अश्मरी रोग को आम बोलचाल की भाषा में पथरी रोग कहा जाता है और आधुनिक चिकित्सा में इसे Calculus कहते हैं। यह मुख्यतः चार प्रकार का होता है। (1) वृक्काश्मरी (Renal Calculus) यह वृक्क अर्थात गुर्दे (Kidney) में उत्पन्न होती है। वृक्क में बनने के कारण ही इसे वृक्काश्मरी कहा जाता है। गुर्दों में बनने वाली यह पथरी धीरे-धीरे आकार बढ़ाती है तथा समय पर उपचार न होने पर मूत्र मार्ग में रुकावट उत्पन्न कर सकती है। (2) वस्त्यश्मरी (Vesical Calculus / Stone in Urinary Bladder) यह वस्ति अर्थात मूत्राशय (Urinary Bladder) में उत्पन्न होती है। इसलिए इसे मूत्राश्मरी
कभी-कभी क्रोध, भय या शोक की स्थिति में व्यक्ति का शरीर कांपने लगता है। सामान्यतः इसे मानसिक भाव माना जाता है, लेकिन जब यही कंपन लगातार शरीर में बना रहे और धीरे-धीरे रोग का रूप ले ले, तब आयुर्वेद में इसे कम्प वात कहा जाता है। आधुनिक चिकित्सा में इसे कई बार Parkinson's Disease से भी जोड़ा जाता है। यह एक गंभीर वातजन्य विकार है, जो समय रहते उपचार न मिलने पर पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है।
ग्लूकोमा (Glaucoma) आंखों का एक बेहद खतरनाक रोग है, जो धीरे-धीरे आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचाकर व्यक्ति को अंधापन तक पहुंचा सकता है। यह केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अंधत्व का एक बड़ा कारण माना जाता है। सबसे चिंाजनक बात यह है कि शुरुआती अवस्था में इसके लक्षण स्पष्ट दिखाई नहीं देते, इसलिए इसे अक्सर “Silent Thief of Sight” यानी नजर चुराने वाला रोग भी कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार 40 वर्ष की आयु के बाद ग्लूकोमा होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। यदि परिवार में किसी को यह रोग रहा हो, मधुमेह हो या आंखों का दबाव अधिक रहता हो, तो खतरा और बढ़ जाता है।
रतौंधी आंखों का एक प्रमुख रोग है, जिसमें व्यक्ति को दिन में सामान्य दिखाई देता है लेकिन रात या कम रोशनी में देखने में कठिनाई होती है। यह समस्या विशेष रूप से बच्चों में विटामिन A की कमी के कारण अधिक पाई जाती है। समय पर उपचार न होने पर यह रोग गंभीर होकर आंखों की रोशनी तक प्रभावित कर सकता है। आधुनिक चिकित्सा में इसे Night Blindness या Nyctalopia कहा जाता है।
गर्मी का मौसम अपने साथ कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं लेकर आता है। तेज धूप, गर्म हवाएं, दूषित भोजन और पानी की कमी के कारण आंखों में जलन, पेचिश, उल्टी, खट्टी डकारें, गले का सूखना और शरीर में जलन जैसी परेशानियां बढ़ जाती हैं। आयुर्वेद में ऐसे कई घरेलू नुस्खों का वर्णन मिलता है जो इन समस्याओं में राहत देने में सहायक हो सकते हैं। यहां हम गर्मी के मौसम में होने वाले प्रमुख रोगों और उनके उपयोगी घरेलू उपायों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।
अक्षितर्पण आयुर्वेद की एक अत्यंत प्रभावशाली नेत्र चिकित्सा पद्धति है, जो पंचकर्म उपचारों के अंतर्गत आती है। यह आंखों की सुरक्षा, पोषण और दृष्टि सुधार के लिए उपयोग की जाती है। आयुर्वेद में माना गया है कि उचित विधि से किया गया अक्षितर्पण आंखों को नई ऊर्जा प्रदान करता है और कई नेत्र रोगों में लाभकारी सिद्ध होता है।
आंखें हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील अंग हैं। इनके बिना जीवन अधूरा सा लगता है। यदि आप चाहते हैं कि आपकी आंखें लंबे समय तक स्वस्थ, चमकदार और निरोग रहें, तो उनकी नियमित देखभाल करना अत्यंत आवश्यक है। आधुनिक जीवनशैली, मोबाइल और टीवी का अत्यधिक उपयोग, तनाव, नींद की कमी और प्रदूषण आंखों पर बुरा प्रभाव डालते हैं। इसलिए समय रहते आंखों की सुरक्षा और देखभाल पर ध्यान देना जरूरी है।
