अण्डकोष वृद्धि (हाइड्रोसील) के कारण, लक्षण एवं आयुर्वेदिक उपचार |

Nov 30, 2025
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
अण्डकोष वृद्धि (हाइड्रोसील) के कारण, लक्षण एवं आयुर्वेदिक उपचार |

 

परिचय (Extended Introduction)

अण्डकोष वृद्धि (Hydrocele) शास्त्रीय आयुर्वेद में वर्णित एक गंभीर किन्तु प्रारंभिक अवस्था में पूर्णत: उपचार योग्य रोग है। इसे आम जीवन में “पोटों में पानी भरना” कहते हैं।

जब किसी कारणवश वृषण-कोष में स्थित झिल्ली (Tunica Vaginalis) में अत्यधिक द्रव उत्पन्न होने लगता है या शरीर इस द्रव को पुनः अवशोषित नहीं कर पाता, तो अण्डकोष धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।

यह सूजन आरम्भ में बिना दर्द की हो सकती है परंतु समय के साथ:

  • सूजन बढ़कर भारीपन में बदल जाती है

  • चलने, उठने, बैठने में तकलीफ

  • दर्द और खिंचाव

  • शारीरिक थकावट

  • मानसिक तनाव, डर और शर्म

जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।

कुछ रोगियों में वृषण इतना लटक जाता है कि सामान्य जीवन, नौकरी, श्रम, विवाहिक जीवन सभी प्रभावित हो जाते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार यह रोग मुख्यतः वात-कफ विकार, द्रव-संचय (Shotha) और लसीका तंत्र की अवरोधता के कारण होता है।


 हाइड्रोसील की शारीरिक संरचना (Ayurvedic & Modern Anatomy)

वृषण-क्षेत्र के चारों ओर कई परतें होती हैं:

  • स्क्रोटल त्वचा

  • डार्टोस मांसपेशी

  • ट्यूनिका वेजाइनलिस (जिसमें द्रव जमा होता है)

  • ट्यूनिका अल्बुजिनिया (वृषण की कठोर परत)

सामान्य स्थिति में ट्यूनिका वेजाइनलिस बहुत कम और आवश्यक द्रव बनाती है, जो वृषण को हिलने-डुलने में सहायता करता है।

लेकिन जब यह द्रव अत्यधिक मात्रा में बनने लगे या इसका पुनः-अवशोषण रुक जाए, तो हाइड्रोसील बनता है।


 हाइड्रोसील कैसे बनता है? (Pathophysiology)

आयुर्वेद + आधुनिक चिकित्सा के अनुसार हाइड्रोसील बनने की मुख्य 3 प्रक्रियाएँ हैं:

1. द्रव निर्माण की अधिकता

किसी चोट, संक्रमण या सूजन के कारण झिल्ली द्रव बनाने लगती है।

2. द्रव के अवशोषण में कमी

लसीका-नलिकाएँ (Lymphatic Channels) कमजोर या अवरुद्ध होने पर द्रव बाहर नहीं निकलता।

3. पेट की गुहा से जुड़ाव (Communicating Hydrocele)

कुछ लोगों में पेट की झिल्ली और अण्डकोष के बीच छोटा सा रास्ता (Patent Processus Vaginalis) खुला रह जाता है जिससे द्रव नीचे आता है।


 हाइड्रोसील होने के विस्तृत कारण

1️⃣ चोट (Trauma)

अण्डकोष पर हल्की चोट भी अंदर सूजन की प्रक्रिया शुरू कर सकती है।

2️⃣ अधिक साइकिल / बाइक / घुड़सवारी

लंबे समय तक सीट का दबाव Micro-trauma पैदा करता है जिससे द्रव बनना बढ़ जाता है।

3️⃣ फाइलेरिया (Filariasis)

भारत में हाइड्रोसील का सबसे बड़ा कारण यही है।
फाइलेरिया के कीड़े लसीका-नलिकाएँ बंद कर देते हैं।

4️⃣ लगातार मेहनत, रिक्शा चलाना, भारी वजन उठाना

इनसे पेट में दबाव बनता है और द्रव नीचे वृषण में उतर आता है।

5️⃣ अत्यधिक यौन क्रिया

लगातार सम्भोग से वृषण पर खिंचाव बढ़ता है जो सूजन बनाता है।

6️⃣ कठोर मल त्याग (कब्ज)

