ऐसे रोग, जिन्हें यन्त्र नहीं देख पाते आयुर्वेद में कुछ रोगों के विस्तृत विवरण मिल जाते हैं जिन्हें आज के यंत्र देख नहीं पाते इन रोगों में से कुछ रोगों का विवरण यहां प्रस्तुत किया जा रहा है 1-- परिणाम शूल इस रोगका 'परिणामशूल नाम इसलिये पड़ा है क्यों कि छोटी आंतों में भोजन के पाक हो जाने के बाद किट्ट का भाग बड़ी आँतों में पहुँचने लगता है तो उदर भाग में असह्य वेदना उत्पन्न होने लगती है। इसलिये इस वेदना (मूल) का नाम परिणाम शूल है। परिणाम का अर्थ होता
(१) बिना नाम का रोग लक्षण एक रोगीको देखा गया उसके दाहिने हाथ की कलाई के तीन हिस्से सूख गये थे, एक हिस्सा बचा था उसके उसी हाथ की दो उंगलियां कंधे से लग गयी थी ।उस हाथ को हिलाना या इधर-उधर करना सम्भव न था। वह रुग्ण हाथ केवल बेकार ही नहीं हुआ था, अपितु तकलीफ भी देता रहता था। रोगी का सोना भी कठिन हो रहा था,
प्रकृति ने जैसे ही धरती पर प्राणी को जन्म दिया वैसे ही उस जीवन की रक्षा के साधन भी साथ ही पैदा कर दिये थे। इस जीवन की रक्षा का सबसे बड़ा साधन है, हमारा भोजन, जिसका प्रबंध स्वंय प्रकृति ही करती है। जो लोग प्रकृति की शक्ति को नहीं मानते वे कभी सुख नहीं पा सकते।
मानव शरीर पंच महाभूतों से निर्मित हैं ये है - आकाश,वायु,अग्नि,जल और पृथ्वी | पांच तत्वों एवं त्रिदोष( वात,पित्त,कफ) के सम अवस्था में रहने से ही शरीर स्वस्थ रहता है |तीनों दोषों में वात ( वायु ) ही बलबान है| पित्त और कफ पंगु है इनको वायु जहा ले जाता है वे बादल के समान चले जाते हैं | वायु के पांच भेद माने जाते हैं (1 ) प्राण (2 ) अपान (3 ) समान (4 ) उदान (5 ) व्यान | यदि ये पांचो वायु अपनी स्वाभाविक अवस्था में रहें और अपने - अपने स्थान में विद्यमान रहें तो अपने -अपने कार्यों को संपन्न करते हैं और इन पाँचों के द्वारा के रोग रहित शरीर का धारण होता है |
जो व्यक्ति तन और मन दोनों तरह से स्वस्थ रहता है वही व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ कहलाता है | तन से वह व्यक्ति स्वस्थ होता है जिसमे बात पित्त और कफ सामंजस्य अवस्था में रहता है परन्तु तन से व्यक्ति जब तक स्वस्थ नहीं रह सकता जब तक वह मन से स्वस्थ न हो मन से वही व्यक्ति स्वस्थ रहता है जो सदाचारी हो सदाचारी वही व्यक्ति होता है जिसमे काम क्रोध लोभ जैसे महाभूतों पर स्वयं का नियंत्रण रहता है | शास्त्रों में लेख किया गया है की जो व्यक्ति कामी होता है उसका बात कुपित हो जाता है और जो व्यक्ति क्रोधी होता है उसका पित्त कुपित हो जाता है और लोभी व्यक्ति का कफ कुपित हो जाता है अतः सदाचारी व्यक्ति ही पूर्ण स्वस्थ रहने की कल्पना कर सकता है |
बुढ़ापा या बृद्धावस्था शरीर में होने वाला एक जीव वैज्ञानिक परिवर्तन है ,जिसमे युवावस्था के मुक़ाबले आदमी की रोग प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है,जब शरीर की मानसिक अवस्था कमजोर होने लगे,भार घटने लगे,त्वचा में झुर्रियां पड़ने लगे ,नज़र कमजोर होने लगे, बाल सफ़ेद होते जाएँ तो यह समझना चाहिए की शरीर बुढ़ा
रोगो के उपचार की अपेक्षा रोगों से बचना अधिक श्रेयष्कर कर है | यदि हम प्रयत्न करें और स्वास्थ्य सम्बन्धी कुछ आवश्यक नियमों की जानकारी प्राप्त कर के उनका नियमपूर्वक पालन करें तो अनेक रोगों से बचकर प्रायः जीवनपर्यन्त स्वस्थ रह सकते हैं |
रोगों की कोई संख्या नहीं है,कितने रोग हो चुके हैं ,कितने रोग हैं और कितने रोग होंगे | इसका कोई अनुमान नहीं है | यदि ऐसा कोई रोग आ जाये जिससे परिचित नहीं है तो उस रोग से घबराएं नहीं और यह न सोचें की इस रोग की चिकित्सा कैसे हो | आयुर्वेद ने बताया है की रोग भले असंख्य हैं किन्तु उनके निदान संक्षिप्त और सूत्रबद्ध हैं | इसलिए उस रोग से लड़ा जा सकता है और समाप्त भी किया जा सकता है |
At AyurvediyaUpchar, we are dedicated to bringing you the ancient wisdom of Ayurveda to support your journey toward holistic well-being. Our carefully crafted treatments, products, and resources are designed to balance mind, body, and spirit for a healthier, more harmonious life. Explore our range of services and products inspired by centuries-old traditions for natural healing and wellness.
आयुर्वेदीय उपचार में, हम आपको आयुर्वेद के प्राचीन ज्ञान को समग्र कल्याण की ओर आपकी यात्रा में सहायता करने के लिए समर्पित हैं। हमारे सावधानीपूर्वक तैयार किए गए उपचार, उत्पाद और संसाधन स्वस्थ, अधिक सामंजस्यपूर्ण जीवन के लिए मन, शरीर और आत्मा को संतुलित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। प्राकृतिक उपचार और कल्याण के लिए सदियों पुरानी परंपराओं से प्रेरित हमारी सेवाओं और उत्पादों की श्रृंखला का अन्वेषण करें।