अण्डकोष वृद्धि (Hydrocele) शास्त्रीय आयुर्वेद में वर्णित एक गंभीर किन्तु प्रारंभिक अवस्था में पूर्णत: उपचार योग्य रोग है। इसे आम जीवन में “पोटों में पानी भरना” कहते हैं।
जब किसी कारणवश वृषण-कोष में स्थित झिल्ली (Tunica Vaginalis) में अत्यधिक द्रव उत्पन्न होने लगता है या शरीर इस द्रव को पुनः अवशोषित नहीं कर पाता, तो अण्डकोष धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।
यह सूजन आरम्भ में बिना दर्द की हो सकती है परंतु समय के साथ:
सूजन बढ़कर भारीपन में बदल जाती है
चलने, उठने, बैठने में तकलीफ
दर्द और खिंचाव
शारीरिक थकावट
मानसिक तनाव, डर और शर्म
जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।
कुछ रोगियों में वृषण इतना लटक जाता है कि सामान्य जीवन, नौकरी, श्रम, विवाहिक जीवन सभी प्रभावित हो जाते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार यह रोग मुख्यतः वात-कफ विकार, द्रव-संचय (Shotha) और लसीका तंत्र की अवरोधता के कारण होता है।
वृषण-क्षेत्र के चारों ओर कई परतें होती हैं:
स्क्रोटल त्वचा
डार्टोस मांसपेशी
ट्यूनिका वेजाइनलिस (जिसमें द्रव जमा होता है)
ट्यूनिका अल्बुजिनिया (वृषण की कठोर परत)
सामान्य स्थिति में ट्यूनिका वेजाइनलिस बहुत कम और आवश्यक द्रव बनाती है, जो वृषण को हिलने-डुलने में सहायता करता है।
लेकिन जब यह द्रव अत्यधिक मात्रा में बनने लगे या इसका पुनः-अवशोषण रुक जाए, तो हाइड्रोसील बनता है।
आयुर्वेद + आधुनिक चिकित्सा के अनुसार हाइड्रोसील बनने की मुख्य 3 प्रक्रियाएँ हैं:
किसी चोट, संक्रमण या सूजन के कारण झिल्ली द्रव बनाने लगती है।
लसीका-नलिकाएँ (Lymphatic Channels) कमजोर या अवरुद्ध होने पर द्रव बाहर नहीं निकलता।
कुछ लोगों में पेट की झिल्ली और अण्डकोष के बीच छोटा सा रास्ता (Patent Processus Vaginalis) खुला रह जाता है जिससे द्रव नीचे आता है।
अण्डकोष पर हल्की चोट भी अंदर सूजन की प्रक्रिया शुरू कर सकती है।
लंबे समय तक सीट का दबाव Micro-trauma पैदा करता है जिससे द्रव बनना बढ़ जाता है।
भारत में हाइड्रोसील का सबसे बड़ा कारण यही है।
फाइलेरिया के कीड़े लसीका-नलिकाएँ बंद कर देते हैं।
इनसे पेट में दबाव बनता है और द्रव नीचे वृषण में उतर आता है।
लगातार सम्भोग से वृषण पर खिंचाव बढ़ता है जो सूजन बनाता है।
जोर लगाने से पेट का द्रव अण्डकोष की तरफ खिंचता है।
वृषण की संरचना को कमजोर करता है जिससे सूजन बनती है।
Epididymo-orchitis
Bacterial infection
Viral infection
ये सभी हाइड्रोसील को जन्म दे सकते हैं।
कई बच्चों में जन्म से ही पेट-कोष का रास्ता बंद नहीं होता।
दिल, किडनी, लीवर की कमजोरी में भी हाइड्रोसील बन सकता है।
धीरे-धीरे अण्डकोष बढ़कर बहुत बड़ा भी हो सकता है।
रोगी को हमेशा नीचे वजन जैसा महसूस होता है।
हल्का
मध्यम
कभी-कभी तेज खिंचाव वाला दर्द
लंबे समय तक चलने पर दर्द बढ़ जाता है।
रोगी स्वयं को कमज़ोर, भद्दा या असहज महसूस करता है।
आयुर्वेद में अण्डवृद्धि का उपचार शोथ-नाशक, वात-कफ शामक, द्रव-संचार (Lymphatic system) सुधारक सिद्धांत पर आधारित है।
सूजन और द्रव निर्माण कम करती है।
पुराने और बड़े हाइड्रोसील में अत्यंत प्रभावी।
दर्द, भारीपन और सूजन में राहत।
रक्त व लसीका तंत्र को शुद्ध करती है।
सभी दवाओं को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें।
½ चम्मच सुबह-शाम त्रिफला क्वाथ या हरितकी क्वाथ के साथ लें।
दर्द व लालिमा कम
प्रतिदिन बाँधें
सूजन उतरती है
द्रव निर्माण धीमा
हल्का गर्म करके बाँधें
द्रव बाहर खिंचने में मदद
प्राकृतिक द्रव-शोषक
लंगोट के साथ अधिक प्रभावी
त्रिफला रात्रि में लें।
सुई से द्रव निकालना — अस्थायी, फिर से भर जाता है।
स्थायी समाधान — पूर्ण सुरक्षित प्रक्रिया।
हाइड्रोसील शुरुआती अवस्था में आयुर्वेद से पूरी तरह नियंत्रित और समाप्त किया जा सकता है।
पहले चरण के रोग में दवाएँ, लेप, लंगोट, और उचित आहार-विहार चमत्कारिक लाभ देते हैं।
परंतु यदि सूजन बहुत बड़ी हो चुकी हो, दर्द तीव्र हो, या फाइलेरिया शामिल हो, तो आधुनिक शल्य-चिकित्सा उचित विकल्प हो सकती है।
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