उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर के ऊतक कमजोर पड़ने लगते हैं शरीर के विभिन्न जोड़ घिसने लगते हैं ऐसी स्थिति में जोड़ों में दर्द रहने लगता है भोजन के प्रति अरुचि होती है प्यास अधिक लगती है हाथ, पैर, जंघा, एड़ी तथा कमर आदि के जोड़ों में दर्द होने लगता है घुटनों में शोथ (सूजन) भी हो जाता है रोग बढ़ जाने पर चलने फिरते समय भयंकर कष्ट होता है बढ़ती उम्र के साथ जो गठिया होता है उसे आस्टियो आर्थराइटिस कहते हैं जोड़ों में सूजन या प्रदाह के कारण उत्पन्न गठिया को रियूमेटाइड आर्थराइटिस कहते
उच्च रक्तचाप का आयुर्वेदिक नाम शिरागत वात है| रक्त वाहनियों तथा धमनियों पर रक्त का अधिक दवाव पड़ना और उनका कठोर हो जाना शिरागत वात है | सामान्यतः रक्तचाप 120/80 मि.मी.पारा होता है इसमें 10मि.मी. पारे की घटत बढ़त भी सामान्य ही समझना चाहिए| यह 2 प्रकार का होता है - (1) उच्च रक्त चाप ( HIGH B.P.) (2) न्यून रक्त चाप ( LOW B.P.)
मानव शरीर में पेट जैसे मह्त्बपूर्ण अंग जिसका सम्बन्ध प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में अधिकांश रोगों से होता है ,की देखरेख अतिआवश्यक है | अगर पेट रोग से आप पीड़ित हैं तो न तो आप खाने का आनन्द ले सकते हैं और न ही सही जीवन जीने का | क्योकि सम्पूर्ण धातुओं का निर्माण एवं पोषण -पाचन अग्नि पर निर्भर होता है और अगर शरीर में खानपान के दुष्प्रभाव स्वरुप अग्नियां प्रभावित होती हैं तो सामान्य से गंभीर पेट के विकार हो सकते हैं |
हमारे शरीर में स्थित मुट्ठी के आकार का ह्रदय एक मिनट में 70 बार धड़कता है और एक घंटे में ३०० लीटर रक्त शरीर के अंग प्रत्यंग में प्रसारित करता है | ह्रदय का मुख्य कार्य रक्त को शुद्ध कर के शरीर के प्रत्येक हिस्से में रक्त की आपूर्ति करना है | जब रक्तप्रवाह में रुकावट आती है तो ह्रदय को अपना कार्य करने में कठिनाई होती है। रक्तप्रवाह में अवरोध आने के कारण कुछ मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं,जिससे तीव्र वेदना होती है और अन्य लक्षण उत्पन्न होते हैं|स्वयं ह्रदय को दो छोटी-छोटी धमनियों से थोड़ा रक्त मिलता है |
बवासीर एक बहुत कष्टदायक रोग है और यदि जल्दी ही इसे दूर न किया जा सके तो तो यह बढ़ता जाता है और रोगी का उठना बैठना भी मुश्किल हो जाता है | इस रोग में गुदा के अंकुर फूल कर मटर या अंगूर के बराबर हो जाते हैं | दरअसल ये अंकुर असामन्य रूप से फूली हुई रक्त शिराएं होती हैं जो गुदा या मलाशय के जोड़ पर या गुदा और गुदाद्वार की त्वचा के जोड़ पर स्थित होती है | इनकी स्थिति की आधार पर ही इन्हे आंतरिक या बाह्य बवासीर कहते हैं |
हमारे गुर्दे लाखों छलनियो तथा लगभग 140 मील नलिकाओं से बने होते हैं | गुर्दे की इस इकाई को नेफ्रॉन कहते हैं | एक गुर्दे में लगभग 10 लाख ऐसी ऐसी इकाइयां होती हैं | नलिकाएं उस छाने हुए द्रव अच्छी अच्छी चीज़ो( सोडियम,पोटेशियम, कैल्शियम ) इत्यादि को दोबारा सोख लगभग 1.5 लीटर मूत्र के रूप में बाहर निकाल देती हैं | हमारे गुर्दे लगभग 1500 लीटर खून को साफ़ कर के लगभग 9.5 लीटर मूत्र में बदल देते हैं | लगभग 1200 मिलीलीटर रक्त प्रत्येक १ मिनट में दोनों गुर्दों से प्रवाहित होता है तथा यह 1 मिलीलीटर प्रत्येक मिनिट के हिसाब से मूत्र में बदल जाता है |
