बिल्ववृक्ष प्रायः धार्मिक स्थानों विशेषकर भगवान् शंकर के उपासना-स्थलों पर लगाने की भारत में एक प्राचीन परंपरा है | यह वृक्ष अधिक बड़ा न होकर मध्यम आकारवाला होता है | शाखाओं पर तीक्ष्ण कांटे होते हैं | पत्ते तीन-तीन या पांच-पांच के गुच्छों में लगते हैं | बेल का फूल सफ़ेद तथा सुगन्धपूर्ण होता है | फल प्रायः गोलाकार कड़े आवरणवाला,स्वादिष्ट मधुर और ह्रदय को प्रिय लगने वाली सुगंध लिए होता है | गूदे में सैंकड़ों बीज गोद में लिपटे हुए रहते हैं | वसंत ऋतू के
वेदों में पलाश को ब्रम्हवृक्ष कहकर उसे बहुत महत्व दिया गया है और मन्त्रद्रष्टा ऋषियों का पलाश के प्रति बहुत आदर था | पलाश एक औषधीय वृक्ष है | किंशुक,ब्रम्हवृक्ष,याज्ञिक,सुपर्ण,त्रिपर्ण,रक्तपुष्प,क्षारश्रेष्ठ,बीजस्नेह,कृमिघ्न,वक्रपुष्प,ढाक आदि इसके अनेक नाम हैं | इसके वृक्ष के पत्र बड़े प्रशस्त,मनोहर एवं सुन्दर होते हैं अतः इसका नाम पलाश पड़ा | रक्त पलाश तथा श्वेत पलाश इसके कई भेद हैं | इसके छाल,क्षार,बी
ब्राम्ही के सोमवलभ्भी,महौषधि,स्वायम्भुवी,सुरश्रेष्ठा,सरस्वती,सौम्यलता,दिव्या,शारदा आदि कई नाम हैं |यह सामान्यतः गीली एवं तर जमीन पर पैदा होते हैं | ब्राम्ही वनस्पति वैसे तो सारे भारतवर्ष में जलाशयों के किनारे पर पैदा होती है ,पर हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण के मार्ग पर बहुत बड़ी तादाद में पायी जा
नदी,नालों के किनारे होने के कारण इसे धवल,ककुभ तथा नदीसर्ज भी कहा जाता है | आधुनिक प्रयोगों से वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है किअर्जुन ह्रदय रोगों के लिए श्रेष्ठ औषधि है | अर्जुन जाति के कम से कम 15 प्रकार हमारे देश में पाए जाते हैं | इसलिए पहचान ज़रूरी है कि कोन सी औषधि ह्रदय-रक्त-वाही-संस्थान पर कार्य करती है| प्राचीन आयुर्वेद-शास्त्रियों में बाग्भट ऐसे वैद्य हैं,जिन्होंने पहली बार इस औषधि के ह्रदय-रोग में उपयोगी होने की विवेचना की | इसके बाद वैद्य चक्रदत्त तथा भावमिश्र ने भी क
अडूसा,जिसे वासा के नाम से भी जाना जाता है,भारत के लगभग हर क्षेत्र में पाया जाता है | शोथ क्षय में इसके पञ्चाङ्ग तथा पुष्पों के काढ़े से सिद्ध किया घृत -शहद में मिलाकर (दुगुनी मात्रा में) सेवन करने से यह प्रबल वेगयुक्त कास तथा श्वाश को तुरंत नष्ट करता है | अडूसा,खाँसी के साथ कफ तथा रक्त हो तो वासा अकेली ही समर्थ औषधि है |
सावन की ठंडी फुहार गर्मी में आम इंसान को राहत देती है , वहीं दमा रोग से ग्रसित व्यक्ति के लिए बहुत कष्टदायी होती है | दीपावली हो या होली हर इंसान नई ऋतू के आगमन पर उसका स्वागत करता है, लेकिन श्वाश रोगी बेचैन हो जाता है | दमा या अस्थमा - यह फेफड़ों को प्रभावित करने वाला श्वाश रोग है | दमा से दम तो नहीं निकलता किन्तु दम निकलने से कम कष्ट नहीं होता | सांस की नलिकाएं सकरी पड़ जाती हैं | रोगी का दौरा जैसे ही समाप्त होता है वह
