ग्रीष्म ऋतू में जो भीषण गर्म हवाओं के झोंके चलते हैं उन्हें हम बोलचाल की भाषा में “लू “ कहते हैं | ग्रीष्म ऋतू के प्रारम्भ में दिनभर धूल भारिटेज़ हवाएं चलने लगती हैं ये गर्म हवाएं अधिक तीव्र होने के कारण धरती की स्निग्धता का शोषण कर लेती हैं जिसके कारन मानव, जीव-जंतु तथा पेड़ पौधों में जलीयांश मैं कमी आ जाती है जिसके फलस्वरुप समस्त दुनिया को परेशानी का सामना करना पडता है |
सौंफ घर -घर में मुखशुद्धि के रूप में प्रचलित सौंफ का उपयोग प्राचीनकाल से ही औषधि के रूप में भी होता रहा है | इसके अलावा सौंफ का उपयोग मसालों और पान में डाले जाने वाले मसाले के रूप में भी होता है | गांव में आज भी लोग ठंडाई शरबत बनाकर इसका सेवन करते हैं| पेट के रोगों के लिए तो ये रामबाण औषधि है | सूखी सौंफ श्लेष्मिक कला और पाचन तंत्र पर प्रभावकारी असर करता है |
मानव आदिकाल से ही सुंदरता का पुजारी रहा है | उसे अपनी सुंदरता को बनाये रहने से ही मानसिक सुंदरता अर्थात उच्च कोटि के भाव उत्कृष्टता के साथ बने रहते हैं | अतः अपने शरीर के मुखकमल की सुंदरता निमित्य प्रत्येक व्यक्ति को सदाचार पूर्वक अपनी सुंदरता को बरकरार रखना चाहिए , क्योकि मुखकमल द्वारा ही व्यक्ति की मानसिक अवस्था एवं चरित्र का ज्ञान किया जा सकता है| 14-15 वर्ष की आयु के बाद मुख पर सेमल के कांटे के समान कफ,वायु एवं रक्त से युवाओ में होने वाली छोटी-छोटी फुंसियां निकलने लगती हैं जिसे मुंहासे कहते हैं |
सरलतापूर्वक प्रसव के लिए - हींग भूनकर चूर्ण बना लें,चार माशा शुद्ध गो - घृत में मिलाकर खिलाने से सरलतापूर्वक प्रसव होने में सहायता मिलती है | इसके अतिरिक्त एक तोला राई के चूर्ण में भुनी हुई हींग का चूर्ण मिलाकर गरम जल के साथ सेवन करने से मूढगर्भ आसानी से बाहर आ जाता है |
(१) कान दर्द - प्याज पीसकर उसका रस कपडे से छान लें| फिर उसे गर्म कर के चार बूँद कान में डालने से कान का दर्द समाप्त हो जाता है | (२) दांत दर्द - हल्दी एवं सेंधा नमक महीन पीसकर,उसे शुद्ध सरसों के तेल में मिलाकर सुबह-शाम मंजन करने से दातों का दर्द ठीक होता है | (३) दातों के सुराख़ - कपूर को महीन पीसकर दातों पर ऊँगली से लगावें और उसे मलें | सुराखों को भली प्रकार से साफ़ कर लें| फिर सुराखों के नीचे कपूर को कुछ समय तक दबाकर रखने से दातों का दर्द निश्चित रूप से समाप्त हो जाता है |
नवजात शिशु या बच्चा जब माँ के गर्भ में रहता है तो उसका समुचित विकास होता रहता है लेकिन प्रसव के पश्चात इसके स्वास्थ और विकास में अवरोध पड़ने लगता है और वह रोगों से ग्रसित हो जाता है | इन रोगो के होने का मुख्य कारण है प्रसव के उपरांत माँ द्वारा अपना दूध न पिलाना| छोटे बच्चों को विशेषकर दस्त,निमोनिया,कुपोषण, डिब्बा रोग(पसली चलना),सूखा रोग,अपच गैस आदि अनेक व्याधियां अपने चंगुल में फसा लेती हैं | यदि समय रहते उनका उपचार न किया जाये तो गंभीर परिणाम सामने आते हैं |
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