मानव जीवन में कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनकी पीड़ा दर्द से अधिक मानसिक, सामाजिक और दिनचर्या से जुड़ी होती है। “भगंदर” या Fistula-in-Ano ऐसा ही एक विकार है। गुदा क्षेत्र के आसपास बनने वाली एक सुरंगनुमा नली जो भीतर मलाशय / गुदा नलिका से शुरू होकर बाहर त्वचा के किसी बिंदु पर खुलती है, लगातार रोगी को कष्ट देती रहती है। इस रोग का स्वरूप ऐसा होता है कि यह कभी शांत रहता है, कभी बिल्कुल उग्र हो जाता है, जिससे रोगी असहजता, पीड़ा, बदबू, मवाद, दर्द और शर्मिंदगी के चरणों से गुजरता है।
पीलिया एक ऐसा रोग है जिसमें शरीर में बिलीरुबिन (Bilirubin) नामक पित्त रंगक का स्तर बढ़ जाने से आंखें, त्वचा, नाखून, मूत्र और कभी-कभी जीभ तक पीली दिखाई देने लगती हैं। यह स्थिति तब बनती है जब यकृत (Liver) — जो शरीर का पाचन एवं विषनाशक केंद्र है — अपनी सामान्य प्रक्रिया में व्यवधान का सामना करता है।
परिचय — क्यों यह लेख आपके जीवन को बदल सकता है? क्या आपको लगता है कि थकान अब आपकी पार्ट-टाइम पहचान बन चुकी है? क्या सुबह उठकर शरीर में एसी फिटिंग जैसी जकड़न महसूस होती है? क्या हल्की सी मेहनत के बाद साँस फूल जाती है, घुटनों में कराह उठने वाला दर्द होता है? और सबसे बड़ा सवाल — क्या आप इन सबका कारण उम्र, काम, तनाव या मौसम को मानते आए हैं? तो ध्यान दीजिए — आपकी उम्र नहीं, आपकी Vitamin Factory बंद है। भारत आज ऐसी महामारी से जूझ रहा है जिसके मरीज लाखों नहीं — करोड़ों हैं। लेकिन इसका शोर न अख़बार में है, न TV पर — क्योंकि इसका शोर शरीर के अंदर होता है। यह महामारी है: Vitamin D Deficiency + Vitamin B12 Deficiency — यानी Silent Deficiency Pandemic
रेटिना (Retina) आँख के अंदर स्थित प्रकाश-संवेदनशील झिल्ली है, जो हमारी दृष्टि का मूल आधार है। जब प्रकाश आँख के लेंस से गुजरकर रेटिना पर पड़ता है, तब रेटिना उस प्रकाश को विद्युत संकेतों में बदलकर मस्तिष्क तक भेजती है। यानी दुनिया को जैसा हम देखते हैं, वह देखने की असल क्षमता रेटिना के कारण ही है। अगर रेटिना कमजोर हो जाए या उसकी कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होने लगें, तो दृष्टि धुंधली, विकृत या पूरी तरह खो भी सकती है। इसलिए रेटिना को स्वस्थ रखना अत्यंत आवश्यक है।
हृदय हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। इसका काम है रक्त को हर हिस्से तक पहुंचाना, ताकि शरीर को ऊर्जा मिले और अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकलें। जब धमनियां कठोर या संकुचित हो जाती हैं, रक्त गाढ़ा हो जाता है और प्रवाह में अवरोध पैदा होता है—इस स्थिति में हृदय को अधिक दबाव लगाना पड़ता है, जिसे उच्च रक्तचाप (Hypertension) कहा जाता है। लंबे समय तक High BP रहने से हार्ट फेल का जोखिम बढ़ जाता है।
गुर्दे (किडनी) शरीर में रक्त को छानने, विषाक्त पदार्थ बाहर निकालने और जल-नमक संतुलन बनाए रखने का मुख्य कार्य करते हैं। आयुर्वेद में गुर्दा रोगों को “मूत्रवह स्रोतस विकार” की श्रेणी में माना गया है, और पारंपरिक ग्रंथों में कई ऐसे योग वर्णित हैं जिन्हें किडनी स्वास्थ्य को समर्थन देने वाला माना गया है।