मोटापा एक प्रकार का रोग है,इसके होने के मुख्य दो कारण हैं - (1) आनुवंशिक अर्थात वंशगत| जिनके माता पिता मोटे होते हैं उनकी संतान प्रायः मोटी ही होती है| (2) भूख से खाना,शारीरिक श्रम न करना,आरामदायक जीवन व्यतीत करना| जो लोग खाना खाकर पड़े रहते हैं,उन्हें मोटापा आ जाता है| साधारणतः मोटापा की पहचान यह है की जितने इंच शरीर की ऊंचाई हो उतने किलो शरीर का बजन ठीक है| इससे अधिक होने पर “मोटा”और इससे कम होने पर पतला कहा जायेगा|
अनिद्रा- नींद ना आना इस अवस्था मै रोगी की निद्रा मै कमी हो जाती है। कारण- नींद ना आना कितनी बार दूसरे रोग का लक्षण ही रहता है।इस विकार को उत्पन्न करने वाले अनेकों कारण है – (1)- रजोगुण युक्त,बात के अथवा पित्त्युक्त बात के प्रकोप से अनिद्रा रोग उत्पन्न होता है।
मानव शरीर प्रकृति की सबसे जटिल और अद्भुत मशीन है। इस मशीन को निरंतर चलाने के लिए रक्त का शरीर में संचार अत्यंत आवश्यक है, और यही कार्य करता है हमारा रक्तचाप (Blood Pressure)। अधिकतर लोग उच्च रक्तचाप को ही बड़ा खतरा मानते हैं, लेकिन निम्न रक्तचाप भी कई बार उतना ही परेशान करने वाला और खतरनाक सिद्ध हो सकता है, विशेषकर जब लक्षण बढ़ते हुए दिखाई दें। उच्च रक्तचाप को एक "छिपा हुआ सांप" कहा जाता है क्योंकि यह बिना लक्षणों के कई वर्षों तक शरीर को भीतर से कमजोर करता रहता है और अचानक किसी दिन बड़ा नुकसान पहुँचा देता है। इसके विपरीत, निम्न रक्तचाप अक्सर शुरुआत में हानिरहित लगता है, लेकिन जब यह लगातार बना रहे या बार-बार चक्कर आने, थकान, कमजोरी, बेहोशी की प्रवृत्ति पैदा करने लगे — तब यह शरीर में किसी गहरे असंतुलन या रोग का संकेत हो सकता है।
शरीर के सभी अंगो के कम्प या केवल सिर के कम्पन को कंपवात कहते हैं| मिथ्या आहार-विहार तथा वात को प्रकुपित करने वाले कारणों से वात विकार उतपन्न होते हैं | आयुर्वेद में 80 प्रकार की वात व्याधियों का वर्णन मिलता है,जिनके कम्पवात भी सम्मिलित है | कम्प का शाब्दिक अर्थ है काँपना,जिसे साधारण बोलचाल की भाषा में हिलना या हिलते रहना ही कह सकते हैं | नाडीमंडल के द्वारा मनुष्य के सम्पूर्ण शरीर के अंग-प्रत्यंगो की चेष्टाओं का नियंत्रण होता है |
मनुष्य के शरीर को लम्बाई में सिर से लेकर पैर तक के हिस्से को दो बराबर भागों में बाटने पर एक हिस्सा बायां भाग तथा दूसरा हिस्सा दायां भाग कहलाता है | इन दोनों भागों के किसी भी एक पक्ष की चेष्टाओं के नष्ट होने पर उसे पक्षाघात या अर्धंगबात कहते हैं| साधारण भाषा में इसे लकवा कहते हैं कारण- आयुर्वेद के मत से वात (वायु)को प्रकुपित करने वाले आहार विहार का अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से वात दोष प्रकुपित होता है | यह प्रकुपित वायु शरीर के किसी भी एक पक्ष में आ
वर्षा ऋतू अपने साथ अनेक खुशियां लेकर आती है ,क्योंकि वर्षा ऋतू आगमन पर भीषण गर्मी से मुक्ति मिलती है , लेकिन जब वर्षा का अंत होता है और गुलाबी शीत ऋतू का प्रारम्भ होता है तो वर्षा के जल कारण मक्खी,मच्छर और दूसरे जीवाणु तेज़ी से उत्पन्न होते हैं| वर्षा के जल से भरे गड्ढों में मच्छर
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