मानव शरीर अनंत रहस्यों से भरा हुआ है | शरीर की अपनी एक मुद्रामयी भाषा है,जिसे करने से शारीरिक स्वास्थ्य-लाभ में सहयोग प्राप्त होता है | यह शरीर पञ्चतत्वों के योग से बना है | पांच तत्व ये हैं - (1) पृथ्वी (2) जल (3) अग्नि (4) वायु (5) आकाश | शरीर में जब भी इन तत्वों का असंतुलन होता है,रोग पैदा हो जाते हैं | यदि हम इनका संतुलन करना सीख जाएँ तो बीमार हो ही नहीं सकते एवं यदि हो भी जाएँ तो इन तत्वों को संतुलित कर के आरोग्यता वापस ला सकते हैं |
मानव शरीर में पेट जैसे मह्त्बपूर्ण अंग जिसका सम्बन्ध प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में अधिकांश रोगों से होता है ,की देखरेख अतिआवश्यक है | अगर पेट रोग से आप पीड़ित हैं तो न तो आप खाने का आनन्द ले सकते हैं और न ही सही जीवन जीने का | क्योकि सम्पूर्ण धातुओं का निर्माण एवं पोषण -पाचन अग्नि पर निर्भर होता है और अगर शरीर में खानपान के दुष्प्रभाव स्वरुप अग्नियां प्रभावित होती हैं तो सामान्य से गंभीर पेट के विकार हो सकते हैं |
सौंफ घर -घर में मुखशुद्धि के रूप में प्रचलित सौंफ का उपयोग प्राचीनकाल से ही औषधि के रूप में भी होता रहा है | इसके अलावा सौंफ का उपयोग मसालों और पान में डाले जाने वाले मसाले के रूप में भी होता है | गांव में आज भी लोग ठंडाई शरबत बनाकर इसका सेवन करते हैं| पेट के रोगों के लिए तो ये रामबाण औषधि है | सूखी सौंफ श्लेष्मिक कला और पाचन तंत्र पर प्रभावकारी असर करता है |
हमारे शरीर में स्थित मुट्ठी के आकार का ह्रदय एक मिनट में 70 बार धड़कता है और एक घंटे में ३०० लीटर रक्त शरीर के अंग प्रत्यंग में प्रसारित करता है | ह्रदय का मुख्य कार्य रक्त को शुद्ध कर के शरीर के प्रत्येक हिस्से में रक्त की आपूर्ति करना है | जब रक्तप्रवाह में रुकावट आती है तो ह्रदय को अपना कार्य करने में कठिनाई होती है। रक्तप्रवाह में अवरोध आने के कारण कुछ मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं,जिससे तीव्र वेदना होती है और अन्य लक्षण उत्पन्न होते हैं|स्वयं ह्रदय को दो छोटी-छोटी धमनियों से थोड़ा रक्त मिलता है |
मानव आदिकाल से ही सुंदरता का पुजारी रहा है | उसे अपनी सुंदरता को बनाये रहने से ही मानसिक सुंदरता अर्थात उच्च कोटि के भाव उत्कृष्टता के साथ बने रहते हैं | अतः अपने शरीर के मुखकमल की सुंदरता निमित्य प्रत्येक व्यक्ति को सदाचार पूर्वक अपनी सुंदरता को बरकरार रखना चाहिए , क्योकि मुखकमल द्वारा ही व्यक्ति की मानसिक अवस्था एवं चरित्र का ज्ञान किया जा सकता है| 14-15 वर्ष की आयु के बाद मुख पर सेमल के कांटे के समान कफ,वायु एवं रक्त से युवाओ में होने वाली छोटी-छोटी फुंसियां निकलने लगती हैं जिसे मुंहासे कहते हैं |
बवासीर एक बहुत कष्टदायक रोग है और यदि जल्दी ही इसे दूर न किया जा सके तो तो यह बढ़ता जाता है और रोगी का उठना बैठना भी मुश्किल हो जाता है | इस रोग में गुदा के अंकुर फूल कर मटर या अंगूर के बराबर हो जाते हैं | दरअसल ये अंकुर असामन्य रूप से फूली हुई रक्त शिराएं होती हैं जो गुदा या मलाशय के जोड़ पर या गुदा और गुदाद्वार की त्वचा के जोड़ पर स्थित होती है | इनकी स्थिति की आधार पर ही इन्हे आंतरिक या बाह्य बवासीर कहते हैं |
