जोड़ों के दर्द की गंभीर बीमारी: वातरक्त (Gout)

Jan 07, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
जोड़ों के दर्द की गंभीर बीमारी: वातरक्त (Gout)

 Author

Ayurvediya Upchar
(आयुर्वेदिक स्वास्थ्य लेखन, शोध एवं जन-जागरूकता)


 भूमिका (Introduction)

जोड़ों का दर्द आज केवल वृद्धावस्था की समस्या नहीं रह गया है। आधुनिक जीवनशैली, अनियमित खान-पान, मानसिक तनाव, देर रात तक जागना, फास्ट फूड, अधिक प्रोटीन व मांसाहार, शराब तथा शारीरिक श्रम या व्यायाम की कमी—ये सभी कारण मिलकर शरीर के अंदर अनेक प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं। इन्हीं विकृतियों में से एक अत्यंत कष्टदायक और धीरे-धीरे विकलांगता की ओर ले जाने वाला रोग है वातरक्त, जिसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में गाउट (Gout) कहा जाता है।

आम धारणा यह है कि वातरक्त केवल जोड़ों का रोग है, परंतु आयुर्वेद इसे शरीर की धातुपाक (Metabolism) प्रक्रिया की गंभीर गड़बड़ी मानता है। यह रोग जब प्रकट होता है, तो सबसे पहले संधियों में असहनीय वेदना, सूजन, जलन और लालिमा के रूप में दिखाई देता है। समय पर उपचार न मिलने पर यह रोग बार-बार उभरता है, पुराने रूप में परिवर्तित होता है और रोगी के दैनिक जीवन को अत्यंत कष्टप्रद बना देता है।

यह लेख वातरक्त पर एक पूर्ण, वैज्ञानिक और आयुर्वेद-सम्मत मार्गदर्शिका है, जिसमें आपको कारणों से लेकर उपचार, आहार-विहार, घरेलू उपाय, औषधीय प्रबंधन, पंचकर्म, सावधानियाँ और जीवनशैली परिवर्तन तक—सब कुछ विस्तार से मिलेगा।


वातरक्त क्या है? (What is Vatarakta / Gout)

आयुर्वेद के अनुसार जब वात दोष और रक्त धातु एक-दूसरे को दूषित कर देते हैं, तब जो विकार उत्पन्न होता है, उसे वातरक्त कहते हैं। वात दोष की शुष्कता, शीतलता और चलायमानता तथा रक्त धातु की उष्णता और तरलता—जब असंतुलित होती है—तो शरीर में अनेक प्रकार की पीड़ाएँ उत्पन्न होती हैं।

आधुनिक चिकित्सा में यही स्थिति तब उत्पन्न होती है जब रक्त में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है और वह संधियों में क्रिस्टल के रूप में जमा होने लगता है। यह जमाव ही तीव्र सूजन, जलन और असहनीय दर्द का कारण बनता है।


 वातरक्त की उत्पत्ति की प्रक्रिया (Pathophysiology in Detail)

मानव शरीर में प्रतिदिन भोजन के पाचन, अवशोषण और चयापचय के दौरान अनेक उपयोगी तत्व बनते हैं। साथ ही कुछ अपद्रव्य (Waste Products) भी उत्पन्न होते हैं। सामान्य अवस्था में ये अपद्रव्य—

  • मल

  • मूत्र

  • स्वेद (पसीना)

के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

 यूरिक एसिड की विस्तृत भूमिका

प्रोटीन—विशेषकर प्यूरिन वर्ग की प्रोटीन—के मेटाबोलिज़्म से अनेक अपद्रव्य बनते हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है यूरिक एसिड

  • सामान्यतः 100 सी.सी. रक्त में 0.7 से 7.0 मि.ग्रा. यूरिक एसिड सुरक्षित माना जाता है

  • महिलाओं में यह मात्रा स्वाभाविक रूप से कुछ कम होती है

यदि:

  • यूरिक एसिड का निर्माण अत्यधिक हो जाए

  • या गुर्दे (Kidneys) उसे पर्याप्त मात्रा में बाहर न निकाल पाएं

तो यह रक्त में बढ़ने लगता है। बढ़ा हुआ यूरिक एसिड धीरे-धीरे—

  • संधियों

  • हड्डियों

  • संधि-बंधन

  • संधि आवरण (Synovial Membrane)

में जमा होकर क्षोभ (Irritation) और शोथ (Inflammation) उत्पन्न करता है। यही प्रक्रिया वातरक्त / गाउट का मूल कारण है।


 वातरक्त केवल जोड़ों का रोग क्यों नहीं है?

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि वातरक्त मूलतः—

  • रक्त की अशुद्धि

  • मेटाबोलिज़्म की विकृति

  • वात दोष का प्रकोप

का परिणाम है। जोड़ों में दर्द इसका लक्षण है, कारण नहीं। इसी कारण केवल दर्द निवारक दवाएँ लेने से रोग दब तो जाता है, पर जड़ से समाप्त नहीं होता।


 आयुर्वेद के अनुसार वातरक्त के कारण (Nidana)

आयुर्वेद में वातरक्त के कारणों को आहार, विहार और मानसिक कारणों में विभाजित किया गया है।

