(१) बिना नाम का रोग लक्षण एक रोगीको देखा गया उसके दाहिने हाथ की कलाई के तीन हिस्से सूख गये थे, एक हिस्सा बचा था उसके उसी हाथ की दो उंगलियां कंधे से लग गयी थी ।उस हाथ को हिलाना या इधर-उधर करना सम्भव न था। वह रुग्ण हाथ केवल बेकार ही नहीं हुआ था, अपितु तकलीफ भी देता रहता था। रोगी का सोना भी कठिन हो रहा था,
अर्श या बवासीर यह एक अत्यंत कष्टप्रद रोग है। जिंदगी को दूभर कर देने वाले इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के कष्ट का वर्णन करना कठिन कार्य है। मलद्वार के अंदर तीन वलि (आवर्त) होते हैं इनकी शिराएं जो श्लेष्मकला के भीतर रहती हैं विछिप्त हो जाने से यह रोग होता है ।पतली शिराओं का एक जाल मलाशय को भीतर चारों ओर से घेरे रहता है इन्हीं शिराओ में रक्त का संचय होकर फूलने से यह मस्से का रूप ले लेता है।
पक्षाघात शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। आंख का पक्षाघात, उंगलियों का पक्षाघात, जीभ का पक्षाघात, सीधे हाथ एवं पैर का पक्षाघात, वाम भाग का पक्षाघात, निम्नांग ( अर्धांग्न) का पक्षाघात, (इसमें कमर से नीचे के अंग रह जाते हैं) पक्षाघात में शरीर के अंग मुड़ जाते हैं ।अनेक बार मुड़ते नहीं हैं परंतु उनकी क्रियाशीलता नष्ट हो जाती है। अंगों में रक्त का संचार तो रहता है
कव्ज के सम्बन्ध में जनमानस की यह धारणा है कि यदि नित्य नियमित रूप से दो या तीन बार मल का त्याग न होगा तो उन्हें अनेक कष्ट होंगे, भोजन में अरुचि होगी, शरीर सुस्त रहेगा, पेट भारी रहेगा आदि-आदि। कभी -कभी तो मनुष्य में यह विचार भी उठने लगते हैं कि नियमित शौच न होने के कारण ही उन्हें अमुक रोग सता रहा है और शौच हो जाने से उनका रोग ठीक हो जायगा, यद्यपि यह बात कुछ अंश में
Arthritis is a chronic condition that causes pain, swelling, stiffness, and reduced mobility in joints. It can affect people of all ages but is most common among adults over 40. If not treated in time, arthritis can lead to joint deformity and permanent damage. Ayurveda refers to arthritis as Aamvata (toxic accumulation in joints) or Sandhivata (degeneration of joints due to aging or Vata imbalance).
Pyorrhea, also known as periodontitis, is a serious gum disease that results in inflammation, bleeding, pus formation, and eventually loosening of teeth if left untreated. Ayurveda provides natural and effective ways to treat pyorrhea and restore oral health.
Vitiligo is a chronic skin disorder in which white patches appear on various parts of the body. These patches slowly spread if not treated at the early stage. If left untreated, the entire skin can turn white. It is a major disease, and once it becomes chronic, it is very difficult to control. The treatment is not quick but rather long-term and requires patience and discipline.
शरीर में अचानक ही विभिन्न स्थानों पर धीरे-धीरे सफेद चिन्ह निकलते निकलते पूरी तरह से फैलने लगते हैं यदि प्रारंभ में ही उपयुक्त उपचार नहीं किया जाता है तो यह रोग शरीर के समस्त चर्म को श्वेत चिन्हों के रूप में परिवर्तित कर देता है यह बहुत बड़ा रोग है और जड़ पकड़ने पर इसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता है इसका उपचार सरल नहीं है बल्कि दीर्घगामी है।
पायरिया रोग से ग्रस्त होने पर दांत ढीले होकर हिलने लग जाते हैं मसूड़े से मवाद और रक्त निकलने लगता है दांतों पर कड़ी पापड़ियां जम जाती है मुँह से दुर्गन्ध आने लगती है। उचित चिकित्सा न करने पर दाँत कमजोर होकर गिरने लगते हैं।
संपूर्ण उदर रोग यतः त्रिदोषज होते हैं अतः सर्वत्र वात आदि तीनों दोषों को शांत करने वाली क्रियाएं करनी चाहिए। उदर के दोष पूर्ण होने पर अग्निमांद्य हो जाता है अतः इस रोग में अग्नि प्रदीपक और लघु भोजन करना चाहिए। जौं, मूंग ,दूध ,आसव, अरिष्ट ,मधु आदि का इस रोग में उपयोग करना उत्तम है दोषोंके अति संचय से तथा स्रोतों के बंद हो जाने से उदर रोग पैदा होते हैं। अतः उदर रोगी को नित्य विरेचन देना चाहिये। विरेचन में गोमूत्र का अथवा दूध के साथ अरण्ड तेल का पान करना चाहिये।
जुकाम से बार-बार आक्रांत होने की व्याधि असंख्यॊ॑ नर नारियों में पाई जाती है इसका कारण है आहार बिहार का प्रदूषण, भोजन में अम्ल और मधुर रसों का अति सेवन, खट्टे, नमकीन, चटपटे, मिठाइयां एवं फास्ट फुड्स के अति सेवन से रस धातु दूषित हो जाती है अथवा इसकी अतिशय वृद्धि हो जाती है उपद्रव स्वरूप इस्नोफीलिया रेस्पिरेटरी एलर्जी ,एवं ब्राऺकियल अस्थमा, यक्ष्मा
रक्तचाप में वृद्धि यदि आप उच्च रक्तचाप के जीर्ण रोगी हैं एवं नियमित रूप से एलोपैथी दवाएं लेनी पड़ती है तो साथ में निम्न प्रयोग भी करें स्थाई रूप में उच्च रक्तचाप से मुक्ति पा लेंगे जटामांसी 300 ग्राम लेकर उसमें 30 हिस्से करें रात को 10 ग्राम जटामांसी 100 ग्राम पानी में भिगो दें प्रात मसलकर छान लें और दो चम्मच मधु मिलाकर पीवे' पथ्यापथ्य का ध्यान रखते हुए 60 दिन के सेवन द्वारा रोग से पूर्ण छुटकारा मिल जाएगा
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