यकृत, जिसे सामान्य भाषा में लिवर या जिगर कहा जाता है, मानव शरीर का ऐसा अंग है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है और इसे शरीर की रासायनिक प्रयोगशाला कहना बिल्कुल उचित है। हमारे शरीर में होने वाली हजारों जैव-रासायनिक क्रियाएं प्रतिदिन यकृत में ही संपन्न होती हैं।
आज के आधुनिक युग में मधुमेह (Diabetes Mellitus) केवल एक रोग नहीं, बल्कि जीवनशैली से उत्पन्न होने वाली वैश्विक महामारी बन चुका है। अनियमित दिनचर्या, असंतुलित आहार, मानसिक तनाव, शारीरिक श्रम की कमी और कृत्रिम भोजन के बढ़ते प्रयोग ने इस रोग को स्त्री-पुरुष, युवा-वृद्ध सभी वर्गों में तेज़ी से फैला दिया है। आयुर्वेद के अनुसार मधुमेह को “प्रमेह” कहा गया है। चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट जैसे महान आचार्यों ने प्रमेह के कारण, लक्षण और उपचार का अत्यंत विस्तार से वर्णन किया है। आयुर्वेद मानता है कि यदि रोग प्रारंभिक अवस्था में हो, तो उसे जड़ से समाप्त किया जा सकता है और यदि पुराना हो, तो नियंत्रण में लाकर रोगी को सामान्य जीवन दिया जा सकता है।
बढ़ती उम्र के साथ शरीर में अनेक प्रकार के परिवर्तन होना स्वाभाविक है। 60 वर्ष की आयु के बाद शरीर की कार्यक्षमता, नसों की मजबूती, रक्त संचार और तंत्रिका तंत्र पहले की तुलना में धीमे और कमजोर होने लगते हैं। इसी उम्र में बहुत से लोगों को यह शिकायत होने लगती है कि झुकते ही या अचानक उठते ही कुछ सेकंड के लिए सिर घूम जाता है, आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है या कभी-कभी दो-दो चीजें दिखाई देने लगती हैं।
डिप्थीरिया एक अत्यंत गंभीर, संक्रामक एवं संभावित रूप से जानलेवा रोग है, जो विशेषकर बच्चों में तेजी से फैलता है। यह रोग प्राचीन काल से मानव समाज के लिए एक बड़ा खतरा रहा है। आधुनिक टीकाकरण के बावजूद आज भी यह बीमारी उन क्षेत्रों में देखी जाती है जहाँ टीकाकरण अधूरा या अनुपस्थित होता है। भारत में आयुर्वेदिक ग्रंथों में इस रोग का वर्णन “कंठरोहिणी”, “गलघोंटू” और “घटसर्प” के नाम से मिलता है। यह रोग मुख्यतः गले, नाक, श्वसन मार्ग और टॉन्सिल को प्रभावित करता है और समय पर उपचार न मिलने पर हृदय, गुर्दे और स्नायु तंत्र तक को नुकसान पहुँचा सकता है।
साइनुसाइटिस जिसे आम बोलचाल की भाषा में साइनस कहा जाता है, आज के समय में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को प्रभावित करने वाली एक सामान्य लेकिन लंबे समय तक परेशान करने वाली बीमारी है। बदलती जीवनशैली, प्रदूषण, धूल‑मिट्टी, एलर्जी, गलत खान‑पान और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता इसके मुख्य कारण माने जाते हैं। यदि समय रहते इसका सही उपचार न किया जाए, तो यह रोग बार‑बार उभरकर जीवन की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करता है।
मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Muscular Dystrophy) एक गंभीर अनुवांशिक (Genetic) रोग है, जिसमें शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं और अपनी कार्यक्षमता खो देती हैं। प्रभावित व्यक्ति पहले सामान्य रूप से चलता है या खड़ा होता है, लेकिन समय के साथ उसकी मांसपेशियों में संकुचन, अकड़न, कमजोरी, सूजन और खिंचाव बढ़ने लगता है।
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