जोर लगाने से पेट का द्रव अण्डकोष की तरफ खिंचता है।

7️⃣ वीर्य की कमजोरी / पतलापन

वृषण की संरचना को कमजोर करता है जिससे सूजन बनती है।

8️⃣ संक्रमण (Infection)

  • Epididymo-orchitis

  • Bacterial infection

  • Viral infection

ये सभी हाइड्रोसील को जन्म दे सकते हैं।

9️⃣ जन्मजात कारण

कई बच्चों में जन्म से ही पेट-कोष का रास्ता बंद नहीं होता।

10️⃣ सर्वांगशोथ (Body-wide edema)

दिल, किडनी, लीवर की कमजोरी में भी हाइड्रोसील बन सकता है।


 हाइड्रोसील के लक्षण (Symptoms)

1️⃣ वृषण में बढ़ती सूजन

धीरे-धीरे अण्डकोष बढ़कर बहुत बड़ा भी हो सकता है।

2️⃣ भारीपन (Heaviness)

रोगी को हमेशा नीचे वजन जैसा महसूस होता है।

3️⃣ दर्द

  • हल्का

  • मध्यम

  • कभी-कभी तेज खिंचाव वाला दर्द

4️⃣ चलने-फिरने में दिक्कत

लंबे समय तक चलने पर दर्द बढ़ जाता है।

5️⃣ लज्जा, चिंता, ग्लानि

रोगी स्वयं को कमज़ोर, भद्दा या असहज महसूस करता है।


 आयुर्वेदिक उपचार (Ayurvedic Treatment)

आयुर्वेद में अण्डवृद्धि का उपचार शोथ-नाशक, वात-कफ शामक, द्रव-संचार (Lymphatic system) सुधारक सिद्धांत पर आधारित है।


 आंतरिक औषधियाँ (Internal Medicines)

1️⃣ वृद्धि-बधिका वटी

सूजन और द्रव निर्माण कम करती है।

2️⃣ वृद्धि-हर रस / वृद्धि-हर वाटिका

पुराने और बड़े हाइड्रोसील में अत्यंत प्रभावी।

3️⃣ शशि-शेखर रस

दर्द, भारीपन और सूजन में राहत।

4️⃣ आरोग्यवर्धिनी वटी

रक्त व लसीका तंत्र को शुद्ध करती है।

 सेवन विधि

सभी दवाओं को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें।
½ चम्मच सुबह-शाम त्रिफला क्वाथ या हरितकी क्वाथ के साथ लें।


 बाहरी उपचार (External Ayurvedic Therapy)

1️⃣ ग्लिसरीन + बेलाडोना वस्त्र

  • दर्द व लालिमा कम

  • प्रतिदिन बाँधें

2️⃣ सोंठ + पीपल + त्रिफला + सरसों तेल लेप

  • सूजन उतरती है

  • द्रव निर्माण धीमा

3️⃣ कदम के पत्ते + अरंडी तेल

  • हल्का गर्म करके बाँधें

  • द्रव बाहर खिंचने में मदद

4️⃣ अरंडी पत्ता लेप

  • प्राकृतिक द्रव-शोषक

  • लंगोट के साथ अधिक प्रभावी


 आयुर्वेदिक सावधानियाँ (Precautions)

✔ कब्ज न होने दें

त्रिफला रात्रि में लें।

✔ भारी वजन से बचें

✔ तंग कपड़ों से बचें

✔ अधिक समय तक बैठना/चलना टालें

✔ साइकिल/बाइक कम चलाएँ


 अन्य आधुनिक उपचार (Modern Options)

1️⃣ Aspiration

सुई से द्रव निकालना — अस्थायी, फिर से भर जाता है।

2️⃣ Hydrocelectomy (सर्जरी)

स्थायी समाधान — पूर्ण सुरक्षित प्रक्रिया।


 निष्कर्ष (Conclusion)

हाइड्रोसील शुरुआती अवस्था में आयुर्वेद से पूरी तरह नियंत्रित और समाप्त किया जा सकता है।
पहले चरण के रोग में दवाएँ, लेप, लंगोट, और उचित आहार-विहार चमत्कारिक लाभ देते हैं।

परंतु यदि सूजन बहुत बड़ी हो चुकी हो, दर्द तीव्र हो, या फाइलेरिया शामिल हो, तो आधुनिक शल्य-चिकित्सा उचित विकल्प हो सकती है।

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