हमारे गुर्दे लाखों छलनियो तथा लगभग 140 मील नलिकाओं से बने होते हैं | गुर्दे की इस इकाई को नेफ्रॉन कहते हैं | एक गुर्दे में लगभग 10 लाख ऐसी ऐसी इकाइयां होती हैं | नलिकाएं उस छाने हुए द्रव अच्छी अच्छी चीज़ो( सोडियम,पोटेशियम, कैल्शियम ) इत्यादि को दोबारा सोख लगभग 1.5 लीटर मूत्र के रूप में बाहर निकाल देती हैं | हमारे गुर्दे लगभग 1500 लीटर खून को साफ़ कर के लगभग 9.5 लीटर मूत्र में बदल देते हैं | लगभग 1200 मिलीलीटर रक्त प्रत्येक १ मिनट में दोनों गुर्दों से प्रवाहित होता है तथा यह 1 मिलीलीटर प्रत्येक मिनिट के हिसाब से मूत्र में बदल जाता है |
जो व्यक्ति तन और मन दोनों तरह से स्वस्थ रहता है वही व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ कहलाता है | तन से वह व्यक्ति स्वस्थ होता है जिसमे बात पित्त और कफ सामंजस्य अवस्था में रहता है परन्तु तन से व्यक्ति जब तक स्वस्थ नहीं रह सकता जब तक वह मन से स्वस्थ न हो मन से वही व्यक्ति स्वस्थ रहता है जो सदाचारी हो सदाचारी वही व्यक्ति होता है जिसमे काम क्रोध लोभ जैसे महाभूतों पर स्वयं का नियंत्रण रहता है | शास्त्रों में लेख किया गया है की जो व्यक्ति कामी होता है उसका बात कुपित हो जाता है और जो व्यक्ति क्रोधी होता है उसका पित्त कुपित हो जाता है और लोभी व्यक्ति का कफ कुपित हो जाता है अतः सदाचारी व्यक्ति ही पूर्ण स्वस्थ रहने की कल्पना कर सकता है |
मोटापा एक प्रकार का रोग है,इसके होने के मुख्य दो कारण हैं - (1) आनुवंशिक अर्थात वंशगत| जिनके माता पिता मोटे होते हैं उनकी संतान प्रायः मोटी ही होती है| (2) भूख से खाना,शारीरिक श्रम न करना,आरामदायक जीवन व्यतीत करना| जो लोग खाना खाकर पड़े रहते हैं,उन्हें मोटापा आ जाता है| साधारणतः मोटापा की पहचान यह है की जितने इंच शरीर की ऊंचाई हो उतने किलो शरीर का बजन ठीक है| इससे अधिक होने पर “मोटा”और इससे कम होने पर पतला कहा जायेगा|
अनिद्रा- नींद ना आना इस अवस्था मै रोगी की निद्रा मै कमी हो जाती है। कारण- नींद ना आना कितनी बार दूसरे रोग का लक्षण ही रहता है।इस विकार को उत्पन्न करने वाले अनेकों कारण है – (1)- रजोगुण युक्त,बात के अथवा पित्त्युक्त बात के प्रकोप से अनिद्रा रोग उत्पन्न होता है।
सरलतापूर्वक प्रसव के लिए - हींग भूनकर चूर्ण बना लें,चार माशा शुद्ध गो - घृत में मिलाकर खिलाने से सरलतापूर्वक प्रसव होने में सहायता मिलती है | इसके अतिरिक्त एक तोला राई के चूर्ण में भुनी हुई हींग का चूर्ण मिलाकर गरम जल के साथ सेवन करने से मूढगर्भ आसानी से बाहर आ जाता है |
मानव शरीर प्रकृति की सबसे जटिल और अद्भुत मशीन है। इस मशीन को निरंतर चलाने के लिए रक्त का शरीर में संचार अत्यंत आवश्यक है, और यही कार्य करता है हमारा रक्तचाप (Blood Pressure)। अधिकतर लोग उच्च रक्तचाप को ही बड़ा खतरा मानते हैं, लेकिन निम्न रक्तचाप भी कई बार उतना ही परेशान करने वाला और खतरनाक सिद्ध हो सकता है, विशेषकर जब लक्षण बढ़ते हुए दिखाई दें। उच्च रक्तचाप को एक "छिपा हुआ सांप" कहा जाता है क्योंकि यह बिना लक्षणों के कई वर्षों तक शरीर को भीतर से कमजोर करता रहता है और अचानक किसी दिन बड़ा नुकसान पहुँचा देता है। इसके विपरीत, निम्न रक्तचाप अक्सर शुरुआत में हानिरहित लगता है, लेकिन जब यह लगातार बना रहे या बार-बार चक्कर आने, थकान, कमजोरी, बेहोशी की प्रवृत्ति पैदा करने लगे — तब यह शरीर में किसी गहरे असंतुलन या रोग का संकेत हो सकता है।
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