 आहार संबंधी कारण

  • अत्यधिक नमकीन, खट्टा, तीखा, चटपटा भोजन

  • अधिक तला-भुना, चिकना और भारी आहार

  • अपचित भोजन के रहते पुनः भोजन करना

  • सड़ा-गला या अत्यधिक सूखा मांस

  • जलचर जीवों का मांस

  • उड़द, कुलथी, तुअर जैसी भारी दालें

  • दही, कांजी, सिरका

  • विरुद्ध आहार (दूध + मछली, फल + दूध आदि)

  • अत्यधिक शराब सेवन

 विहार संबंधी कारण

  • दिन में सोना

  • रात्रि जागरण

  • व्यायाम का अभाव

  • आलस्यपूर्ण दिनचर्या

  • लंबे समय तक बैठना

  • अत्यधिक वाहन प्रयोग

 मानसिक कारण

  • अत्यधिक तनाव

  • चिंता

  • क्रोध

  • अवसाद


 वातरक्त के लक्षण (Lakshana)

वातरक्त के लक्षण प्रारंभिक, मध्य और जीर्ण अवस्था में भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

प्रारंभिक लक्षण

  • जोड़ों में हल्का दर्द

  • थकान

  • शरीर में भारीपन

  • मुंह का स्वाद खराब

 तीव्र अवस्था के लक्षण

  • अचानक अत्यधिक दर्द

  • सूजन और लालिमा

  • जलन और गर्मी

  • स्पर्श सहन न होना

  • रात में दर्द का बढ़ना

 विशेष लक्षण

  • बिना कारण अधिक या बिल्कुल न पसीना आना

  • स्पर्श ज्ञान में कमी

  • हल्की चोट में भी अत्यधिक दर्द

  • संधियों के आसपास फुंसियाँ

  • बार-बार पेशाब जाना

  • मुख का सूखना

  • कभी-कभी रक्तचाप का बढ़ना

रोग की शुरुआत प्रायः पैर के अंगूठे से होती है, जिसे क्लासिक गाउट साइन माना जाता है।


 निदान (Diagnosis)

  • लक्षणों का अध्ययन

  • रक्त में यूरिक एसिड की जाँच

  • मूत्र परीक्षण

  • आयुर्वेदिक नाड़ी परीक्षा


 सामान्य एलोपैथिक दवाएँ क्यों असफल होती हैं?

एलोपैथी में प्रायः—

  • पेनकिलर

  • एंटी-इंफ्लेमेटरी

  • यूरिक एसिड कम करने वाली दवाएँ

दी जाती हैं, जो:

  • केवल लक्षण दबाती हैं

  • लंबे समय में किडनी व लिवर पर दबाव डालती हैं

आयुर्वेद रोग की जड़ पर कार्य करता है।


 आयुर्वेदिक उपचार सिद्धांत (Chikitsa Sutra)

आयुर्वेद में वातरक्त के उपचार का मूल सूत्र है:

  1. रक्त शोधन

  2. वात शमन

  3. आम पाचन

  4. अपद्रव्य निष्कासन


 बाह्य उपचार (External Therapies)

 लेप

  • तिल

  • नीम

  • मंजिष्ठा

  • एरण्ड बीज

  • दारुहरिद्रा

  • रक्तचंदन

  • हल्दी

दूध या गुलाब जल में पीसकर।

 अभ्यंग व स्वेदन

  • पिण्ड तेल

  • महापिण्ड तेल

  • बलातेल

  • दशपाकी बलातेल

  • गुडुची तेल


 आंतरिक औषधियाँ (Physician Supervision)

  • निम्बादि चूर्ण

  • मंजिष्ठादि चूर्ण

  • रस्नादि चूर्ण

  • गंधक रसायन

  • वातरक्तांतक रस

  • विश्वेश्वर रस

  • रस माणिक्य

  • श्वेत पर्पटी

  • लांगल्यादि लौह

  • गुडुच्यादि लौह

  • सारिवाद्यासव

  • मंजिष्ठाद्यरिष्ट


 विशेष आयुर्वेदिक प्रोटोकॉल

1️⃣ चूर्ण प्रयोग

वातांतक टैबलेट + महावात विध्वंसक रस
 आधा चम्मच सुबह-शाम
 महामंजिष्ठादि क्वाथ के साथ

2️⃣ लेप

एलोवेरा + हल्दी + अरंडी तेल
 हल्का गर्म कर प्रयोग

3️⃣ गुग्गुल

अमृतादि गुग्गुल
 2-2 गोली सुबह-शाम

4️⃣ घृत

पंचतिक्त घृत गुग्गुल + गुडुची घृत
दूध के साथ


 वातरक्त में आहार-विहार

 पथ्य

  • हल्का सुपाच्य भोजन

  • हरी सब्ज़ियाँ

  • जौ, बाजरा

  • पर्याप्त जल

  • गिलोय, नीम

 अपथ्य

  • मांस

  • शराब

  • अधिक दालें

  • दही

  • फास्ट फूड


 पंचकर्म की भूमिका

  • विरेचन

  • बस्ती

  • रक्तमोक्षण

चिकित्सक की देखरेख में अत्यंत लाभकारी।


 सावधानियाँ

  • स्वयं दवा न लें

  • कब्ज पहले ठीक करें

  • नियमित दिनचर्या अपनाएँ


 निष्कर्ष

वातरक्त एक जटिल लेकिन नियंत्रित रोग है। आयुर्वेद इसे केवल दर्द का रोग नहीं, बल्कि पूरे शरीर की शुद्धि और संतुलन का विषय मानता है। सही समय पर समग्र आयुर्वेदिक उपचार अपनाकर इस रोग को जड़ से नियंत्रित किया जा सकता है।

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