संधिवात या संधिगत वात विशुद्ध वातरोग है | संधि में रहने वाला विकृत वायु संधियों को नष्ट कर देता है तथा उनमे दर्द व सूजन को उत्पन्न करता है | संधियों को नष्ट करने का अर्थ यह है कि संधियों की स्वाभाविक कार्य करने की शक्ति में विकार आ जाता है |
पायरिया (पेरियोडोंटाइटिस) के कारण स्वस्थ दांत भी जिनमे कोई कीड़ा आदि नहीं होता कमजोर होकर हिलने लगते हैं , और एक-एक कर के निकल जाते हैं | पायरिया की शुरुआत जिसे जिंजिवाईटिस कहते हैं जिसके मुख्य कारण दातों पर मैल,टारटर,कैल्कुलस,भोजन के अंश आदि जमे रहना,विटामिन सी की कमी होना दिमागी परेशानी आदि है
मधुमेह अर्थात डॉयबिटीज़ मनुष्य के शरीर में शुगर की मात्रा अधिक हो जाने से हो जाती है | इसमें मनुष्य का शरीर दुर्बल होने लगता है,आँखों की रौशनी कम होने लगती है,मूत्र बार-बार और अधिक मात्रा में आने लगता है | हर वक़्त थकान व हाथ पैरों में पीड़ा सी महसूस होने लगती है | मनुष्य के मुँह से हर वक़्त दुर्गन्ध सी आने लगती है ,शरीर का घाव जल्दी नहीं भर
मिर्गी (Epilepsy / Apsmar) एक ऐसा रोग है जिसमें व्यक्ति अचानक चेतना खो देता है, शरीर अकड़ जाता है, हाथ-पैर अनियंत्रित रूप से फड़कने लगते हैं, मुँह से झाग आने लगता है, आँखें स्थिर हो जाती हैं और उसे स्वयं को कोई ज्ञान नहीं रहता। आयुर्वेद में इसे “अपस्मार” कहा गया है — अर्थात स्मृति का नाश, चेतना का पतन, मन की अस्थिरता और नाड़ियों में विकार। मिर्गी एक साधारण बीमारी नहीं बल्कि मन, मस्तिष्क, नाड़ियों और प्राणवायु—चारों का विकार है। इसका इलाज केवल दवा से नहीं बल्कि— औषध + पथ्य + दिनचर्या + मानसिक शांति + योग इन सबके मिलकर होता है।
आंत्रपुच्छ शोथ अर्थात अपेंडिसाइटिस रोग होने पर आधुनिक चिकित्सक तुरंत शल्य चिकित्सा का परामर्श देते हैं ,लेकिन आयुर्वेद चिकित्सक वनौषधियों से आंत्रपुच्छ शोथ की विकृति को नष्ट करते हैं | आधुनिक चिकित्स्कों के अनु
मनुष्य स्वाभाविक रूप से शाकाहारी है | पहले वह अपना आहार नैसर्गिक रूप में ही ग्रहण करता था| पकाकर खाना तो उसने सभ्यता के विकास के साथ सीखा है | यही कारण है कि आंते पके हुए आहार की अभ्यस्त बन गयी हैं ,किन्तु इससे पर्याप्त पोषक तत्व न मिलने के कारण हम में से अधिकांश को समय से पूर्व ज़रा- जीर्णता के साथ ही अनेकानेक बीमारियों का भी शिकार बनना पड़ रहा है | प्रख्यात आहारविद गहेन्स एंडर्सन के कथनानुसार,यदि इस भूल को सुधारकर प्राकृतिक आहार की तरफ लौटा जा सके तो कोई कारण नहीं की स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन का लाभ न उठाया जा सके | अनुसन्धानपूर्ण अपनी कृति - “द न्यू फ़ूड थेरेपी” में उन्होंने कहा हैकि वैज्ञानिक खोजों
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