मिर्गी (Epilepsy / Apsmar) एक ऐसा रोग है जिसमें व्यक्ति अचानक चेतना खो देता है, शरीर अकड़ जाता है, हाथ-पैर अनियंत्रित रूप से फड़कने लगते हैं, मुँह से झाग आने लगता है, आँखें स्थिर हो जाती हैं और उसे स्वयं को कोई ज्ञान नहीं रहता।
आयुर्वेद में इसे “अपस्मार” कहा गया है —
अर्थात स्मृति का नाश, चेतना का पतन, मन की अस्थिरता और नाड़ियों में विकार।
मिर्गी एक साधारण बीमारी नहीं बल्कि मन, मस्तिष्क, नाड़ियों और प्राणवायु—चारों का विकार है।
इसका इलाज केवल दवा से नहीं बल्कि—
औषध + पथ्य + दिनचर्या + मानसिक शांति + योग
इन सबके मिलकर होता है।
मस्तिष्क में विद्युत-सिग्नल की गड़बड़ी
दिमाग में चोट
ब्रेन ट्यूमर / सिस्ट
स्ट्रोक
दिमाग में सूजन
मस्तिष्कावरण शोथ
जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी
आनुवंशिकता
वात की विकृति: नसों की गति बिगड़ना
कफ का अवरोध: चेतना धीमी होना
तामस और राजस का बढ़ना: मन में विकार
अग्नि मंद होने से विष (Aam) का निर्माण
नाड़ी तंत्र में अवरोध
यह रोग शरीर व मन दोनों का रोग है।
चक्कर
भय
धुंधलापन
कोई अजीब गंध/आवाज
दिल की धड़कन तेज
अचानक गिरना
आँखें पलट जाना
शरीर में अकड़न
हाथ-पैर पटकना
झाग निकलना
पेशाब/पखाना निकल जाना
जीभ दब जाना
गहरी नींद
सिरदर्द
कमजोरी
कुछ याद न रहना
चोट लगने का खतरा
दम घुट सकता है
लंबे समय तक untreated रहने पर दिमाग कमजोर होता है
याददाश्त घटती है
व्यवहार बदलता है
बच्चे पढ़ाई में कमजोर हो सकते हैं
कुछ केसों में जान तक जा सकती है
ब्राह्मी
शंखपुष्पी
मालकांगनी
हरड़
त्रिफला
तगर
वंशलोचन
नेत्रबाला
सोंठ
काली मिर्च
मुलहठी
नागरमोथा
कुटकी
निशोथ
गिलोय
खरैंटी
लाल कमल पंचांग
दालचीनी
चंदन लाल/सफेद
नागकेशर
इन्द्रायण जड़
अतीस
रास्ना पत्ते
बेल पत्ते
भारंगी पंचांग
कुट मीठा
पिंडखजूर गुठली निकला
मुनक्का
सिंघाड़ा
अनारदाना मीठा
अम्लवेत
इमली के बीज
पत्रज
दारुहल्दी
मुसली-सिम्ब्ल
कांस बीज
बथुआ पत्ते
मेहँदी पत्ते
पीली हरड़ छिलका
आदि…
1️⃣ सभी द्रव्य बारीक चूर्ण बना लें।
2️⃣ इसमें गौघृत या बादाम रोगन मिलाएँ।
3️⃣ अब ऊपर से चूर्ण जितनी मिश्री डालें।
4️⃣ अब उतनी ही असली मधु (शहद) डालें।
5️⃣ कम से कम 1 घंटे तक लगातार घोटें।
6️⃣ जब मिश्रण एक-जान हो जाए → अवलेह तैयार।
गुलकंद 4 चम्मच
त्रिफला 1 चम्मच
इसबगोल ½ चम्मच
1 गिलास दूध में शंखपुष्पी सिरप 5 चम्मच
सुबह खाली पेट – 1 चम्मच + मीठा ठंडा दूध
शाम 5 बजे – 1 चम्मच + दूध
10 साल पुरानी मिर्गी → 2 माह
25 साल पुरानी → 100 दिन
अवलेह के सभी द्रव्य
गन्ने की जड़
सफेद दूब
कांसी
कुशकी जड़