आज के समय में महिलाओं में कमर दर्द की समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है। पहले यह समस्या केवल अधिक उम्र की महिलाओं में देखने को मिलती थी, लेकिन अब युवा लड़कियां, गृहिणियां, ऑफिस में काम करने वाली महिलाएं और यहां तक कि किशोरियां भी इससे प्रभावित हो रही हैं। कई महिलाएं इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, जबकि लगातार रहने वाला कमर दर्द शरीर के अंदर चल रही किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है। महिलाओं का शरीर पुरुषों की तुलना में अधिक हार्मोनल बदलावों से गुजरता है। मासिक धर्म, गर्भावस्था, प्रसव, रजोनिवृत्ति (Menopause), कैल्शियम की कमी और घरेलू जिम्मेदारियों का अधिक बोझ कमर दर्द को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं।
गर्मी के मौसम में चलने वाली तेज और अत्यधिक गर्म हवाओं को “लू” कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक धूप या गर्म हवाओं के संपर्क में रहता है, तो शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। ऐसी स्थिति में शरीर में पानी और ऊर्जा की कमी हो जाती है, जिससे व्यक्ति की हालत बिगड़ सकती है। समय रहते सही उपचार न मिलने पर लू गंभीर रूप ले सकती है। आजकल बढ़ती गर्मी और हीटवेव के कारण लू लगने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इसलिए इसके कारण, लक्षण और घरेलू उपचार की सही जानकारी होना बेहद जरूरी है।
पैर की उंगली में सफेद फंगस होना आजकल एक बहुत ही सामान्य समस्या बन चुकी है। शुरुआत में यह केवल हल्की खुजली या त्वचा के सफेद पड़ने जैसा दिखाई देता है, लेकिन धीरे-धीरे यह संक्रमण बढ़कर गंभीर रूप ले सकता है। कई लोगों के पैरों की उंगलियों के बीच सफेद गीली परत बनने लगती है, त्वचा गलने जैसी महसूस होती है और तेज खुजली व बदबू आने लगती है। यदि समय पर इसका इलाज न किया जाए तो यह संक्रमण नाखूनों तक फैल सकता है और चलने-फिरने में भी परेशानी पैदा कर सकता है। आमतौर पर यह समस्या उन लोगों में अधिक देखी जाती है जिनके पैरों में ज्यादा पसीना आता है, जो लंबे समय तक जूते पहनते हैं, या जो गीले वातावरण में काम करते हैं। फंगल संक्रमण गर्म और नम जगहों में तेजी से फैलता है, इसलिए पैर की उंगलियों के बीच यह आसानी से विकसित हो जाता है।
दर्द कोई रोग नहीं है, बल्कि यह रोगों का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। दर्द शरीर में उत्पन्न किसी गड़बड़ी या बीमारी का संकेत देता है। डॉक्टर भी अक्सर दर्द के आधार पर ही रोग का अनुमान लगाते हैं। यही कारण है कि दर्द को “बीमारियों का आईना” कहा जाता है। दर्द के अनेक रूप होते हैं और जितने रोग होते हैं, लगभग उतने ही प्रकार के दर्द भी देखने को मिलते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई प्राकृतिक बदलाव दिखाई देने लगते हैं। सिर और दाढ़ी के बाल सफेद होना, दांत कमजोर पड़ना और खासतौर पर चेहरे, आंखों के नीचे, माथे, गर्दन तथा हाथों पर झुर्रियां उभरना सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है। लेकिन आजकल गलत जीवनशैली, तनाव, धूप, धूम्रपान और पोषण की कमी के कारण कम उम्र में भी चेहरे पर झुर्रियां दिखाई देने लगी हैं। झुर्रियां केवल सौंदर्य को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि व्यक्ति को समय से पहले बूढ़ा भी दिखाने लगती हैं। यदि समय रहते त्वचा की सही देखभाल की जाए तो झुर्रियों की समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है।
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