हमारा शरीर और मन दो अलग-अलग इकाईयाँ नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। आधुनिक विज्ञान अब उस तथ्य को स्वीकार कर चुका है जिसे आयुर्वेद हजारों साल पहले बता चुका था – ? “मन और शरीर एक-दूसरे के दर्पण हैं।”
हम सभी जानते हैं कि दिल हमारे शरीर का इंजन है, जो खून को पंप करके हर अंग तक पहुँचाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर में एक और “दिल” मौजूद है, जिसे आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही ‘दूसरा दिल’ कहते हैं? यह ‘दूसरा दिल’ असल में हमारे पैरों की एक खास मांसपेशी होती है — सोलियस मसल (Soleus Muscle)। यह पिंडली (calf muscles) के नीचे होती है और शरीर की प्राकृतिक डिटॉक्स मशीन की तरह काम करती है।
Stone (Ashmari in Sanskrit) is a disease caused by many factors such as unnatural diet and lifestyle, consumption of incompatible food items, suppression of natural urges of stool and urine, excessive use of oily substances, and prolonged consumption of a single type of medicine.
लीच थैरेपी (Leech Therapy) या जोंक चिकित्सा आयुर्वेद में एक पारंपरिक चिकित्सा पद्धति है, जिसे रक्त मोक्षण चिकित्सा (Raktamokshan Chikitsa) का एक प्रमुख अंग माना जाता है। यह चिकित्सा मुख्यतः शरीर से दूषित रक्त को निकालने के लिए प्रयोग की जाती है, जिससे विभिन्न प्रकार के रोगों से राहत मिल सके।
हर सुबह जब आप अपने तकिए पर बाल देखते हैं, क्या दिल घबरा जाता है? नहाते वक्त, कंघी करते समय, यहां तक कि ज़रा सा हाथ फेरने पर भी अगर आपके बाल टूट रहे हैं, तो ये लेख सिर्फ आपके लिए है। क्योंकि इसका समाधान आपको किसी केमिकल वाले तेल, शैम्पू या दवाइयों में नहीं… बल्कि भारत की हज़ारों साल पुरानी चिकित्सा प्रणाली – आयुर्वेद में मिलेगा।
Diabetes is a chronic health condition that affects how your body turns food into energy. With millions of people worldwide living with this condition, it's essential to understand what diabetes is, its symptoms, and how to manage it naturally and effectively.
Ayurveda describes certain diseases in detail that modern diagnostic machines are often unable to detect. Below are some of these conditions along with their Ayurvedic explanation and treatment.
प्रकृति ने हमें अनेक उपहार दिए हैं, जिनमें से जड़ी-बूटियाँ सबसे प्रभावशाली मानी जाती हैं। भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद में जड़ी-बूटियों का उपयोग हजारों वर्षों से किया जा रहा है। ये न केवल शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक हैं, बल्कि अनेक असाध्य रोगों के उपचार में भी कारगर सिद्ध हुई हैं। रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों से परेशान आधुनिक समाज एक बार फिर से आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा की ओर लौट रहा है।
जब कोई माँ अपने बच्चे के माथे पर हाथ रखती है, तो बच्चा खुद-ब-खुद शांत हो जाता है। जब किसी प्रियजन के कंधे पर हाथ रखा जाता है, तो वह दुखी मन भी हल्का महसूस करता है। यही है स्पर्श की शक्ति — और इसी सिद्धांत पर आधारित है स्पर्श चिकित्सा। स्पर्श चिकित्सा (Touch Therapy) कोई आधुनिक आविष्कार नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय और वैदिक परंपरा का हिस्सा रही है। आज विज्ञान भी इस बात को मान रहा है कि स्पर्श से मानव शरीर में ऊर्जा प्रवाहित होती है, और वह न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक रोगों में भी राहत दे सकती है।
मनुष्य के जीवन में स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है। लेकिन आधुनिक जीवनशैली, अनियमित खानपान, और निरंतर मानसिक तनाव के कारण यह अमूल्य धन तेजी से क्षीण होता जा रहा है। दवाइयों और इलाज की ओर भागने से बेहतर है कि हम ऐसी जीवनशैली अपनाएं जो रोगों से रक्षा भी करे और शरीर-मन को शक्ति भी दे। योगासन और प्राणायाम न केवल शरीर को स्वस्थ रखते हैं, बल्कि मानसिक और आत्मिक शांति का भी माध्यम बनते हैं। ये विधाएं केवल व्यायाम नहीं हैं, बल्कि आत्म-जागृति और संतुलित जीवन जीने की पद्धति हैं।
अनुभूत चिकित्सीय प्रयोग 1 - गठिया रोग की सफल चिकित्सा यह एक विशेष प्रकार की चाय है इसको तैयार करने के लिये 2.5 लीटर शुद्ध जल में 350 ग्राम चीनीके साथ 1-2 चम्मच चायकी पत्ती को उबालकर साफ कपड़ेसे छानकर चौड़े मुंहके काँचकी बोतलमें गुनगुना होनेतक ठंडा करके, इसमें कल्चर की 20 ग्राम मात्रा मिला देते हैं। गर्मियों में 7 दिनों में और जाड़ों में 15 दिनोंमें कल्चर का किण्वीरण हो जाता है और वह जम जाता है जिसे अलग करके साफ काँच के बरतन में पानी में डुबोकर रख देते हैं।
ऐसे रोग, जिन्हें यन्त्र नहीं देख पाते आयुर्वेद में कुछ रोगों के विस्तृत विवरण मिल जाते हैं जिन्हें आज के यंत्र देख नहीं पाते इन रोगों में से कुछ रोगों का विवरण यहां प्रस्तुत किया जा रहा है 1-- परिणाम शूल इस रोगका 'परिणामशूल नाम इसलिये पड़ा है क्यों कि छोटी आंतों में भोजन के पाक हो जाने के बाद किट्ट का भाग बड़ी आँतों में पहुँचने लगता है तो उदर भाग में असह्य वेदना उत्पन्न होने लगती है। इसलिये इस वेदना (मूल) का नाम परिणाम शूल है। परिणाम का अर्थ होता
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