटे का समय लगता है परंतु यदि पकती हुई इस दाल के पात्र में हर 15 मिनट पर बार-बार थोड़ी-थोड़ी दाल डालते जाएंगे तो पहले की दाल के साथ मिलकर बार-बार डाली गई दाल, न तो पकने देगी और न ही बाद में डाली गई दाल पकेगी ।पाक भ्रष्ट हो जाएगा इस प्रकार पेट भी एक पात्र है उसमें एक बार पकने को रखे भोजन में पांच या 6 घंटे के बीच जल के अतिरिक्त अन्य कुछ भी डालने से कब्ज होगा।
आमत्व उत्पन्न होगा और पाक बिगड़ जाएगा अस्तु भोजन खूब चबा चबाकर करना चाहिए और भोजन के बाद थोड़ी देर विश्राम करना चाहिए लगभग 6 घंटे तक उबले जल के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं लेना चाहिए। भोजन के पच जाने पर सामान्यतः सात या 8 घंटे बाद दूसरी बार भोजन करना चाहिए ।भोजन के उपरांत दिन में शयन करना अनुचित है इससे जुकाम नजला होने का डर रहता है भोजन के बाद दिन में आराम से टहलने घूमने, अपना कार्य करने वाले की आयु लंबी और रोग रहित होती है। रात्रि भोजन करने के बाद प्राय दो-तीन घंटे शयन नहीं करना चाहिए। इस बीच टहलना ,घूमना सर्वोत्तम है, अथवा अपनी रुचि के अनुसार सद् ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। रात्रि में शयन काल 6 या 7 घंटे होना चाहिए। प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व आसमान में उष: किरणों के फैलते समय घर के बाहर शुद्ध वायु वाले खुले मैदान में टहलना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि प्रातः काल शौचादि से निवृत्त होकर सूर्योदय से पूर्व एक घंटा तक अपनी शक्ति के अनुसार तेजी से खुली हवा में उत्तम पवित्र स्थान यथा नदी तट, उत्तम राजमार्ग, या विस्तृत उपवन आदि में टहलने से कब्ज दूर होता है।
(2) कब्ज में लाभ के लिए उषा पान करना चाहिए। ताम्रपात्र में रखा हुआ रात्रि का जल ऊषा काल में इच्छा अनुसार शयन से उठते ही शौचादि से पूर्व लेने का विधान है।
(3) कब्ज का एक बड़ा कारण अजीर्ण है। तथा खूब जोर से भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। और तृप्ति से पूर्व ही भोजन समाप्त करना चाहिए।
(4) रात्रि में शयन के पूर्व उबला हुआ गरम पानी पीने से कब्ज दूर होता है।
(5) तिल रहित सूखे मेवे तथा किशमिश, मुनक्का अंजीर खजूर छुहारा आदि का सेवन कब्ज नाशक है।
(6)। ताजी तुरंत तोड़कर मिलने वाले सभी ऋतु फल आम जामुन अमरुद से अनार संतरा पपीता मुसम्मी नींबू वाला केला चीकू शरीफ और तथा बल आदि फलों को खाने से कब्ज नष्ट होता है हफ्तों तक तोड़ कर रखे फल उचित लाभ प्रदान नहीं करते।
(7)। ऋतुओं में मिलने वाली साग सब्जियों का प्रयोग करने से भी पाचन उत्तम होता है और कब्ज समाप्त हो जाता है।
(8)। कई घंटे तक बैठकर लगातार कार्य करने से भी कब्ज होता है अतः एक घंटा काम करने के पश्चात 5 मिनट तक टहलना घूमना और मन बदलने से मानसिक शक्ति बढ़ती है कब्ज नहीं होता और अर्श, बवासीर, (पाईल्स) नहीं होते।
(9)। योगासन तथा प्राणायाम कब्ज विनाश करने में आश्चर्यजनक लाभ करते हैं ।आसनों में सर्पासन, धनुरासन, ताड़ासन पद्मासन, बध्द- पद्मासन ,चक्रासन ,सर्वांगासन आदि उत्तम हैं ।उत्तम स्थान पर बैठकर लंबी गहरी सांस अंदर लेने और बाहर निकलने से भी लाभ होता है।
(10)। तनाव की स्थिति में किया हुआ भोजन अजीर्ण पैदा करता है और पोषण के विपरीत कुपोषण विषाक्त उत्पन्न करता है अर्थात ईर्ष्या, भय, क्रोध ,आदि मानसिक तनाव की स्थिति में किया गया भोजन का सम्यक पाचन नहीं होता।
(11)। हरितकी ,हरण ( छोटी या बड़ी) , अमलतास फल का गूदा, कुटकी यह सभी कब्ज नाशक हैं।
कब्ज की उत्पत्ति का मुख्य कारण उधर में रूक्षता (खुश्की) है। और दस्तावर दवा देने से प्राय रूक्षता बढ़ती है । अस्तु दस्तावर दवा देने के पहले उदर को चिकना करना उचित है आयुर्वेद के मतानुसार कब्ज के रोगी को एक दो या तीन दिन तक नित्य रात्रि में एक चम्मच अरंड का तेल थोड़े गरम दूध में मिलाकर शयन के पूर्व देना चाहिए ,और कोष्ठ शुद्ध होने पर विरेचन का प्रयोग करना चाहिए।
एक उत्तम योग
बैतरा, सोंठ ,छोटी पिपल्ली, हल्दी, बायबिडंग, बच, छोटी हरण, प्रत्येक का सम भाग लेकर चूर्ण बना लें, उसमें काला नमक एवं गु चम्मचड निश्चित अनुपात में मिलाकर गोली बनाकर नित्य रात्रि में 3 दिन, 5 दिन ,या 7 दिन तक एक-एक गोली लेने से कब्ज हमेशा के लिए ठीक हो जाता है।
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