(प्रत्येक 50 ग्राम)
1️⃣ सबको 16 गुने पानी में उबालें।
2️⃣ चौथाई शेष रहने पर छान लें।
3️⃣ अब इसमें बराबर मात्रा बकरी का दूध मिलाएँ।
4️⃣ और 4 सेर गौघृत डालें।
5️⃣ धीमी आँच पर पकाएँ जब तक सारा पानी उड़ न जाए और केवल घृत रह जाए।
6️⃣ मिट्टी की बरनी में संग्रह करें।
1–1 चम्मच सुबह–शाम + कुनकुना दूध
60 दिनों में परिणाम
अपतंत्रकारी वटी
वृहद वात चिंतामणि रस
ब्राह्मी वटी (स्वर्ण युक्त)
जटामांसी क्वाथ
शंखपुष्पी स्वरस
रौप्य भस्म + ब्राह्मी + बच चूर्ण (घी से)
सर्पगंधा योग
ये नुस्खे आपके उपचार को दोगुना प्रभावशाली बनाते हैं।
1 चम्मच ब्राह्मी चूर्ण
1 चम्मच शंखपुष्पी
1 गिलास दूध
मस्तिष्क की नाड़ियों को मजबूती।
सुबह–शाम 2-2 बूंद
प्राणवायु स्थिर, दौरे रुकते हैं।
1 चम्मच खसखस
1 चम्मच मिश्री
रात को लें → नींद अच्छी, मस्तिष्क शांत।
5–7 तुलसी पत्ते + 1 चम्मच शहद
दौरे के बाद कमजोरी दूर।
दिमाग में जलन व उत्तेजना कम करता है।
मस्तिष्क को ठंडक, दौरे कम।
ब्रेन की नाड़ियों को पोषण।
✔ लौकी
✔ परवल
✔ टिंडा
✔ पालक
✔ मैथी
✔ गिलोय पानी
✔ मूंग दाल
✔ गेहूं रोटी
✔ दलिया
✔ सेब
✔ पपीता
✔ मीठे फल
✔ दूध
✔ घी
✔ शक्कर
❌ तले पदार्थ
❌ दही
❌ चावल
❌ आलू
❌ बैंगन
❌ चना/उड़द/मसूर
❌ मांस
❌ शराब
❌ मछली
❌ खट्टा
❌ जंक फूड
❌ कोल्ड ड्रिंक
❌ बिस्किट-ब्रेड
श्वास ध्यान
नाड़ी शोधन
अनुलोम–विलोम
भ्रामरी
शवासन
सूक्ष्म व्यायाम
यह मस्तिष्क को तुरंत शांति देते हैं।
सुबह सूर्योदय से पहले उठें
हल्का व्यायाम
विलंबित भोजन न करें
दोपहर की नींद न लें
रात को देर तक जागरण न करें
तनाव से दूर
किसी भी प्रकार का भय, क्रोध, उत्तेजना न पालें
उपरोक्त सभी आयुर्वेदिक औषधियाँ, सिद्ध अवलेह, सिद्ध घृत, रस-औषधियाँ तथा घरेलू उपचार किसी योग्य एवं अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से ही लें।
हर व्यक्ति की प्रकृति (Prakriti), दोष, उम्र, रोग का प्रकार, रोग की अवधि एवं शरीर की सहनशीलता अलग होती है।
इसलिए:
बिना चिकित्सक की देखरेख के कोई भी औषधि स्वयं न लें।
विशेषकर स्वर्ण-युक्त, खनिज-युक्त या तीव्र प्रभाव वाली दवाएँ हमेशा डॉक्टर की निगरानी में ही दी जाएँ।
गर्भवती महिलाएँ, बच्चे, बुजुर्ग एवं अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीज पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।
यह लेख केवल शैक्षणिक एवं सामान्य जानकारी के लिए है।
उपचार हमेशा किसी पंजीकृत आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से ही करें।
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